"होली और होलिका दहन 2029: शुभ मुहूर्त, भद्रा काल, पूजा विधि, कथा, क्या करें और क्या न करें"

"होली 2029 और होलिका दहन की पूरी जानकारी—28 फरवरी को शुभ मुहूर्त, भद्रा काल, पूजा विधि, प्रह्लाद की कथा, होलिकाष्टक का महत्व, क्या करें और क्या न करें, स्वादिष्ट व्यंजन और प्रकृति से जुड़ा रहस्य जानें"।

Holi and Holika Dahan photo 2029

Get ready to immerse yourself in the hues of happiness! Holi 2029 is here, bringing with it traditions, stories, and endless fun. #HoliVibes #CulturalCelebration"

"नीचे दिए गए विषयों पर विस्तार से पढ़ें मेरे ब्लॉग पर"

*01.होली 2029

*02.होलिका दहन 2029

*03.होली का शुभ मुहूर्त

*04.होलिका दहन भद्रा

*05.होली की कथा

*06.भक्त प्रह्लाद कहानी

*07.होलिकाष्टक

*09.होली क्या करें क्या न करें

*10.होली का महत्व

*011.होली पर क्या खाएं

🌺 "होली 2029: रंगों का त्योहार, आस्था और अग्नि की पवित्र कथा"

होलिका दहन की तिथि: 28 फरवरी 2029 (बुधवार)
होली (धुलेंडी) की तिथि: 1 मार्च 2029 (गुरुवार)

🔥 "होलिका दहन का शुभ मुहूर्त व भद्रा स्थिति"

2029 में होलिका दहन 28 फरवरी, बुधवार को किया जाएगा।

  • पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 27 फरवरी देर-रात 02:04 बजे
  • पूर्णिमा तिथि समाप्त: 28 फरवरी रात्रि 10:39 बजे
  • भद्रा काल: 28 फरवरी शाम 06:08 बजे से दोपहर 12:24 बजे तक
    👉 होलिका दहन भद्रा समाप्त होने के बाद शुभ माना गया है, अर्थात शाम 07:21 बजे से रात 11:57 बजे के बीच दहन सबसे उत्तम रहेगा। इस दौरान शुभ मुहूर्त, अमृत मुहूर्त और चर मुहूर्त रहेगा।

भद्रा काल में होलिका दहन वर्जित है, क्योंकि भद्रा राक्षसी का प्रतीक मानी गई है। इस काल में अग्नि प्रज्वलन करने से दुर्भाग्य, विवाद या हानि की संभावना रहती है।

📜 "होली और होलिका की पौराणिक कथा"

सत्ययुग के समय हिरण्यकशिपु, जो अत्यंत अहंकारी असुर राजा था, अपने पुत्र भक्त प्रह्लाद से भगवान विष्णु की भक्ति छुड़वाना चाहता था।
कई यातनाओं के बाद भी प्रह्लाद ने भगवान विष्णु का नाम नहीं छोड़ा।
तब हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका, जिसके पास अग्नि से न जलने का वरदान था, से कहा कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठे।
लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से होलिका जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित बच गया।
यह घटना अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक बनी और तब से होलिका दहन का पर्व मनाया जाता है।

💥 "भक्त प्रह्लाद को दी गईं यातनाएं"

भक्त प्रह्लाद को भगवान विष्णु की भक्ति के कारण अनेक यातनाएं दी गईं—

  1. विष पिलाया गया, परंतु अमृत बन गया।
  2. पहाड़ से गिराया गया, परंतु वायु देव ने उन्हें बचाया।
  3. हाथियों के नीचे डाल दिया गया, परंतु वे उन्हें सूंघते हुए चले गए।
  4. सर्पों से भरे गड्ढे में फेंका गया, परंतु नागों ने रक्षा की।
  5. जलते तवे पर बैठाया गया, परंतु उनके शरीर को कोई हानि नहीं हुई।
    इन सबके बावजूद प्रह्लाद की अटल भक्ति ने भगवान विष्णु को प्रसन्न किया, जिन्होंने बाद में नरसिंह अवतार लेकर हिरण्यकशिपु का अंत किया। अब कथा विस्तार से पढ़ें।

"भक्ति की अजेय गाथा: हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद"

भूमिका: अहंकार का उदय

प्राचीन काल में, जब धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष चरम पर था, दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का आतंक तीनों लोकों पर छाया हुआ था। वह महर्षि कश्यप और दिति का पुत्र था। उसका छोटा भाई हिरण्याक्ष, जिसे भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर मार डाला था, की मृत्यु का प्रतिशोध लेने की ज्वाला उसके हृदय में धधक रही थी।

इस प्रतिशोध की भावना से प्रेरित होकर, हिरण्यकशिपु ने कठोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उसे एक अत्यंत दुर्लभ वरदान दिया:

*01.वह किसी मनुष्य या पशु द्वारा नहीं मारा जाएगा।

*02.वह दिन या रात में नहीं मरेगा।

*03.वह घर के अंदर या बाहर नहीं मरेगा।

*04.वह ज़मीन पर या आकाश में नहीं मरेगा।

*05.वह किसी अस्त्र या शस्त्र से नहीं मारा जाएगा।

इस वरदान ने हिरण्यकशिपु को लगभग अमर बना दिया। अहंकार में चूर होकर उसने स्वयं को ही ईश्वर घोषित कर दिया और अपनी प्रजा पर यह फरमान जारी किया कि कोई भी विष्णु या किसी अन्य देवता की पूजा नहीं करेगा, सब केवल 'हिरण्यकशिपु अमर' का जाप करेंगे। स्वर्ग पर अधिकार कर उसने देवताओं को भी अपना दास बना लिया।

*भक्त का प्राकट्य

इसी अत्याचारी राजा के घर में उसकी पत्नी कयाधु के गर्भ से एक तेजस्वी पुत्र ने जन्म लिया, जिसका नाम प्रह्लाद रखा गया। बालक प्रह्लाद जन्म से ही असाधारण था। माँ के गर्भ में रहते हुए ही उसने देवर्षि नारद के मुख से भगवान विष्णु की महिमा का श्रवण किया था। इस कारण वह बचपन से ही परम विष्णु भक्त था।

जब प्रह्लाद शिक्षा के लिए शुक्राचार्य के पुत्रों, षण्ड और अमर्क, के गुरुकुल गया, तो उसकी भक्ति और भी दृढ़ हो गई। गुरुकुल में भी वह अन्य दैत्य बालकों को 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय' का पाठ सिखाने लगा।

*पिता-पुत्र का वैचारिक संघर्ष

जब प्रह्लाद गुरुकुल से वापस आया, तो हिरण्यकशिपु ने उससे बड़े लाड़ से पूछा, "पुत्र, तुमने गुरुकुल में क्या श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त किया?"

प्रह्लाद ने शांत और दृढ़ स्वर में उत्तर दिया, "पिताश्री, मैंने जाना है कि संसार में एकमात्र सत्य हैं भगवान नारायण, और उनकी भक्ति ही जीवन का परम लक्ष्य है।"

यह सुनकर हिरण्यकशिपु का क्रोध ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा। जिस विष्णु के नाम से वह घृणा करता था, उसी का नाम उसका अपना पुत्र जप रहा था। उसने षण्ड और अमर्क को बुलाकर फटकारा, और उन्हें प्रह्लाद को केवल दैत्य नीति और राजधर्म की शिक्षा देने का आदेश दिया।

किंतु, हर बार जब हिरण्यकशिपु प्रह्लाद से मिलता, तो बालक निडर होकर उसे समझाता कि वह अपनी आसुरी वृत्ति छोड़कर भगवान विष्णु की शरण ले। वह कहता, "पिताजी, आप संपूर्ण संसार के स्वामी बनने का स्वप्न देखते हैं, पर जो सर्वस्व के स्वामी हैं, उन्हें आप भूल गए हैं। सब कुछ उनका ही है।"

पुत्र के मुख से शत्रु के नाम और तत्वज्ञान को सुनकर हिरण्यकशिपु का धैर्य टूट गया। उसने सोचा, "यह मेरे शत्रु विष्णु द्वारा मेरे विनाश के लिए भेजा गया कोई गुप्तचर है।" उसने प्रह्लाद को मृत्युदंड देने का निश्चय किया।

"प्रह्लाद पर आठ दिन के दारुण कष्ट"

यहां से हिरण्यकशिपु के आदेश पर प्रह्लाद को लगातार आठ दिनों तक क्रूर और वीभत्स कष्ट दिए गए, जिन्हें पौराणिक ग्रंथों में होलाष्टक के दिनों के रूप में भी वर्णित किया गया है। भक्त प्रह्लाद की रक्षा स्वयं श्रीहरि ने की।

*पहला दिन: पर्वत शिखर से पतन

हिरण्यकशिपु ने अपने सेवकों को आदेश दिया, "ले जाओ इस विद्रोही को! इसे विशाल पर्वत के सबसे ऊंचे शिखर से नीचे गिरा दो, ताकि इसकी हड्डियां चूर-चूर हो जाएं और यह विष्णु का नाम लेना भूल जाए।"

दैत्य सैनिक प्रह्लाद को ले गए और उसे एक भयानक चोटी से नीचे धकेल दिया। प्रह्लाद नीचे गिरते समय भी शांत भाव से अपने आराध्य का स्मरण कर रहा था: "हे केशव! हे माधव!"
जैसे ही वह नीचे गिरने लगा, कहा जाता है कि स्वयं पृथ्वी माता (जो विष्णु के वराह अवतार की पत्नी हैं) ने उसे अपनी गोद में उठा लिया, या कई कथाओं में स्वयं भगवान विष्णु ने उसे अपने हाथों से थाम लिया। प्रह्लाद को खरोंच तक नहीं आई और वह मुस्कुराता हुआ वापस आ गया।

परिणाम: प्रह्लाद ने पहाड़ के गिरने से भी मृत्यु को प्राप्त नहीं किया, उसकी भक्ति और भी दृढ़ हुई।

*दूसरा दिन: विष पान

हिरण्यकशिपु अत्यंत क्रोधित हुआ। उसने अपने रसोइए को बुलाकर प्रह्लाद के भोजन में भयानक विष मिलाने का आदेश दिया। रसोइए ने मन मारकर विष मिलाया, लेकिन प्रह्लाद ने उसे भी 'विष्णु-प्रसाद' मानकर ग्रहण कर लिया।

यह विष इतना घातक था कि एक बूँद से पूरे नगर का विनाश हो सकता था, पर प्रह्लाद के शरीर में प्रवेश करते ही वह अमृत के समान बन गया।

परिणाम: प्रह्लाद का शरीर पहले से भी अधिक तेजस्वी हो गया।

*तीसरा दिन: क्रूर सर्पों से दंशन

राजा ने क्रुद्ध होकर आदेश दिया, "इसे ले जाकर सर्पों से भरे एक गहरे कुएं (या गड्ढे) में फेंक दो! सैकड़ों विषधर इसे डस-डसकर मार डालें।"

सैनिकों ने प्रह्लाद को सर्पों से भरे गड्ढे में डाल दिया। प्रह्लाद ने वहाँ भी अपनी आंखें बंद कर लीं और एकाग्र मन से विष्णु का ध्यान किया। कहा जाता है कि उस गड्ढे के सारे सर्प भक्त की उपस्थिति से मोहित हो गए। उन्होंने प्रह्लाद को डसने के बजाय, उसके पैरों के पास कुंडली मारकर बैठ गए और फन उठाकर उसे छाया देने लगे।

परिणाम: सर्प भी प्रह्लाद की भक्ति के सामने नतमस्तक हो गए।

*चौथा दिन: उन्मत्त हाथियों द्वारा कुचलवाना

क्रोध से पागल होकर हिरण्यकशिपु ने अपने सर्वाधिक बलशाली, मदमस्त हाथियों को बुलाया। उसने आदेश दिया, "इन हाथियों को इस पर दौड़ाओ! इन्हें कुचलकर इसका माँस-मज्जा मिट्टी में मिला दो!"

जैसे ही विशालकाय हाथी प्रह्लाद की ओर बढ़े, बालक प्रह्लाद ने पुनः नारायण का स्मरण किया। तभी, किसी अदृश्य शक्ति ने हाथियों को रोक दिया। वे प्रह्लाद के पास जाकर उसे सूंघने लगे और प्रेम से अपनी सूंड उसके सिर पर फेरने लगे, जैसे कोई पिता अपने पुत्र पर स्नेह करता है।

परिणाम: प्रह्लाद की भक्ति ने पशुओं के क्रोध को भी शांत कर दिया।

*पांचवां दिन: शस्त्राघात

राजा ने अब सीधे बल का प्रयोग करने का निश्चय किया। उसने अपने सबसे कुशल और क्रूर सैनिकों को नुकीले शस्त्र, भाले, तलवारें और गदाएं लेकर प्रह्लाद पर आक्रमण करने का आदेश दिया।

सैकड़ों दैत्य सैनिकों ने चारों ओर से प्रह्लाद पर वार किए। प्रह्लाद को अपनी रक्षा का कोई ध्यान नहीं था, वह केवल प्रेम से भगवान विष्णु का नाम जप रहा था। जैसे ही शस्त्र उसके शरीर को छूते, वे मुड़ जाते या टूट जाते। किसी भी शस्त्र से प्रह्लाद के शरीर पर एक खरोंच भी नहीं आई।

परिणाम: प्रह्लाद के शरीर की रक्षा स्वयं भगवान के सुदर्शन चक्र की शक्ति ने की।

*छठा दिन: अग्नि का तपना

हिरण्यकशिपु ने अब उसे तीव्र अग्नि में भस्म करने का विचार किया। उसने एक विशाल चिता तैयार करवाई और उसमें प्रह्लाद को झोंक देने का आदेश दिया।

जब प्रह्लाद को जलती हुई अग्नि के निकट लाया गया, तो उसने अग्निदेव से प्रार्थना की, "हे अग्निदेव! आप सभी के साक्षी हैं। यदि मेरी भक्ति शुद्ध है, तो आप मुझे कोई कष्ट न दें।"
प्रह्लाद के चिता में प्रवेश करते ही, वह अग्नि स्वयं शीतल हो गई। ऐसा लगा मानो चिता के स्थान पर सुगंधित फूलों का बिछौना हो।

परिणाम: अग्नि भी प्रह्लाद की भक्ति की गर्मी से शीतल पड़ गई।

*सातवां दिन: समुद्र में डुबोना

राजा ने हार नहीं मानी। उसने सोचा कि धरती, पहाड़, विष, पशु, शस्त्र और अग्नि, सब पर इसका कोई प्रभाव नहीं हुआ, तो इसे समुद्र की अनंत गहराइयों में डुबो देना चाहिए, जहाँ से यह कभी वापस न आ सके।

प्रह्लाद को विशाल पत्थरों से बाँधकर समुद्र के मध्य में फेंक दिया गया। समुद्र की लहरों में भी भक्त शांत चित्त से हरि नाम जप रहा था। देखते ही देखते, समुद्र की गहराई में वह बंधन स्वयं टूट गया। पत्थर तैरने लगे, और लहरों ने स्वयं प्रह्लाद को उठाकर तट पर पहुँचा दिया।

परिणाम: जलदेवता भी भक्ति की महिमा के आगे नतमस्तक हुए।

*आठवां दिन: भयानक तूफान और हवाएं

अंतिम प्रयास के रूप में, हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को एक सुनसान जगह पर भयंकर तूफान और बवंडर के बीच फेंकने का आदेश दिया। उसने सोचा कि प्रकृति का रौद्र रूप इसे मार डालेगा।

जब प्रह्लाद को तूफान के बीच छोड़ा गया, तो चारों ओर धूल, पेड़ और चट्टानें उड़ने लगीं, पर प्रह्लाद जहाँ खड़ा था, वहाँ की हवा एकदम शांत हो गई। कहा जाता है कि तूफान की गति भी उस स्थान पर जाकर शून्य हो गई, जहाँ भक्त खड़ा था, क्योंकि जहाँ भक्त का ध्यान केंद्रित होता है, वहाँ कोई बाधा नहीं रह सकती।

परिणाम: प्रकृति की सबसे विनाशकारी शक्ति भी भक्ति के तप से शांत हो गई।

उपसंहार: होलिका दहन और नरसिंह अवतार
आठ दिनों के इन भयानक कष्टों के बाद भी जब प्रह्लाद को कोई हानि नहीं हुई, तो हिरण्यकशिपु निराशा और क्रोध की अंतिम सीमा पर पहुंच गया।

*नौवां दिन: उसने अपनी बहन होलिका को बुलाया, जिसे वरदान था कि वह अग्नि में नहीं जल सकती। हिरण्यकशिपु ने होलिका से कहा कि वह प्रह्लाद को लेकर जलती हुई चिता पर बैठ जाए।

होलिका अपने वरदान पर विश्वास करके प्रह्लाद को गोद में लेकर चिता पर बैठ गई। प्रह्लाद ने सदैव की भाँति शांत मन से भगवान विष्णु का स्मरण किया। इस बार भगवान की इच्छा से, होलिका को मिला वरदान का वस्त्र उड़कर प्रह्लाद पर आ गिरा। परिणामस्वरूप, पापी होलिका जलकर भस्म हो गई, और भक्त प्रह्लाद अग्नि से बाहर निकल आया। इसी घटना की याद में होली का त्योहार मनाया जाता है, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।

अंत में, हिरण्यकशिपु ने स्वयं प्रह्लाद को मारने का निश्चय किया। जब उसने अपने महल के एक स्तंभ को लात मारकर कहा, "कहां है तेरा विष्णु? क्या वह इस स्तंभ में भी है?"
प्रह्लाद ने आत्मविश्वास से कहा, "हाँ पिताजी, वह कण-कण में विद्यमान हैं।"

यह सुनते ही वह स्तंभ फट गया और उसमें से एक भयानक स्वरूप प्रकट हुआ, जो न मनुष्य था, न पशु, बल्कि दोनों का मिला-जुला रूप था—भगवान नृसिंह (नर-सिंह) अवतार।
भगवान नृसिंह ने हिरण्यकशिपु को पकड़ लिया। उन्होंने उसे महल की चौखट (न घर के अंदर, न बाहर), गोधूलि वेला (न दिन, न रात), अपनी जांघों (न धरती पर, न आकाश में) पर लिटाया, और अपने नखों (न अस्त्र, न शस्त्र) से उसका पेट चीरकर उसका वध कर दिया।

इस प्रकार, हिरण्यकशिपु का अहंकार ध्वस्त हुआ और भक्त प्रह्लाद की विजय हुई। यह कथा इस सार्वभौमिक सत्य को स्थापित करती है कि सच्ची भक्ति और धर्म की शक्ति के सामने संसार की कोई भी शक्ति टिक नहीं सकती।

🌼 "होलिकाष्टक का महत्व"

होलिकाष्टक फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से लेकर पूर्णिमा तक का आठ दिनों का काल है।
इन दिनों में दान-पुण्य, संयम और मन की शुद्धि का विशेष महत्व होता है।
कहा गया है — “अष्टमी होलिकायाश्च पूर्वं यावत् तु पूर्णिमा”, इस अवधि में किसी भी शुभ कार्य (विवाह, गृहप्रवेश आदि) से बचना चाहिए।

⚖️ "क्या करें और क्या न करें" (होलिका दहन व होली पर)

क्या करें:

  • भद्रा समाप्त होने के बाद ही होलिका दहन करें।
  • गेहूं की बालियां, गोबर की गोइठियां, नारियल, और अक्षत चढ़ाएं।
  • “ओं नमः नारायणाय” या “प्रह्लादाय नमः” मंत्र से पूजा करें।
  • होलिका की परिक्रमा करते हुए सुख-समृद्धि की कामना करें।
  • होली के दिन अपने शत्रुओं से भी मेल-मिलाप करें।
  • घर में रंगों से पहले तुलसी पूजन करें।

🚫 *क्या न करें:

  • होली के दिन दूसरों पर कीचड़ या हानिकारक रंग न डालें।
  • मद्यपान, जुआ या अनुचित व्यवहार से बचें।
  • अग्नि में लोहे, प्लास्टिक या अशुद्ध वस्तुएं न डालें।
  • जानवरों पर रंग न डालें, उन्हें परेशान न करें।

🌈 "होली पर कुछ अनसुलझे पहलू"

  1. राधा-कृष्ण की रंगलीला का ऐतिहासिक आधार — मथुरा और बरसाना में आज भी यह परंपरा राधारानी की सखियों की याद में निभाई जाती है।
  2. रंगों का अध्यात्मिक अर्थ — लाल रंग शक्ति का, हरा शांति का, पीला ज्ञान का और नीला भक्ति का प्रतीक है।
  3. वैज्ञानिक दृष्टि से — रंग शरीर के रक्तसंचार को सक्रिय करते हैं और सर्दी से जकड़े शरीर को उष्मा प्रदान करते हैं।
  4. प्रकृति में परिवर्तन का संकेत — यह त्योहार शिशिर से वसंत ऋतु में परिवर्तन का प्रतीक है।

🍲 "होली के दिन क्या बनाएं और क्या खाएं"

  • गुजिया – त्योहार की शान, खोया, नारियल और सूखे मेवे से भरी।
  • दही भल्ला – ताजगी और स्वाद का मेल।
  • मालपुआ – घी में तला हुआ मीठा व्यंजन।
  • ठंडाई – केसर, बादाम, सौंफ और दूध का ठंडा पेय, ऊर्जा बढ़ाता है।
  • पापड़ और नमकीन – पारंपरिक भोजन के साथ आनंद का स्वाद।

🌳 "होली का प्रकृति से संबंध"

होली का सीधा संबंध ऋतुओं के परिवर्तन और कृषि जीवन से है।
इस समय नई फसल की बालियां (विशेषकर गेहूं और जौ) पकने लगती हैं।
होलिका दहन में इन बालियों को अग्नि में चढ़ाना कृषि समृद्धि और अग्नि की पवित्रता का प्रतीक है।
प्राचीन काल में इसे पर्यावरण शुद्धिकरण का पर्व भी कहा गया है क्योंकि लकड़ी और घास के जलने से वायुमंडल की कीटाणुनाशक प्रक्रिया होती है।

📿 "होलिका दहन की पूजा विधि" (संक्षिप्त)

  1. पूजा स्थल पर गोबर से चौक बनाएं।
  2. जल, मौली, चावल, अक्षत, फूल और नारियल रखें।
  3. होलिका में गेंहू की बालियां, हरी मूंग और गोबर की गोइठियां चढ़ाएं।
  4. परिवार के सभी सदस्य सात बार होलिका की परिक्रमा करें।
  5. राख को अगले दिन घर में लाकर माथे पर लगाएं और नई ऊर्जा का संचार करें।

⚠️  "डिस्क्लेमर" (Disclaimer)

अस्वीकरण:

 यह ब्लॉग धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं पर आधारित है, जिसका उद्देश्य पाठकों को भारतीय परंपराओं, पौराणिक कथाओं और त्योहारों की गहराई से जानकारी देना है। प्रस्तुत लेख में दिए गए मुहूर्त, तिथि और भद्रा संबंधी विवरण पंचांग गणना एवं ज्योतिषीय संदर्भों के अनुसार हैं। क्षेत्र, समय और परंपरा के आधार पर इनकी स्थिति में हल्का परिवर्तन संभव है।

हम पाठकों से निवेदन करते हैं कि किसी भी धार्मिक अनुष्ठान से पहले अपने स्थानीय पंडित या क्षेत्रीय पंचांग से परामर्श अवश्य लें।

इस ब्लॉग में वर्णित कथाएं, पूजा-विधि और मान्यताएं भारतीय धर्मग्रंथों—जैसे पुराण, स्मृति और लोककथाओं—से ली गई हैं। इनका उद्देश्य किसी भी संप्रदाय, वर्ग या मत का प्रचार नहीं है, बल्कि भारत की संस्कृति, भक्ति और आध्यात्मिक एकता को समझना है।
हम यह भी स्पष्ट करते हैं कि यह लेख केवल शैक्षणिक और सांस्कृतिक सूचना प्रदान करने के लिए है। इसका उपयोग किसी व्यक्तिगत लाभ, तंत्र-मंत्र या भविष्यवाणी के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

हर त्योहार का सार प्रेम, सद्भावना और एकता है — होली हमें यही सिखाती है कि अधर्म पर धर्म की विजय सदा होती है।


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