कब है अक्षय तृतीया 2027: 09 मई, रवि योग, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और सोना खरीदने का महत्व

अक्षय तृतीया 2027: भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की दिव्य प्रतिमा, पृष्ठभूमि में सूर्योदय, रवि योग और विशाल पीपल का वृक्ष।

अक्षय तृतीया2027 रविवार 09 मई को रवि योग में। जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, सोना-नमक खरीदने का वैज्ञानिक कारण, राशि अनुसार खरीदारी और त्रेता युग का इतिहास।

नीचे दिए गए विषयों पर विस्तार से पढ़ें रंजीत के ब्लॉग पर 

*रवि योग 2027

*अक्षय तृतीया कथा

*त्रेता युग शुरुआत

*अक्षय तृतीया पर नमक क्यों खरीदते हैं

*अक्षय तृतीया वैज्ञानिक कारण

*Akshaya Tritiya 2027 kab hai

 *अक्षय तृतीया पर क्या करें क्या न करें

*अक्षय तृतीया राशि अनुसार खरीदारी

*अक्षय तृतीया पौधारोपण

*अक्षय तृतीया टोटके

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अक्षय तृतीया 2027: रवि योग, विनायक चतुर्थी और त्रेता युग का अनोखा संगम

कल्पना कीजिए, एक ऐसा दिन जब सूर्य और चंद्र अपनी अनुकूल स्थिति में हों, जब भगवान विष्णु के पूजन का विशेष फल मिले, और जिस दिन से त्रेता युग की शुरुआत हुई। यह संयोग केवल अक्षय तृतीया के दिन ही संभव है। 09 मई, 2027, रविवार को यह त्रिवेणी संगम और भी दुर्लभ हो जाएगा क्योंकि इस दिन रवि योग जैसा अत्यंत शुभ योग बन रहा है। 

यह सिर्फ एक तिथि नहीं, बल्कि सौभाग्य, समृद्धि और अटूट धन का प्रतीक है। ज्योतिष शास्त्र में इसे ‘सतयुग’ का दर्ज़ा दिया गया है, जहां किया गया हर शुभ कार्य अक्षय (कभी न समाप्त होने वाला) हो जाता है। आइए, जानते हैं क्यों यह दिन सनातन परंपरा में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

अक्षय तृतीया: पौराणिक कथा और शुभता 

अक्षय तृतीया का महत्व कई पौराणिक कथाओं में वर्णित है। सबसे प्रचलित कथा भगवान विष्णु और महर्षि वेदव्यास से जुड़ी है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान विष्णु ने अवतार लेकर परशुराम जी के रूप में पृथ्वी पर अत्याचारियों का विनाश किया था। वहीं दूसरी ओर, महाभारत काल में इस दिन भगवान वेदव्यास ने गणेश जी को लिखाकर महाभारत ग्रंथ की रचना शुरू की थी।

सबसे महत्वपूर्ण कथा यह है कि इसी तिथि को त्रेता युग का प्रारंभ हुआ था, जिससे यह तिथि युगों की शुरुआत का प्रतीक बन गई। साथ ही, दानवीर कर्ण के बारे में कहा जाता है कि इसी दिन उन्होंने सूर्य देव से दान की अक्षय पात्र प्राप्त की थी।

यह तिथि अक्षय (अविनाशी) कहलाती है क्योंकि इस दिन किया गया कोई भी शुभ कार्य, दान या पुण्य कभी समाप्त नहीं होता। यहां तक कि ज्योतिष में इसे ‘अबूझ मुहूर्त’ भी माना गया है, जिसमें बिना मुहूर्त देखे भी कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है।

अक्षय तृतीया के दिन कैसा रहेगा और शुभ मुहूर्त क्या है पूरी जानकारी 

अक्षय तृतीया: 08 में 2027 दिन शनिवार को 11:42 बजे से शुभारंभ होकर 09 में 2027 बजे दिन रविवार को सुबह 09:03 तक रहेगा। 

नक्षत्र: मृगशिरा 

योग: सुकर्मा 

सूर्य: मेष राशि में और चंद्रमा: वृषभ राशि में सुबह 08:56 तक रहेंगे इसके बाद मिथुन राशि में गोचर करेंगे।

अक्षय तृतीया के दिन शुभ मुहूर्त

ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 03:41 बजे से लेकर 04:24 बजे तक

अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:16 बजे से लेकर 12:08 बजे तक 

विजय मुहूर्त: दोपहर 01:53 बजे से लेकर 02:46 बजे तक 

गोधूलि मुहूर्त: 06:15 बजे से लेकर 06:36 बजे तक 

चर मुहूर्त: सुबह 06:40 बजे से लेकर 08:25 बजे तक 

लाभ मुहूर्त: 08:25 बजे से लेकर 10:03 बजे तक 

अमृत मुहूर्त: 10:03 बजे से लेकर 11:42 बजे तक 

शुभ मुहूर्त: दिन के 01:20 बजे से लेकर 02:59 बजे तक

इस दौरान आप पूजा-अर्चना कर सकते हैं 

अक्षय तृतीया: विशिष्ट पूजा विधि 

अक्षय तृतीया पर पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन मुख्य रूप से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने का विधान है।

पूजा सामग्री: चौकी, लाल या पीला वस्त्र, भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर, कमल के फूल, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल), रोली, अक्षत (चावल), धूप, दीप, नैवेद्य (मिष्ठान्न या फल) और सोने या चांदी का एक सिक्का।

विधि:

*01. प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

*02. चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित करें।

*03. सबसे पहले गणेश जी और कुलदेवता का स्मरण करें।

*04. भगवान विष्णु का धूप, दीप, फूल, अक्षत से षोडशोपचार पूजन करें।

*05. ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप कम से कम 108 बार करें।

*06. पूजा के अंत में सोने या चांदी के सिक्के को जल से धोकर भगवान को अर्पित करें और फिर उसे तिजोरी में रखें।

*07. ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र और दान दें।

त्रेता युग की शुरुआत और अक्षय तृतीया 

सनातन धर्म में चार युगों (सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग) का वर्णन है। त्रेता युग का प्रारंभ भी अक्षय तृतीया के दिन ही हुआ था। सतयुग के बाद जब पृथ्वी पर धर्म में कमी आने लगी, तब इस युग की शुरुआत हुई, जिसमें भगवान विष्णु ने वामन और परशुराम जैसे अवतार लिए।

इस युग का संबंध ‘त्रेता’ (तीन) से है, जो तीन प्रमुख गुणों या तीन वेदों का प्रतीक माना गया। चूंकि अक्षय तृतीया के दिन ही यह नया युग आरंभ हुआ, इसलिए यह तिथि नव निर्माण, शुभारंभ और कर्तव्य पथ का प्रतीक बन गई।

यह संबंध यह दर्शाता है कि जिस प्रकार त्रेता युग में भगवान राम ने मर्यादा की स्थापना की, उसी प्रकार अक्षय तृतीया के दिन किए गए कार्य जीवन में मर्यादा, समृद्धि और स्थिरता लाते हैं। इसलिए इस तिथि को युगों के आरंभ का उत्सव मानकर नए कार्यों की नींव रखी जाती है।

अक्षय तृतीया पूजा: स्टेप बाय स्टेप 

यहां अक्षय तृतीया की पूजा की सरल और प्रभावशाली विधि दी जा रही है:

*01. प्रातःकालीन स्नान: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। यदि संभव हो तो गंगाजल मिलाकर स्नान करें।

*02. संकल्प: स्वच्छ वस्त्र धारण करके पूजा स्थल पर बैठें और मन ही मन संकल्प लें कि मैं भगवान विष्णु-लक्ष्मी की पूजा करूंगा।

*03. घर का शुद्धिकरण: पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें।

*04. विष्णु-लक्ष्मी पूजन: भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा का पंचामृत से अभिषेक करें। उन्हें पीले पुष्प, अक्षत, और मिष्ठान अर्पित करें।

*05. मंत्र जप: ‘ॐ लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः’ मंत्र का 108 बार जाप करें।

*06. दान: पूजा के बाद गरीबों, ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, नमक, पंखा या जल का दान करें। दान करते समय यह भावना रखें कि यह अक्षय हो।

*07. आरती: अंत में भगवान की आरती करें और प्रसाद ग्रहण करें।

अक्षय तृतीया: क्या खाएं, क्या न खाएं 

क्या खाएं:

*शाकाहारी भोजन करें। केले, आम, नारियल, खीर, पूरी-हलवा, मौसमी फल विशेष रूप से शुभ माने जाते हैं।

* दान करने से पूर्व स्वयं भी पवित्र भोजन ग्रहण करें।

* घर का बना शुद्ध शाकाहारी भोजन ही ग्रहण करें।

क्या न खाएं:

*तामसिक भोजन (मांस-मदिरा, लहसुन-प्याज) का त्याग करें।

* बासी भोजन या बाजार के अशुद्ध पदार्थों का सेवन न करें।

* दिन में व्रत रखने पर केवल फलाहार या जल लें।

अक्षय तृतीया: क्या करें, क्या न करें 

क्या करें:

* प्रातः स्नान करके पीले वस्त्र धारण करें।

*भगवान विष्णु-लक्ष्मी की विधिवत पूजा करें।

*सोना, चांदी, नमक, वस्त्र, अन्न का दान करें।

*नए व्यवसाय, विवाह, गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य करें।

क्या न करें:

* किसी से झगड़ा न करें, क्रोध का त्याग करें।

*किसी को उधार न दें (दान अलग है, उधार देने से धन की हानि मानी गई है)।

*तामसिक गतिविधियों और अपव्यय से बचें।

*पूजा-पाठ के बिना दिन न बिताएं।

राशि के अनुसार खरीदारी सुझाव 

अक्षय तृतीया पर खरीदारी शुभ मानी जाती है। राशि के अनुसार उचित वस्तु का चयन करें:

*मेष, सिंह, धनु: लाल रंग के वस्त्र, तांबे के बर्तन, सोना खरीदें। व्यापार में निवेश करें।

*वृषभ, कन्या, मकर: चांदी, सफेद वस्त्र, मोती, गाय के घी की खरीदारी करें। भूमि संबंधी कार्य लाभदायक।

*मिथुन, तुला, कुंभ: पन्ना, हरे रंग के वस्त्र, नए वाहन, आभूषण की खरीदारी करें। साझेदारी में निवेश शुभ।

*कर्क, वृश्चिक, मीन: सोना, चांदी, समुद्री संसाधनों से जुड़ी वस्तुएं, मोर पंख खरीदें। मकान या संपत्ति खरीद सकते हैं।

*सामान्य नियम: सोना, चांदी, नमक, नए बर्तन, इलेक्ट्रॉनिक्स, वाहन और कृषि उपकरण की खरीदारी सभी राशियों के लिए शुभ फलदायी होती है।

सोना खरीदने का वैज्ञानिक कारण 

अक्षय तृतीया पर सोना खरीदने की परंपरा के पीछे केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक कारण भी हैं:

*01. खगोलीय स्थिति: यह दिन वर्ष के सबसे शुद्ध और ऊर्जावान दिनों में से एक होता है। इस दिन सूर्य अपनी उच्चतम स्थिति में होता है। सोना एक धातु है जो सूर्य की ऊर्जा को अवशोषित करने की क्षमता रखती है। वैज्ञानिक दृष्टि से, इस दिन खरीदा गया सोना अधिक शुद्ध माना जाता है और उसकी गुणवत्ता उत्तम होती है।

*02. आयुर्वेदिक दृष्टिकोण: सोना (स्वर्ण) शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और ऊर्जा का संचार करता है। वसंत ऋतु के अंत में जब वातावरण में सूक्ष्म परिवर्तन होता है, तब सोना धारण करने से शरीर को संतुलित रखने में मदद मिलती है।

*03. आर्थिक सुरक्षा: पौराणिक मान्यता है कि इस दिन खरीदा गया सोना ‘अक्षय’ यानी कभी कम नहीं होता। वैज्ञानिक रूप से देखें तो यह परंपरा लोगों को निवेश के लिए प्रेरित करती है, जिससे आर्थिक सुरक्षा मिलती है।

अक्षय तृतीया पर नमक क्यों खरीदते हैं? 

नमक को शास्त्रों में ‘रस’ और जीवन की आधारशिला माना गया है। अक्षय तृतीया पर नमक खरीदने के दो प्रमुख कारण हैं:

*01. वैज्ञानिक: नमक को सबसे पुराना परिरक्षक (preservative) माना जाता है। यह वायु और जल से मुक्त रखता है। गर्मी के मौसम की शुरुआत में नया नमक खरीदना स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभदायक होता है।

*02. धार्मिक: मान्यता है कि इस दिन नमक का दान या खरीदारी करने से घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती। यह कुष्ठ रोग (त्वचा रोग) से मुक्ति दिलाने वाला भी माना जाता है।

पौधारोपण के लाभ

अक्षय तृतीया को ‘अखंड सौभाग्य का पर्व’ भी कहा जाता है। इस दिन पौधारोपण करना अत्यंत शुभ माना जाता है:

*01. पर्यावरणीय: यह गर्मी की शुरुआत का समय होता है। पेड़-पौधे लगाने से वातावरण ठंडा रहता है और ऑक्सीजन का संतुलन बना रहता है।

*02. धार्मिक: पीपल, वट, आम या केले के पौधे लगाने से पितरों को शांति मिलती है और घर में सुख-समृद्धि आती है। मान्यता है कि इस दिन लगाया गया पौधा ‘अक्षय’ फल देता है, यानी वह शीघ्र विकसित होता है और दीर्घकालिक छाया प्रदान करता है।

रवि योग का जीवन पर प्रभाव 

रवि योग तब बनता है जब रविवार का दिन हो और उस दिन शतभिषा या धनिष्ठा नक्षत्र हो या विशेष संयोग बन रहा हो। 09 मई 2027 को यह दुर्लभ संयोग बन रहा है। रवि योग में किए गए कार्यों का प्रभाव:

*01. आत्मविश्वास में वृद्धि: सूर्य (रवि) आत्मा, नेतृत्व और प्रतिष्ठा के कारक हैं। इस योग में किया गया कोई भी कार्य व्यक्ति के आत्मविश्वास को बल देता है। नई नौकरी या व्यवसाय की शुरुआत करने से प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है।

*02. रोगों से मुक्ति: सूर्य को आरोग्य का देवता माना गया है। इस दिन किया गया दान या पूजन शारीरिक कष्टों को दूर करता है।

*03. सकारात्मक ऊर्जा: इस योग में किए गए कार्य नकारात्मकता को समाप्त करते हैं। घर में स्थायित्व आता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। इस दिन जल का दान या पीपल वृक्ष की पूजा अत्यधिक फलदायी होती है।

नए व्यवसाय की शुरुआत के उपाय 

अक्षय तृतीया व्यवसाय शुरू करने के लिए सर्वश्रेष्ठ दिन है। उपाय इस प्रकार हैं:

*01. पूजा में गणेश-लक्ष्मी का ध्यान करें और ‘ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं लक्ष्मी नारायणाय नमः’ मंत्र का जाप करें।

*02. नई बही-खाता (लेज़र) की पूजा करें। उसमें स्वस्तिक बनाकर ‘शुभ’ और ‘लाभ’ लिखें।

*03. व्यवसाय स्थल पर हल्दी-चावल से तिलक करें।

*04. पहली बिक्री या लेनदेन को पूजा के तुरंत बाद शुरू करें।

*05. नए व्यवसाय के दस्तावेज़ों पर केसर या चंदन से तिलक करके रखें।

जल संरक्षण का महत्व क्या है 

अक्षय तृतीया के दिन जल संरक्षण का विशेष महत्व बताया गया है। यह ग्रीष्म ऋतु का आरंभ है, जब जल की कमी होने लगती है।

*01. धार्मिक दृष्टि: इस दिन प्याऊ लगवाना, तालाब की सफाई करना या कुओं में जल भरना अनंत पुण्य देता है। इसे ‘अक्षय पुण्य’ कहा गया है।

*02. सामाजिक दृष्टि: जल संरक्षण से जीवनदायिनी शक्ति का सम्मान होता है। पक्षियों के लिए पानी रखना और पेड़ों को जल देना भी इसी श्रेणी में आता है। यह कार्य न सिर्फ पर्यावरण बचाता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षा सुनिश्चित करता है।

अक्षय तृतीया: वैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक विवेचना 

*वैज्ञानिक: यह तिथि वसंत के अंत और ग्रीष्म के आरंभ का संधिकाल है। इस समय सूर्य की किरणों में विशेष औषधीय गुण होते हैं। सोना, जो सूर्य की ऊर्जा का वाहक है, इस दिन खरीदने से उसकी शुद्धता एवं गुणवत्ता सुनिश्चित होती है। पौधारोपण पर बल पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है।

*सामाजिक: यह पर्व सामाजिक समरसता को बढ़ावा देता है। दान-पुण्य, जल संरक्षण, वृक्षारोपण जैसे कार्य समाज के कमजोर वर्गों और प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व सिखाते हैं।

*आर्थिक: अक्षय तृतीया भारतीय अर्थव्यवस्था में सोने की खरीदारी का सबसे बड़ा पर्व है। यह ज्वैलरी, ऑटोमोबाइल, रियल एस्टेट जैसे उद्योगों को गति प्रदान करता है।

*धार्मिक एवं आध्यात्मिक: यह ‘अबूझ मुहूर्त’ है, जहां कर्मकांड बिना मुहूर्त के किए जा सकते हैं। ‘अक्षय’ का अर्थ है – कभी न समाप्त होने वाला। यह सिखाता है कि सत्कर्म, दान और त्याग का फल सीमित नहीं होता, बल्कि अनंत काल तक जीवन में समृद्धि लाता है।

अक्षय तृतीया के अनसुलझे पहलू 

अक्षय तृतीया को लेकर कई रोचक तथ्य हैं जिन पर आमतौर पर चर्चा नहीं होती:

*01. त्रेतायुग का यही एकमात्र अवशेष: पुराणों के अनुसार, अक्षय तृतीया के दिन ही गंगा देवी पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं। भागीरथ के तप से गंगा का धरती पर आगमन भी इसी तिथि को माना जाता है, जिसे प्रायः अनदेखा कर दिया जाता है।

*02. कुबेर की पूजा का विस्मृत विधान: आज अधिकांश लोग केवल लक्ष्मी-विष्णु की पूजा करते हैं, जबकि प्राचीन ग्रंथों में इस दिन कुबेर (धन के कोषाध्यक्ष) की विशेष पूजा का उल्लेख है। ऐसा माना जाता था कि इस दिन कुबेर की पूजा करने से धन का भंडार कभी रिक्त नहीं होता।

*03. उत्तरायण-दक्षिणायन का संधिकाल: कई ज्योतिषियों के अनुसार, अक्षय तृतीया के दिन सूर्य की गति में सूक्ष्म परिवर्तन होता है, जो ऊर्जा के स्तर को प्रभावित करता है। यह पहलू आधुनिक विज्ञान में अभी पूरी तरह अन्वेषित नहीं है।

अक्षय तृतीया: पांच प्रश्न और सटीक उत्तर 

प्रश्न *01: क्या अक्षय तृतीया पर मुंडन (बाल कटवाना) शुभ होता है?

उत्तर:हां, इस दिन मुंडन करना अत्यंत शुभ माना जाता है। विशेषकर बच्चों का पहला मुंडन (मुंडन संस्कार) इस तिथि पर करने से दीर्घायु और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

प्रश्न *02: क्या इस दिन शाम के समय पूजा कर सकते हैं?

उत्तर:अक्षय तृतीया की पूजा प्रातःकाल करना सर्वोत्तम होता है क्योंकि यह तिथि प्रातःकालीन मानी गई है। यदि किसी कारण से प्रातः न कर सकें तो दोपहर तक पूजा कर लेनी चाहिए। रात्रि में विशेष पूजा का विधान नहीं है।

प्रश्न *03: क्या अक्षय तृतीया पर श्राद्ध या तर्पण कर सकते हैं?

उत्तर:अक्षय तृतीया पितरों के लिए भी महत्वपूर्ण है। इस दिन पितरों का तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध करना ‘अक्षय फल’ देता है। यह पितृपक्ष के समान ही माना जाता है।

प्रश्न *04: क्या इस दिन बिना पूजा के केवल दान करना फलदायी है?

उत्तर:हां, यदि पूजा संभव न हो तो मात्र दान करना भी अत्यधिक फलदायी होता है। गरीबों, ब्राह्मणों, गाय, कौवे, चींटी को अन्न-जल दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।

प्रश्न *05: क्या अक्षय तृतीया पर विवाह कर सकते हैं?

उत्तर:अक्षय तृतीया को ‘अबूझ मुहूर्त’ में गिना जाता है। इस दिन बिना मुहूर्त देखे भी विवाह किया जा सकता है। यह विवाह हेतु सर्वश्रेष्ठ तिथियों में से एक है।

अक्षय तृतीया: तीन यूनिक टोटके 

टोटका *01: धन वृद्धि का रहस्य

एक नए पीले वस्त्र में 11 साबुत हल्दी की गांठें बांधकर अपनी तिजोरी या पूजा स्थल में रख दें। साथ ही, एक लोटे में जल, केसर, और इलायची डालकर पूजा स्थल पर रखें। अगले दिन इस जल को घर के मुख्य द्वार पर छिड़क दें। ऐसा करने से घर में धन का प्रवाह निरंतर बना रहता है।

टोटका *02: आकर्षण बढ़ाने का उपाय

अक्षय तृतीया के दिन सुबह स्नान के बाद एक तांबे के लोटे में देशी गाय का दूध, मुल्तानी मिट्टी, और चंदन मिलाकर शरीर पर लगाएं और फिर स्नान करें। मान्यता है कि इससे शरीर में अपार ओज और चेहरे पर अद्भुत आकर्षण आता है।

टोटका *03: व्यवसाय में स्थिरता

अपने व्यवसाय स्थल पर एक नई बही-खाता रखें। उस पर चावल, हल्दी, और लाल चंदन से ‘ॐ’ और ‘स्वस्तिक’ बनाएं। उस बही में पहले पन्ने पर ‘शुभ लाभ’ लिखें और उस पर 05 साबुत सुपारी रख दें। इससे व्यवसाय में स्थिरता और वृद्धि होती है।

"डिस्क्लेमर"

अस्वीकरण: यह ब्लॉग केवल सूचनात्मक, धार्मिक एवं ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित है। यहां दी गई सभी सूचनाएं विभिन्न पौराणिक ग्रंथों, ज्योतिषीय गणनाओं और सामाजिक परंपराओं के संकलन पर आधारित हैं। तिथि, मुहूर्त, योग, नक्षत्र आदि की गणना अनुमानित है तथा यह स्थानीय पंचांग के अनुसार भिन्न हो सकती है। पाठकों से अनुरोध है कि किसी भी शुभ कार्य, पूजा-पाठ, खरीदारी या निवेश हेतु किसी योग्य आचार्य, ज्योतिषी या पंडित से परामर्श अवश्य लें।

यह ब्लॉग किसी भी प्रकार की आर्थिक सलाह, निवेश सलाह, चिकित्सा सलाह या कानूनी सलाह का विकल्प नहीं है। सोना, चांदी, संपत्ति या किसी अन्य वस्तु में निवेश हेतु बाजार के उतार-चढ़ाव और विशेषज्ञों की राय अवश्य लें। लेखक या प्रकाशक द्वारा दी गई जानकारी के उपयोग से होने वाले किसी भी प्रकार के हानि, लाभ, या अन्य परिणाम के लिए कोई उत्तरदायित्व स्वीकार नहीं किया जाता है। यह ब्लॉग धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं को सम्मान देते हुए प्रस्तुत किया गया है।


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