"होली 2029 और होलिका दहन की पूरी जानकारी—28 फरवरी को शुभ मुहूर्त, भद्रा काल, पूजा विधि, प्रह्लाद की कथा, होलिकाष्टक का महत्व, क्या करें और क्या न करें, स्वादिष्ट व्यंजन और प्रकृति से जुड़ा रहस्य जानें"।
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"नीचे दिए गए विषयों पर विस्तार से पढ़ें मेरे ब्लॉग पर"
*01.होली 2029
*02.होलिका दहन 2029
*03.होली का शुभ मुहूर्त
*04.होलिका दहन भद्रा
*05.होली की कथा
*06.भक्त प्रह्लाद कहानी
*07.होलिकाष्टक
*09.होली क्या करें क्या न करें
*10.होली का महत्व
*011.होली पर क्या खाएं
🌺 "होली 2029: रंगों का त्योहार, आस्था और अग्नि की पवित्र कथा"
होलिका दहन की तिथि: 28 फरवरी 2029 (बुधवार)
होली (धुलेंडी) की तिथि: 1 मार्च 2029 (गुरुवार)
🔥 "होलिका दहन का शुभ मुहूर्त व भद्रा स्थिति"
2029 में होलिका दहन 28 फरवरी, बुधवार को किया जाएगा।
- पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 27 फरवरी देर-रात 02:04 बजे
- पूर्णिमा तिथि समाप्त: 28 फरवरी रात्रि 10:39 बजे
- भद्रा काल: 28 फरवरी शाम 06:08 बजे से दोपहर 12:24 बजे तक
👉 होलिका दहन भद्रा समाप्त होने के बाद शुभ माना गया है, अर्थात शाम 07:21 बजे से रात 11:57 बजे के बीच दहन सबसे उत्तम रहेगा। इस दौरान शुभ मुहूर्त, अमृत मुहूर्त और चर मुहूर्त रहेगा।
भद्रा काल में होलिका दहन वर्जित है, क्योंकि भद्रा राक्षसी का प्रतीक मानी गई है। इस काल में अग्नि प्रज्वलन करने से दुर्भाग्य, विवाद या हानि की संभावना रहती है।
📜 "होली और होलिका की पौराणिक कथा"
सत्ययुग के समय हिरण्यकशिपु, जो अत्यंत अहंकारी असुर राजा था, अपने पुत्र भक्त प्रह्लाद से भगवान विष्णु की भक्ति छुड़वाना चाहता था।
कई यातनाओं के बाद भी प्रह्लाद ने भगवान विष्णु का नाम नहीं छोड़ा।
तब हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका, जिसके पास अग्नि से न जलने का वरदान था, से कहा कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठे।
लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से होलिका जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित बच गया।
यह घटना अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक बनी और तब से होलिका दहन का पर्व मनाया जाता है।
💥 "भक्त प्रह्लाद को दी गईं यातनाएं"
भक्त प्रह्लाद को भगवान विष्णु की भक्ति के कारण अनेक यातनाएं दी गईं—
- विष पिलाया गया, परंतु अमृत बन गया।
- पहाड़ से गिराया गया, परंतु वायु देव ने उन्हें बचाया।
- हाथियों के नीचे डाल दिया गया, परंतु वे उन्हें सूंघते हुए चले गए।
- सर्पों से भरे गड्ढे में फेंका गया, परंतु नागों ने रक्षा की।
- जलते तवे पर बैठाया गया, परंतु उनके शरीर को कोई हानि नहीं हुई।
इन सबके बावजूद प्रह्लाद की अटल भक्ति ने भगवान विष्णु को प्रसन्न किया, जिन्होंने बाद में नरसिंह अवतार लेकर हिरण्यकशिपु का अंत किया। अब कथा विस्तार से पढ़ें।
"भक्ति की अजेय गाथा: हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद"
भूमिका: अहंकार का उदय
इस प्रतिशोध की भावना से प्रेरित होकर, हिरण्यकशिपु ने कठोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उसे एक अत्यंत दुर्लभ वरदान दिया:
*01.वह किसी मनुष्य या पशु द्वारा नहीं मारा जाएगा।
*02.वह दिन या रात में नहीं मरेगा।
*03.वह घर के अंदर या बाहर नहीं मरेगा।
*04.वह ज़मीन पर या आकाश में नहीं मरेगा।
*05.वह किसी अस्त्र या शस्त्र से नहीं मारा जाएगा।
इस वरदान ने हिरण्यकशिपु को लगभग अमर बना दिया। अहंकार में चूर होकर उसने स्वयं को ही ईश्वर घोषित कर दिया और अपनी प्रजा पर यह फरमान जारी किया कि कोई भी विष्णु या किसी अन्य देवता की पूजा नहीं करेगा, सब केवल 'हिरण्यकशिपु अमर' का जाप करेंगे। स्वर्ग पर अधिकार कर उसने देवताओं को भी अपना दास बना लिया।
*भक्त का प्राकट्य
इसी अत्याचारी राजा के घर में उसकी पत्नी कयाधु के गर्भ से एक तेजस्वी पुत्र ने जन्म लिया, जिसका नाम प्रह्लाद रखा गया। बालक प्रह्लाद जन्म से ही असाधारण था। माँ के गर्भ में रहते हुए ही उसने देवर्षि नारद के मुख से भगवान विष्णु की महिमा का श्रवण किया था। इस कारण वह बचपन से ही परम विष्णु भक्त था।
*पिता-पुत्र का वैचारिक संघर्ष
जब प्रह्लाद गुरुकुल से वापस आया, तो हिरण्यकशिपु ने उससे बड़े लाड़ से पूछा, "पुत्र, तुमने गुरुकुल में क्या श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त किया?"
प्रह्लाद ने शांत और दृढ़ स्वर में उत्तर दिया, "पिताश्री, मैंने जाना है कि संसार में एकमात्र सत्य हैं भगवान नारायण, और उनकी भक्ति ही जीवन का परम लक्ष्य है।"
यह सुनकर हिरण्यकशिपु का क्रोध ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा। जिस विष्णु के नाम से वह घृणा करता था, उसी का नाम उसका अपना पुत्र जप रहा था। उसने षण्ड और अमर्क को बुलाकर फटकारा, और उन्हें प्रह्लाद को केवल दैत्य नीति और राजधर्म की शिक्षा देने का आदेश दिया।
पुत्र के मुख से शत्रु के नाम और तत्वज्ञान को सुनकर हिरण्यकशिपु का धैर्य टूट गया। उसने सोचा, "यह मेरे शत्रु विष्णु द्वारा मेरे विनाश के लिए भेजा गया कोई गुप्तचर है।" उसने प्रह्लाद को मृत्युदंड देने का निश्चय किया।
"प्रह्लाद पर आठ दिन के दारुण कष्ट"
*पहला दिन: पर्वत शिखर से पतन
हिरण्यकशिपु ने अपने सेवकों को आदेश दिया, "ले जाओ इस विद्रोही को! इसे विशाल पर्वत के सबसे ऊंचे शिखर से नीचे गिरा दो, ताकि इसकी हड्डियां चूर-चूर हो जाएं और यह विष्णु का नाम लेना भूल जाए।"
परिणाम: प्रह्लाद ने पहाड़ के गिरने से भी मृत्यु को प्राप्त नहीं किया, उसकी भक्ति और भी दृढ़ हुई।
*दूसरा दिन: विष पान
हिरण्यकशिपु अत्यंत क्रोधित हुआ। उसने अपने रसोइए को बुलाकर प्रह्लाद के भोजन में भयानक विष मिलाने का आदेश दिया। रसोइए ने मन मारकर विष मिलाया, लेकिन प्रह्लाद ने उसे भी 'विष्णु-प्रसाद' मानकर ग्रहण कर लिया।
यह विष इतना घातक था कि एक बूँद से पूरे नगर का विनाश हो सकता था, पर प्रह्लाद के शरीर में प्रवेश करते ही वह अमृत के समान बन गया।
*तीसरा दिन: क्रूर सर्पों से दंशन
राजा ने क्रुद्ध होकर आदेश दिया, "इसे ले जाकर सर्पों से भरे एक गहरे कुएं (या गड्ढे) में फेंक दो! सैकड़ों विषधर इसे डस-डसकर मार डालें।"
सैनिकों ने प्रह्लाद को सर्पों से भरे गड्ढे में डाल दिया। प्रह्लाद ने वहाँ भी अपनी आंखें बंद कर लीं और एकाग्र मन से विष्णु का ध्यान किया। कहा जाता है कि उस गड्ढे के सारे सर्प भक्त की उपस्थिति से मोहित हो गए। उन्होंने प्रह्लाद को डसने के बजाय, उसके पैरों के पास कुंडली मारकर बैठ गए और फन उठाकर उसे छाया देने लगे।
*चौथा दिन: उन्मत्त हाथियों द्वारा कुचलवाना
क्रोध से पागल होकर हिरण्यकशिपु ने अपने सर्वाधिक बलशाली, मदमस्त हाथियों को बुलाया। उसने आदेश दिया, "इन हाथियों को इस पर दौड़ाओ! इन्हें कुचलकर इसका माँस-मज्जा मिट्टी में मिला दो!"
*पांचवां दिन: शस्त्राघात
*छठा दिन: अग्नि का तपना
*सातवां दिन: समुद्र में डुबोना
*आठवां दिन: भयानक तूफान और हवाएं
🌼 "होलिकाष्टक का महत्व"
होलिकाष्टक फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से लेकर पूर्णिमा तक का आठ दिनों का काल है।
इन दिनों में दान-पुण्य, संयम और मन की शुद्धि का विशेष महत्व होता है।
कहा गया है — “अष्टमी होलिकायाश्च पूर्वं यावत् तु पूर्णिमा”, इस अवधि में किसी भी शुभ कार्य (विवाह, गृहप्रवेश आदि) से बचना चाहिए।
⚖️ "क्या करें और क्या न करें" (होलिका दहन व होली पर)
✅ क्या करें:
- भद्रा समाप्त होने के बाद ही होलिका दहन करें।
- गेहूं की बालियां, गोबर की गोइठियां, नारियल, और अक्षत चढ़ाएं।
- “ओं नमः नारायणाय” या “प्रह्लादाय नमः” मंत्र से पूजा करें।
- होलिका की परिक्रमा करते हुए सुख-समृद्धि की कामना करें।
- होली के दिन अपने शत्रुओं से भी मेल-मिलाप करें।
- घर में रंगों से पहले तुलसी पूजन करें।
🚫 *क्या न करें:
- होली के दिन दूसरों पर कीचड़ या हानिकारक रंग न डालें।
- मद्यपान, जुआ या अनुचित व्यवहार से बचें।
- अग्नि में लोहे, प्लास्टिक या अशुद्ध वस्तुएं न डालें।
- जानवरों पर रंग न डालें, उन्हें परेशान न करें।
🌈 "होली पर कुछ अनसुलझे पहलू"
- राधा-कृष्ण की रंगलीला का ऐतिहासिक आधार — मथुरा और बरसाना में आज भी यह परंपरा राधारानी की सखियों की याद में निभाई जाती है।
- रंगों का अध्यात्मिक अर्थ — लाल रंग शक्ति का, हरा शांति का, पीला ज्ञान का और नीला भक्ति का प्रतीक है।
- वैज्ञानिक दृष्टि से — रंग शरीर के रक्तसंचार को सक्रिय करते हैं और सर्दी से जकड़े शरीर को उष्मा प्रदान करते हैं।
- प्रकृति में परिवर्तन का संकेत — यह त्योहार शिशिर से वसंत ऋतु में परिवर्तन का प्रतीक है।
🍲 "होली के दिन क्या बनाएं और क्या खाएं"
- गुजिया – त्योहार की शान, खोया, नारियल और सूखे मेवे से भरी।
- दही भल्ला – ताजगी और स्वाद का मेल।
- मालपुआ – घी में तला हुआ मीठा व्यंजन।
- ठंडाई – केसर, बादाम, सौंफ और दूध का ठंडा पेय, ऊर्जा बढ़ाता है।
- पापड़ और नमकीन – पारंपरिक भोजन के साथ आनंद का स्वाद।
🌳 "होली का प्रकृति से संबंध"
होली का सीधा संबंध ऋतुओं के परिवर्तन और कृषि जीवन से है।
इस समय नई फसल की बालियां (विशेषकर गेहूं और जौ) पकने लगती हैं।
होलिका दहन में इन बालियों को अग्नि में चढ़ाना कृषि समृद्धि और अग्नि की पवित्रता का प्रतीक है।
प्राचीन काल में इसे पर्यावरण शुद्धिकरण का पर्व भी कहा गया है क्योंकि लकड़ी और घास के जलने से वायुमंडल की कीटाणुनाशक प्रक्रिया होती है।
📿 "होलिका दहन की पूजा विधि" (संक्षिप्त)
- पूजा स्थल पर गोबर से चौक बनाएं।
- जल, मौली, चावल, अक्षत, फूल और नारियल रखें।
- होलिका में गेंहू की बालियां, हरी मूंग और गोबर की गोइठियां चढ़ाएं।
- परिवार के सभी सदस्य सात बार होलिका की परिक्रमा करें।
- राख को अगले दिन घर में लाकर माथे पर लगाएं और नई ऊर्जा का संचार करें।
