"Garuda Purana में प्रेत का रूप और उसका निवारण" गरुड़ पुराण की पवित्र कथा: राजा बभ्रुवाहाना और प्रेत की कहानी

"जानिए गरुड़ पुराण में वर्णित प्रेत योनि के कारण, मुक्ति के उपाय और राजा बभ्रु वाहाना की कथा। कौन से कर्म प्रेत रूप बनाते हैं और किस विधि से आत्मा को सद्गति मिलती है"

"The form of the ghost and its exorcism" features a depiction of the story of King Babhruvahana and the ghost.

🌿 कैप्शन: "गरुड़ पुराण की कथा से प्रेरित दृश्य — राजा बभ्रुवाहाना और प्रेत आत्मा का संवाद, जहां श्रद्धा और विधिवत कर्मों से आत्मा को सद्गति प्राप्त होती है"।

*इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि प्रेत का रूप किन कर्मों से बनता है, उससे मुक्ति कैसे मिलती है, और गरुड़ पुराण में वर्णित राजा बभ्रुवाहाना और एक प्रेत की कथा हमें क्या सीख देती है। साथ में पढ़ें प्रेत योनि, गरुड़ पुराण कथा, प्रेत निवारण उपाय, राजा बभ्रु वाहाना कथा, श्राद्ध विधि, विष्णु पूजा, पितृ दोष निवारण, आत्मा की मुक्ति, प्रेत कथा, प्रेत रूप। 

*गरुड़ पुराण, भगवान विष्णु और गरुड़ जी के संवादों का वह दिव्य ग्रंथ है जिसमें मृत्यु, कर्म, पुनर्जन्म और मोक्ष के रहस्यों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इसमें बताया गया है कि मनुष्य अपने कर्मों के आधार पर ही विभिन्न योनियों में जन्म लेता है — और यदि किसी कारणवश उसका अंतिम संस्कार या श्राद्ध विधि पूर्ण न हो पाए, तो आत्मा “प्रेत योनि” में भटकती रहती है।

"भगवान विष्णु गरुड़ जी से कहते हैं" —

“हे गरुड़! जो मनुष्य अपने जीवन में अधर्म, पाप, छल, कपट या अन्याय करते हैं, या जिनके पुत्र नहीं होते जो उनके बाद श्राद्ध और संस्कार करें — वे मृत्यु के पश्चात प्रेत योनि को प्राप्त करते हैं।”

ऐसे जीव अपने अधूरे कर्मों और असंतुलित संस्कारों के कारण यमलोक के मार्ग में कष्ट भोगते हैं। यमलोक तक पहुंचने के रास्ते में सोलह पुर आते हैं, जहां आत्मा को अपने कर्मों का दर्पण दिखाया जाता है।

🔱 "चार मार्ग — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष":

*01. धर्म मार्ग: श्रेष्ठ कर्म करने वाले आत्माएं इसी मार्ग से देवलोक जाती हैं।

*02. अर्थ मार्ग: जो दानशील और परोपकारी हैं, वे विमान पर सवार होकर जाते हैं।

*03. काम मार्ग: जो दूसरों की इच्छाएं पूर्ण करते हैं, वे सेवक रूप में आगे बढ़ते हैं।

*04. मोक्ष मार्ग: मोक्ष की चाह रखने वाले हंस युक्त विमान से परम लोक को प्राप्त करते हैं।

👑 "राजा बभ्रुवाहाना और प्रेत की कथा" (गरुड़ पुराण से):

त्रेता युग में ,बभ्रुवाहाना नाम के एक बहुत पराक्रमी, तेजस्वी और लोक प्रिय राजा थे । उन के राज में पूर्ण सम्पन्नता थी। राजा ब्राह्मणों का आदर सत्कार, रीती-रिवाज वह पूरी श्रद्धा के साथ करते थे।

एक दिन वह अपने मंत्रिओं के साथ जंगल में शिकार करने गये। एक हिरन पर वार किया। घायल मृग , तीर के साथ जंगल के भीतर भागा। राजा भी उस के खून के निशान के पीछे-पीछे करते हुए सुनसान जंगल में जा कर खो गए। भूख और प्यास से परेशान राजा एक झील के पास पहुंचे। झील में स्नान कर, ठंडा पानी पी कर, जब वह बाहर आएं, तो उसने एक खूबसूरत अंजीर का पेड़ देखा। अंजीर के पेड़ की छाया में राजा बैठ गए।

कुछ ही क्षणों में राजा ने एक भयानक प्रेत आत्मा को देखा जो भूख और प्यास से व्याकुल था। वह प्रेत आत्मा राजा के सामने आकर बोला , हे राजन , आप की कृपा से आज मुझे, इस दुर्गति से छुटकारा मिल सकता है। अगर आप मेरे को प्रेत योनि से उद्धार कर दे तो मैं आपका आभारी रहूंगा।

राजा के उसकी दुर्गति का कारण पूछने पर प्रेत ने कहा कि वह भी एक देश का राजा था । ब्राह्मणों की सेवा, दान -पुण्य ,नियमत रूप से करता था। पूर्वजों के श्राद्ध भी समय पर संपन्न होते थे । परन्तु यह सब व्यर्थ हो गया क्योंकि उसके कोई सन्तान नहीं था । कोई मित्र और न ही कोई सम्बन्धी , जो मेरे मरने के उपरान्त मेरी अंत्येष्टि विधि पूर्वक करता। विधि पूर्वक अंत्येष्टि नहीं होने के कारण मेरी यह दुर्गति हुई है। यदि मासिक 16 श्राद्ध पूर्ण नहीं होते तो, 100 वार्षिक श्राद्ध करने पर भी ,मेरी सद्गति नहीं हो सकती।

"राजा ने आश्वासन दिया कि वह उस की परमगति के लिए वह सब प्रयास करेगा , जो वह करने को कहेगा"।

"प्रेत ने आगे कहा" —

“यदि कोई व्यक्ति बिना लोभ के, विधिवत श्राद्ध करे तो आत्मा को मुक्ति मिल सकती है। लेकिन यदि मासिक श्राद्ध न किए जाएं तो सौ वार्षिक श्राद्ध भी व्यर्थ हो जाते हैं।” अर्थात 

राजा ने वचन दिया कि वे उसकी आत्मा की मुक्ति के लिए सभी विधियां पूर्ण करेंगे।

🔮 "प्रेत मुक्ति के उपाय" (विष्णु पूजा विधि):

*01.प्रेत ने राजा को निम्न विधि बताई —

*02.दो शुद्ध सोने के टुकड़ों से भगवान नारायण की मूर्ति बनाएं। वह धन, छल ,कपट से न कमाया गया हो।

*03.मूर्तियों को पवित्र जल से स्नान कराकर, पीले वस्त्र व आभूषण पहनाएं।

"गरुड़ जी भगवान् विष्णु जी से पूछते हैं, की जो मनुष्य जाने , अनजाने में पाप कर्म कर बैठते हैं , वह यमदूतों की यातनाओं से कैसे बच सकते हैं । प्रेतों के रूप किन कर्मों दुबारा बनते हैं । किस शुभ दान से प्रेत योनी छूट जाती है"।

~ "श्री हरी कहते हैं ,कि पाप कर्मों को , और जिन के पुत्र नहीं होता , दोनों अवस्था में बचना बहुत कठिन है"।

मनुष्य को पुत्र प्राप्ति के लिए , हरीवंश का पाठ या रूद्र भगवान् की पूजा करनी चाहिए। फिर भी दिवंगत आत्माएं स्वर्ग लोक तक जाती हैं , यदि उन का संस्कार, पुत्र न होने की अवस्था में ,कोई दुसरे मनुष्य दुबारा विधि पूर्वक किया जाए ।

~ जो पूर्व जन्म संचित कर्म के अधीन रह कर पाप कर्म में अनुरक्त रहते हैं, अपने धर्म को त्याग कर ,दुसरे धर्म को स्वीकार करता है, विद्या और सदाचार से वंचित है, वह प्रेत योनी में जन्म लेते हैं ।

जीव अपने कर्मों अनुसार दुसरे शरीर को प्राप्त करके यम लोक में नाना प्रकार के कष्ट भोगता है। यम लोक के मार्ग में 16 पुर पड़ते हैं। संसार में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष , यह चार मार्ग 

*01.पवित्र स्थल पर पूजा करें —

*02.पूर्व में: श्रीधर

*03.दक्षिण में: मधुसूदन

*04.पश्चिम में: वामन देव

*05.उत्तर में: गदाधारी

*06.मध्य में: ब्रह्मा और महेश्वर

*07.एक सांड का दान कर उसे छोड़ने का भी प्रयोजन है। एक शय्या, 13 ब्राह्मणों को पद दान और एक सोने से बना मटका, दूध और घी से भरा हुआ ,ब्रह्मा, विष्णु, महेश को पूजने के पश्चात अर्पित किया हुआ, ब्राह्मणों को दान में दिया जाता है।

"13 ब्राह्मणों को भोजन व शय्या दान दें"

*01.सोने का मटका दूध व घी से भरकर ब्राह्मण को दान दें।

*02.राजा ने यही सब किया और परिणामस्वरूप उस प्रेत आत्मा को सद्गति प्राप्त हुई।

🕊️" कथा का संदेश":

यह कथा सिखाती है कि यदि किसी व्यक्ति की आत्मा अधूरी कर्म विधि या पुत्र अभाव के कारण प्रेत बन गई हो, तो सच्ची श्रद्धा से किए गए श्राद्ध, दान और विष्णु पूजा से उसे मुक्ति मिल सकती है।

जो भी इस कथा को श्रद्धा से सुनता या सुनाता है, उसे कभी प्रेत योनि की प्राप्ति नहीं होती।

> "डिस्क्लेमर":

इस ब्लॉग में दी गई जानकारी गरुड़ पुराण तथा पुराणिक ग्रंथों में वर्णित कथाओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ज्ञान का प्रसार करना है। इस लेख का उद्देश्य किसी भी अंधविश्वास, तांत्रिक या असामाजिक प्रथाओं को प्रोत्साहित करना नहीं है।

"प्रेत", "आत्मा" या "यमलोक" जैसी अवधारणाएं सनातन धर्म की गूढ़ मान्यताओं का प्रतीकात्मक रूप हैं, जिनका उल्लेख जीवन-मृत्यु के रहस्यों और कर्म सिद्धांत को समझाने के लिए किया गया है। पाठकों से अनुरोध है कि इसे धार्मिक श्रद्धा और सांस्कृतिक दृष्टि से ग्रहण करें, न कि भय या अंधविश्वास के रूप में।

यदि किसी व्यक्ति के परिवार में श्राद्ध, पितृ दोष या मृत्यु संस्कार से संबंधित प्रश्न हैं, तो योग्य पंडित या वैदिक आचार्य से सलाह लें।

इस ब्लॉग की सभी सामग्री केवल शैक्षिक और धार्मिक जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। लेखक और वेबसाइट किसी भी व्यक्तिगत, सामाजिक या मानसिक परिणाम के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। सनातन धर्म के सिद्धांत हमें सत्य, दया, दान और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं — यही इसका वास्तविक संदेश है।


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