सूर्य मंदिर देव औरंगाबाद:चोर कैसे चिपका मंदिर में

"बिहार के औरंगाबाद स्थित देव सूर्य मंदिर का संपूर्ण इतिहास, पश्चिमाभिमुख रहस्य, वास्तुकला, छठ पर्व का महत्व और यात्रा की जानकारी। जानें इस प्राचीन मंदिर के बारे में रोचक तथ्य रंजीत के ब्लॉग से।">

"सूर्य देव मंदिर औरंगाबाद की तस्वीर"

कैप्शन: "सूर्य देव मंदिर औरंगाबाद, बिहार की एक सुंदर तस्वीर, जिसमें मंदिर की वास्तुकला और सौंदर्य को दर्शाया गया है।"

"बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थित देव सूर्य मंदिर — जहां भगवान भास्कर की किरणें सीधे गर्भगृह में प्रवेश करती हैं। भारत का यह अद्भुत सूर्य मंदिर श्रद्धा और स्थापत्य कला का अनुपम संगम है।"

परिचय:

बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थित देव सूर्य मंदिर सनातन धर्म के सबसे आश्चर्यजनक और पवित्र तीर्थस्थलों में से एक है। यह मंदिर न सिर्फ़ अपनी अद्भुत वास्तुकला के लिए जाना जाता है, बल्कि इसके "पश्चिमाभिमुख" होने का रहस्य इसे दुनिया भर में विशिष्ट बनाता है। 

मान्यता है कि यह वही स्थान है जहां देवमाता अदिति ने छठी मैया की तपस्या कर सूर्य देव को पुत्र रूप में प्राप्त किया था, इसीलिए यह स्थान छठ पर्व की उत्पत्ति का केंद्र भी माना जाता है। इस ब्लॉग में, हम आपको इस प्राचीन मंदिर के इतिहास, वास्तुशिल्प के रहस्य, धार्मिक महत्व और यात्रा से जुड़ी संपूर्ण जानकारी प्रदान करेंगे।

*01.स्थान देव, औरंगाबाद जिला, बिहार

*02.विशेषता भारत का एकमात्र पश्चिमाभिमुख सूर्य मंदिर

*03.निर्माण काल ऐतिहासिक: गुप्त काल (पांचवीं-छठवीं शताब्दी); पौराणिक: त्रेता युग

*04.वास्तु शैली नागर, द्रविड़ और वेसर शैली का मिश्रण; कोणार्क सूर्य मंदिर से समानता

*05.मंदिर में सोने की कलश चोरी की घटना और चोर को चिपकने की घटना प्रचलित 

*06.मुख्य देवता भगवान सूर्य (ब्रह्मा, विष्णु, महेश के रूप में तीन स्वरूपों में)

*07.प्रमुख आकर्षण सूर्य कुंड, जटिल पत्थर की नक्काशी, ठ पर्व का भव्य आयोजन

*08.इतिहास एवं पौराणिक कथाएं: गुप्तकालीन निर्माण से लेकर अदिति-छठी मैया की कथा तक।

*08.वास्तुकला का रहस्य: पश्चिमाभिमुख होने की कहानी और औरंगजेब से जुड़ा किस्सा।

*09.धार्मिक महत्व: छठ पर्व का केंद्र और सूर्य कुंड का चमत्कार।

*10.यात्रा गाइड: कैसे पहुंचें, कब जाएं और आसपास के दर्शनीय स्थल।

📜 मंदिर का इतिहास एवं पौराणिक कथाएं

इस मंदिर के इतिहास और निर्माण से जुड़ी कई रोचक पौराणिक कथाएं और ऐतिहासिक तथ्य प्रचलित हैं।

*पौराणिक उत्पत्ति: एक प्रमुख मान्यता के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने एक ही रात में किया था। एक अन्य कथा के अनुसार, सतयुग के राजा ऐल, जो कुष्ठ रोग से पीड़ित थे, ने यहाँ के तालाब में स्नान कर अपना रोग ठीक किया और स्वप्न में सूर्य देव के आदेश पर इस मंदिर का निर्माण करवाया।

*देवमाता अदिति से संबंध: एक अन्य महत्वपूर्ण कथा के अनुसार, देवमाता अदिति ने देवासुर संग्राम में देवताओं की हार के बाद इसी स्थान पर छठी मैया की आराधना कर एक तेजस्वी पुत्र (आदित्य भगवान) का वरदान पाया था। माना जाता है कि इसी घटना से छठ पर्व की शुरुआत हुई।

*ऐतिहासिक काल निर्धारण: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अनुसार, मंदिर का निर्माण गुप्त काल (पांचवीं से छठवीं शताब्दी) में हुआ था। हालांकि, स्थानीय मान्यताएं इसे और भी प्राचीन बताती हैं।

क्षेत्र में प्रचलित मंदिर में चोरी की घटना

एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक चोर ने एक मंदिर के गुंबद पर बने सोने के कलश को चुराने का प्रयास किया था। वह गुंबद पर चढ़ गया, लेकिन जब उसने कलश को छूने की कोशिश की, तो वह वहीं चिपक गया। कुछ लोगों की मान्यता है कि चोर मंदिर के गुंबद के नीचे चिपक गया जबकि लोगों कहना है कि 
चोर ने अपने प्राणों की रक्षा के लिए भगवान सूर्य से प्रार्थना की, और अंततः भगवान सूर्य ने उसे माफ कर दिया और उसे नीचे उतारने का आदेश दिया।

🏛️ वास्तुकला एवं रहस्य

देव सूर्य मंदिर अपनी अद्वितीय वास्तुकला और एक रहस्यमय घटना के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

*पश्चिमाभिमुख होने का रहस्य: लोककथाओं के अनुसार, मुगल शासक औरंगजेब ने इस मंदिर को तोड़ने का आदेश दिया था। पुजारियों की विनती पर उसने एक शर्त रखी कि यदि रातों-रात मंदिर का मुख्य द्वार पूर्व से पश्चिम की ओर हो जाए, तो वह मंदिर को नहीं तोड़ेगा। कहा जाता है कि अगली सुबह मंदिर का प्रवेश द्वार वास्तव में पश्चिम दिशा की ओर हो गया था, और तभी से यह इसी रूप में विद्यमान है।

*शिल्प कला: यह मंदिर काले ग्रेनाइट पत्थरों को तराशकर बनाया गया है और इसकी नक्काशी अत्यंत उत्कृष्ट है। मंदिर का गर्भगृह कमल के आकार के शिखर से सुशोभित है, जिसके ऊपर सोने का कलश स्थापित है।

🙏 धार्मिक महत्व एवं आयोजन

यह मंदिर आस्था का एक प्रमुख केंद्र है और विशेष रूप से छठ पर्व के लिए प्रसिद्ध है।

*छठ का केन्द्र: कार्तिक और चैत्र मास में मनाए जाने वाले छठ पर्व के दौरान यहां लाखों श्रद्धालु सूर्य देव को अर्घ्य देने आते हैं। इस अवसर पर यहां एक विशाल मेले का आयोजन भी होता है।

*सूर्य कुंड: मंदिर परिसर में स्थित सूर्य कुंड में स्नान करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस कुंड के जल में चमत्कारी गुण हैं और इससे स्नान करने से चर्म रोग ठीक होते हैं।

*देव सूर्य महोत्सव: हर साल बसंत पंचमी के बाद सप्तमी के दिन यहाँ 'देव सूर्य महोत्सव' मनाया जाता है, जिसमें देशभर से हजारों लोग भाग लेते हैं।

🗺️ यात्रा से संबंधित जानकारी

यदि आप देव सूर्य मंदिर के दर्शन करने की योजना बना रहे हैं, तो निम्नलिखित जानकारी आपके लिए उपयोगी रहेगी:

 कैसे पहुंचें:

  *हवाई मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा पटना में है, जो यहाँ से लगभग 160 किलोमीटर दूर है।

  *रेल मार्ग: निकटतम रेलवे स्टेशन अनुग्रह नारायण रोड है, जो देव से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

  *सड़क मार्ग: पटना से औरंगाबाद होते हुए सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है।

*शीर्षक: देव सूर्य मंदिर, औरंगाबाद: जहां सूर्य देव करते हैं पश्चिम से दर्शन

कार्तिक छठ पर्व सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित एक गहन आस्था का पर्व है। इसके मुख्य अनुष्ठानों से जुड़ी कुछ दिलचस्प पौराणिक मान्यताएं और ऐतिहासिक तथ्य हैं जो इस त्योहार को और भी रोमांचक बना देते हैं।

📜 पौराणिक कथाएं और ऐतिहासिक संदर्भ

*सीता माता ने की थी शुरुआत: एक प्रसिद्ध मान्यता के अनुसार, छठ पर्व की शुरुआत माता सीता ने की थी। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने मुंगेर (बिहार) में गंगा नदी के तट पर सूर्य देव की पूजा की थी, जिसके बाद से यह परंपरा चली आ रही है । मुंगेर का सीताचरण मंदिर इस मान्यता का प्रमुख केंद्र है।

*देवमाता अदिति और छठी मैया: एक पौराणिक कथा के मुताबिक, देवताओं की माता अदिति ने संतान प्राप्ति और उनकी कल्याण की कामना से "रनबे माय" (छठी मैया) की आराधना की थी . छठी मैया के वरदान से ही उन्हें तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई, जिसने देवताओं को असुरों पर विजय दिलाई।

*वैदिक काल से जुड़ाव: छठ पर्व को वैदिक कालीन परंपरा का हिस्सा माना जाता है . यह पर्व ऋग्वेद में वर्णित सूर्य पूजन और उषा पूजन (सूर्योदय और सूर्यास्त की पूजा) की सनातन पद्धति को आज भी जीवित रखे हुए है।

🌾 पूजन सामग्री का विशेष महत्व

छठ पूजा में इस्तेमाल होने वाली हर चीज़ का एक गहरा अर्थ है। कुछ खास सामग्रियों के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है :

*ठेकुआ: गुड़ और घी से बना यह प्रसाद सूर्य देव और छठी मैया को अत्यंत प्रिय है। यह आस्था और पारंपरिक प्रेम का प्रतीक है।

*गन्ना: गन्ना छठी मैया को विशेष रूप से प्रिय माना जाता है। मान्यता है कि इससे परिवार के जीवन में मिठास बनी रहती है।

*गागर नींबू (डाभ नींबू): यह बड़ा नींबू प्रकृति का उपहार माना जाता है और सूर्य देव को अर्पित किया जाता है।

*नारियल: नारियल को त्रिदेव - ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक माना जाता है। इसे चढ़ाने से मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।

🌍 सांस्कृतिक विशेषताएं और रोचक तथ्य

*सबसे पर्यावरण-अनुकूल त्योहार: पर्यावरणविदों का मानना है कि छठ सबसे पर्यावरण-अनुकूल हिंदू त्योहार है . इस दौरान नदियों और तालाबों की सफाई करके उन्हें सजाया जाता है, जो प्रकृति के प्रति सम्मान को दर्शाता है।

*एक समावेशी पर्व: यह पर्व स्त्री-पुरुष, बुजुर्ग-युवा सभी समान भाव से मनाते हैं . यह लिंग या उम्र के आधार पर भेद किए बिना सभी के लिए खुला है

*विश्वव्यापी उत्सव: यह पर्व अब केवल भारत तक ही सीमित नहीं रहा। विदेशों में रह रहे प्रवासी भारतीय भी इसे पूरी आस्था और धूमधाम से मनाते हैं, जिससे यह एक वैश्विक उत्सव बन गया है .

📅 छठ पूजा 2025 की तिथियां

2025 में यह महापर्व 25 अक्टूबर से 28 अक्टूबर तक मनाया जाएगा . नीचे दिए गए चार दिनों के कार्यक्रम से आप इसकी समयसारणी समझ सकते हैं:

दिन तिथि अनुष्ठान विशेष बातें

*पहला दिन 25 अक्टूबर, शनिवार नहाय-खाय स्नान के बाद लौकी की सब्जी और चावल-दाल का भोजन 

*दूसरा दिन 26 अक्टूबर, रविवार खरना दिनभर निर्जला व्रत के बाद शाम को गुड़ की खीर का प्रसाद 

*तीसरा दिन 27 अक्टूबर, सोमवार संध्या अर्घ्य डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देना; 36 घंटे के निर्जला व्रत की शुरुआत 

चौथा दिन 28 अक्टूबर, मंगलवार उषा अर्घ्य उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का पारण (समापन) 

आपके लिए देश-विदेश में स्थित कुछ ऐसे प्रसिद्ध सूर्य मंदिरों की जानकारी नीचे दी गई है, जहाँ छठ पर्व के आयोजन की विशेष मान्यता है और भक्तों की अपार भीड़ उमड़ती है।

🌞 भारत में प्रसिद्ध सूर्य मंदिर एवं छठ आयोजन

मंदिर व स्थान विशेषता व ऐतिहासिक संदर्भ छठ पर्व का महत्व

देव सूर्य मंदिर, औरंगाबाद (बिहार) मान्यता: देवमाता अदिति ने यहां छठी मैया की तपस्या कर तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति का वरदान पाया था। मान्यता: संतान सुख व परिवार की रक्षा की कामना के लिए विशेष महत्वपूर्ण; छठ व्रत की उत्पत्ति से जुड़ा स्थान।

मणिचक सूर्य मंदिर, मसौढ़ी (बिहार) मान्यता: यहां छठ करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है। छठ के दौरान हजारों श्रद्धालु अर्घ्य देने आते हैं; प्रशासन द्वारा विशेष सुरक्षा व व्यवस्था के इंतजाम।

पुनौरा धाम सूर्य मंदिर, सीतामढ़ी (बिहार) ऐतिहासिक संदर्भ: माता सीता की जन्मस्थली; पुंडरीक ऋषि द्वारा स्थापित सूर्य मंदिर। छठ पर्व पर यहां मेले जैसा माहौल; मान्यता कि तालाब में स्नान व सूर्य पूजा से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

कोणार्क सूर्य मंदिर, ओडिशा ऐतिहासिक संदर्भ: भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब ने कुष्ठ रोग से मुक्ति पाकर 12 सूर्य मंदिरों का निर्माण करवाया, इनमें कोणार्क सबसे प्रसिद्ध है। एक प्रमुख सूर्य तीर्थ होने के नाते छठ व्रतियों के लिए इसका विशेष आध्यात्मिक महत्व है।

🌍 विदेशों में छठ पर्व

छठ पर्व अब केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। दुनिया के कई देशों में जहां भारतीय प्रवासी रहते हैं, वहां भी यह पर्व बड़ी श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है। हालांकि, विदेशों में विशेष रूप से प्रसिद्ध सूर्य मंदिरों के बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, कनाडा, मॉरीशस, ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर जैसे देशों में प्रवासी भारतीय स्थानीय नदियों, झीलों या सार्वजनिक पार्कों में विशाल छठ घाटों का आयोजन करते हैं और पूरी श्रद्धा के साथ सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं।

💁🏻‍♀️ छठ पर्व से जुड़ी कुछ अन्य जानकारी

*पर्व का दायरा: मूल रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश का पर्व माना जाने वाला छठ, अब पूरे भारत में मनाया जाने लगा है।

*वर्ष में दो बार: छठ पर्व साल में दो बार मनाया जाता है - चैत्र (चैती छठ) और कार्तिक (कार्तिकी छठ) मास में। कार्तिक महीने वाला छठ अधिक व्यापक और प्रसिद्ध है।

बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थित देव सूर्य मंदिर एक अत्यंत प्राचीन और चमत्कारिक मंदिर है, जो अपनी अनूठी वास्तुकला और गहन धार्मिक महत्व के लिए देशभर में प्रसिद्ध है。नीचे दी गई तालिका में इस मंदिर के मुख्य पहलुओं का सारांश प्रस्तुत किया गया है:

डिस्क्लेमर 

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