नवरात्रि में कन्या पूजन क्यों जरूरी है? शास्त्रीय कारण जानें विस्तार से

"नवरात्रि में कन्या पूजन क्यों जरूरी है? जानें शास्त्रीय महत्व, सही नियम, कन्या को क्या दें, और अनसुलझे पहलू। हिंदी में संपूर्ण मार्गदर्शन"

"A woman applying tilak with roli and rice grains to nine girls during Navratri, a sacred scene from the Indian Sanatan tradition."

"नवरात्रि में कन्या पूजन: देवी का बाल रूप और उसका शास्त्रीय महत्व"

*नवरात्रि के पावन पर्व पर घर-घर में देवी के नौ रूपों की आराधना की जाती है। इसी कड़ी में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और मार्मिक रिवाज है - कन्या पूजन। कल-कल बहती नदियों की तरह निश्छल, फूलों की तरह कोमल और सूरज की किरणों की तरह प्रखर... इन्हीं विशेषताओं को अपने में समेटे छोटी कन्याओं को नवरात्रि में देवी का स्वरूप मानकर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है।

*यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक एवं सामाजिक संकल्पना है। जब एक साधक भक्तिभाव से किसी कन्या के चरण छूता है, तो वह दरअसल उस बालिका में विराजमान नारी शक्ति के मूलभूत तेज को प्रणाम करता है। शास्त्रों के अनुसार, हर कन्या में आदि शक्ति का वास होता है, विशेषकर नौ वर्ष तक की आयु की कुमारिकाओं में तो देवी साक्षात् प्रकट होती हैं।

*इस ब्लॉग के माध्यम से हम आपको कन्या पूजन के शास्त्रीय महत्व, विस्तृत नियम, सामाजिक प्रभाव और व्यावहारिक सवालों के जवाब देंगे। क्या आप जानते हैं कि कन्या पूजन में एक लड़के को भी क्यों बिठाया जाता है? यदि कन्या न मिले तो क्या उपाय है? शाम को पूजन किया जा सकता है या नहीं? ऐसे ही तमाम प्रश्नों का उत्तर हम आपको यहां देंगे।

*नवरात्रि का यह अनुष्ठान हमें यह याद दिलाता है कि समाज में नारी का, और विशेष रूप से बालिका का, सम्मान सर्वोपरि है। आइए, इस पवित्र परंपरा के हर पहलू को गहराई से समझें और न केवल इसे एक रिवाज के तौर पर, बल्कि एक सार्थक सामाजिक-आध्यात्मिक कार्य के रूप में अपनाएं।

"नीचे दिए गए विषयों पर विस्तार से पढ़ें रंजीत के ब्लॉग पर" 

*01.कन्या पूजन का शास्त्रीय महत्व क्या है 

*02.कन्या पूजन का क्या महत्व है और क्या है नियम? 

*03.नवरात्रि में कन्या पूजा क्यों जरूरी है? 

*04.कन्या पूजन की परंपरा से लड़कियों की कौन सी स्थिति में परिवर्तन आता है? 

*05.कुमारिका पूजन क्या है और इस पूजन में एक लड़के को क्यों बिठाया जाता है? 

*06.कन्या पूजन के बाद कन्या को क्या देना चाहिए? 

*07.कन्या पूजन में कन्या ना मिले तो क्या करें? 

*08.क्या शाम के समय कन्या पूजन कर सकते हैं? 

*09.कन्या पूजन के बाद कलश का क्या करना चाहिए? 

*10.ब्लॉग से संबंधित प्रश्न और उसका उत्तर? 

*11.अनसूलझे पहलुओं की जानकारी?

"कन्या पूजन का शास्त्रीय महत्व क्या है"? 

*कन्या पूजन एक ऐसी वैदिक एवं तांत्रिक परंपरा है, जिसकी जड़ें हमारे शास्त्रों में गहराई तक धंसी हुई हैं। इसका महत्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक भी है।

*01. देवी का बाल स्वरूप:

*शास्त्रों में मान्यता है कि नौ वर्ष तक की कुमारी कन्या में मां दुर्गा का निर्मल, निश्छल और पूर्णतः पवित्र स्वरूप निवास करता है। इस आयु में कन्या 'नव कुमारी' कहलाती है और इसे देवी का 'बाल रूप' माना जाता। देवी पुराण, कालिकापुराण आदि ग्रंथों में कुमारी पूजन का विशेष महत्व बताया गया है। यह मान्यता है कि जिस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण का बाल रूप (बाल गोपाल) पूजनीय है, उसी प्रकार देवी का बाल रूप (कुमारी) भी पूजनीय है।

*02. तांत्रिक एवं यौगिक दृष्टिकोण:

*तंत्र शास्त्र के अनुसार, मानव शरीर में देवी-देवताओं के विभिन्न ऊर्जा केंद्र स्थित हैं। कुमारी कन्या में यह ऊर्जा शुद्ध और अबाधित रूप से विद्यमान रहती है। कन्या पूजन के माध्यम से साधक उस कोमल पर अतिशय शक्तिशाली ऊर्जा से आशीर्वाद एवं शक्ति का संचार प्राप्त करता है। यह एक प्रकार का यौगिक साधना भी है, जहां भक्त देवी के इस सूक्ष्म रूप का ध्यान कर उसे प्रसन्न करता है।

*03. नवदुर्गा का साक्षात् प्रतिनिधित्व:

*नवरात्रि के नौ दिन देवी के नौ रूपों को समर्पित हैं। परंपरा के अनुसार, अष्टमी या नवमी के दिन नौ कन्याओं के रूप में इन नौ देवियों (शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री) का आह्वान कर पूजन किया जाता है। प्रत्येक कन्या एक विशेष देवी का प्रतिनिधित्व करती है और उन्हीं के समान फल प्रदान करती है।

*04. नारी जाति के प्रति श्रद्धा का प्रतीक:

*यह परंपरा समाज में नारी के दिव्य और पूजनीय स्थान को रेखांकित करती है। शास्त्र कहते हैं - 'यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमन्ते तत्र देवता' अर्थात जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। कन्या पूजन इसी सिद्धांत का सजीव अनुप्रयोग है। यह समाज को यह संदेश देता है कि बालिकाएं देवी स्वरूप हैं, उनका सम्मान एवं संरक्षण हमारा परम धर्म है।

*05. पाप-कर्मों के प्रायश्चित का मार्ग:

*कई धर्म ग्रंथों में यह भी उल्लेख मिलता है कि कन्या पूजन से भक्त के पाप-कर्म नष्ट होते हैं और पुण्य की प्राप्ति होती है। कन्या के रूप में देवी की पूजा करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है तथा सभी प्रकार के संकट दूर होते हैं।

*06. सामाजिक संदेश:

*शास्त्रीय महत्व के साथ-साथ, यह परंपरा एक शक्तिशाली सामाजिक संदेश भी देती है। यह बाल विवाह जैसी कुरीतियों के विरुद्ध एक मौन वक्तव्य है, क्योंकि इसमें नौ वर्ष से कम आयु की कन्याओं को देवतुल्य माना गया है, न कि विवाह योग्य। इस प्रकार, कन्या पूजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान न होकर एक समग्र जीवन दर्शन है जो आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ एक स्वस्थ समाज के निर्माण का मार्ग भी प्रशस्त करता है।

"कन्या पूजन का क्या है महत्व और क्या है नियम"? 

*कन्या पूजन का महत्व बहुआयामी है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह देवी प्रसन्नता का सर्वोत्तम उपाय माना जाता है। मान्यता है कि प्रसन्न कन्याएं भक्त के घर में सुख-समृद्धि, संतान सुख एवं मान-सम्मान की वर्षा करती हैं। यह अनुष्ठान घर-परिवार से नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर सकारात्मक वातावरण का निर्माण करता है। सामाजिक स्तर पर यह बालिकाओं के प्रति सम्मान का भाव जगाता है और लिंग-भेद की भावना को मिटाने में सहायक होता है।

*कन्या पूजन के प्रमुख नियम:

*01. कन्या की आयु एवं संख्या: सामान्यतः दो से दस वर्ष तक की कुमारी कन्याओं को पूजा में बैठाया जाता है। इनकी संख्या 1, 2, 4, 6, 8, या 9 हो सकती है, लेकिन नौ कन्याओं का पूजन सर्वोत्तम माना जाता है। प्रत्येक कन्या एक विशेष देवी का प्रतिनिधित्व करती है।

*02. समय: कन्या पूजन का सर्वश्रेष्ठ समय दिन का पूर्वाह्न (सुबह) है। दोपहर तक पूजन संपन्न कर लेना चाहिए। (शाम के समय के बारे में विस्तार से आगे बताया गया है)।

*03. शुद्धता: कन्याएं स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनकर आएं, यह ध्यान रखना चाहिए। पूजा स्थल और भक्त को भी पवित्र रहना चाहिए।

*04. आसन एवं स्वागत: कन्याओं के बैठने के लिए भूमि पर स्वच्छ आसन (आसनी) बिछाएं। सर्वप्रथम उनके पैर धोएं (पाद्य अर्पित करें), फिर अक्षत, रोली से तिलक करें।

*05. मौली बांधना: प्रत्येक कन्या के दाहिने हाथ में लाल या पीले रंग की मौली (कलावा) बांधी जाती है, जो उन्हें देवी का प्रतीक मानकर सुरक्षा कवच प्रदान करती है।

*06. भोजन (भोग): कन्याओं को शुद्ध शाकाहारी, सात्विक भोजन ही कराया जाता है। पूरी, हलवा, चने, काले चने की दाल, और मीठे चावल (खीर) जैसे व्यंजन परंपरागत रूप से दिए जाते हैं। भोजन कराने से पहले उन्हें दही-शक्कर या मखाने का प्रसाद दिया जाता है।

*07. दक्षिणा एवं उपहार: भोजन के बाद कन्याओं को नए वस्त्र, खिलौने, पुस्तकें, और दक्षिणा (धनराशि) आदि देकर सम्मानपूर्वक विदा किया जाता है। यह दक्षिणा शुभ मानी जाती है, इसमें कंजूसी नहीं करनी चाहिए।

*08. विदाई: अंत में कन्याओं के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लेना चाहिए और उन्हें मीठा बोलकर विदा करना चाहिए।

*इन नियमों का पालन करते हुए किया गया कन्या पूजन अवश्य ही फलदायी होता है और देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

"नवरात्रि में कन्या पूजन करना क्यों जरूरी है"? 

*नवरात्रि में कन्या पूजन का सीधा संबंध देवी के 'बाल रूप' की उपासना से है। नवरात्रि देवी आदिशक्ति की आराधना का पर्व है। शास्त्रों के अनुसार, देवी जब सबसे अधिक निर्मल, शक्तिशाली और कल्याणकारी स्वरूप में होती हैं, तो वह उनका बाल रूप ही होता है। नौ वर्ष से कम उम्र की कन्या को इसी दिव्य बाल रूप का प्रतिनिधि माना जाता है।

*इसके पीछे एक गहन आध्यात्मिक तर्क भी है। माना जाता है कि इस आयु तक कन्या पूर्णतः निष्कलंक, निश्छल और सात्विक होती है। उसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे विकार नहीं के बराबर होते हैं। इस शुद्धता के कारण ही देवी का वास उनमें सहज रूप से होता है। जब हम उनकी पूजा करते हैं, तो वास्तव में हम उस शुद्ध चैतन्य शक्ति की पूजा करते हैं जो उनमें विद्यमान है।

*एक अन्य मान्यता के अनुसार, नवरात्रि के नौ दिनों की तपस्या के बाद देवी प्रसन्न होती हैं और भक्त के घर आती हैं। कन्याओं के रूप में ही वे भक्त के घर भोजन ग्रहण करती हैं। इसलिए इन कन्याओं का सत्कार देवी का सत्कार माना जाता है। इस प्रकार, कन्या पूजन नवरात्रि साधना का चरमोत्कर्ष और देवी को प्रसन्न करने का एक सरल, सहज लेकिन अत्यंत प्रभावशाली माध्यम है।

"कन्या पूजन की परंपरा से लड़कियों की कौन सी स्थिति में परिवर्तन आता है"? 

*कन्या पूजन की सैकड़ों वर्ष पुरानी यह परंपरा, यदि सही भावना के साथ निभाई जाए, तो लड़कियों की सामाजिक-मनोवैज्ञानिक स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती है।

*01. सम्मान का भाव: जब समाज के लोग एक छोटी बच्ची के पैर छूकर उसे देवी का दर्जा देते हैं, तो उस बच्ची के मन में आत्म-सम्मान और आत्मविश्वास पैदा होता है। वह स्वयं को कमतर नहीं, बल्कि विशेष और पूजनीय समझती है।

*02. लिंग भेद की मानसिकता में कमी: यह परंपरा एक स्पष्ट संदेश देती है कि लड़की 'बोझ' नहीं, बल्कि 'वरदान' है। इससे समाज में फैली 'बेटा-बेटी' के भेदभाव वाली सोच को चुनौती मिलती है और लिंग अनुपात सुधारने में सहायता मिल सकती है।

*03. शिक्षा एवं विकास को बल: आजकल कई परिवार कन्या पूजन के अवसर पर कन्याओं को पुस्तकें, स्टेशनरी, या शैक्षणिक वस्तुएं भेंट करते हैं। यह प्रतीकात्मक रूप से बालिका शिक्षा को प्रोत्साहन देता है और यह संदेश देता है कि उनका विकास ज़रूरी है।

*04. सुरक्षा का अधिकार: देवी के रूप में पूजी जाने वाली कन्या के प्रति समाज की सुरक्षा और देखभाल की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। यह परंपरा अप्रत्यक्ष रूप से बाल संरक्षण एवं बाल अधिकारों को मजबूती देती है।

*हालांकि, यह तभी सार्थक है जब यह पूजा केवल एक वार्षिक रस्म बनकर न रह जाए, बल्कि इसके पीछे का भाव सालभर बालिकाओं के कल्याण और सम्मान के लिए काम करने का हो।

Girls in traditional attire sitting during Kanya Pujan and the boy sitting in the middle,

"कुमारिका पूजन: जहां कन्याओं को देवी का रूप मानकर उनकी अर्चना की जाती है और साथ में बटुक (भैरव रूप) का पूजन अनिवार्य होता है।"

"कुमारिका पूजन क्या है और इस पूजन में एक लड़के को क्यों बिठाया जाता है"? 

*कुमारिका पूजन, कन्या पूजन का ही एक और नाम है, जिसमें विशेष रूप से 'कुमारी' (अविवाहित बालिका) की पूजा की जाती है। तंत्र शास्त्र में इसका विशेष विधान है। कुमारी को देवी का सबसे शक्तिशाली रूप माना गया है। इस पूजन में देवी के नौ स्वरूपों के अनुरूप नौ कुमारियों की पूजा की जाती है, जिन्हें नव कुमारी कहते हैं।

*पूजन में लड़के (कुमार/बटुक) को बिठाने का रहस्य:

*नवरात्रि में कई स्थानों पर आठ कन्याओं के साथ एक कुमार (लड़का) भी पूजा में बैठाया जाता है। इसे 'कुमार' या 'बटुक' पूजन कहते हैं। इसके पीछे कई आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक कारण हैं:

*01. शिव-शक्ति के संयोग का प्रतीक: सनातन दर्शन में सृष्टि का आधार पुरुष (शिव-तत्त्व) और प्रकृति (शक्ति-तत्त्व) का समन्वय है। आठ कन्याएं अष्टशक्ति (आठ प्रकार की दैवीय शक्तियां) का प्रतिनिधित्व करती हैं, तो वहीं एक कुमार भगवान शिव के बाल रूप (बटुक भैरव) का प्रतिनिधि माना जाता है। इस प्रकार यह पूजन शिव और शक्ति के पूर्णतम मिलन एवं सृष्टि के संतुलन का प्रतीक है

*02. संपूर्णता का भाव: नौ का अंक पूर्णता का सूचक है। आठ दिशाओं (अष्टदिक्पाल) और एक ऊर्ध्व (ऊपर) या नाभि (केंद्र) के रूप में नौ की संख्या पूर्ण ब्रह्मांड का द्योतक है। कुमार को केंद्र या ऊर्ध्व स्थान दिया जाता है, जिससे पूजा संपूर्ण हो जाती है।

*03. सामाजिक संतुलन: यह प्रथा यह भी दर्शाती है कि धर्म केवल एक लिंग तक सीमित नहीं है। देवी पूजन में भी पुरुष तत्व (कुमार) का समावेश होता है, जो लैंगिक समानता और पूरकता का संकेत देता है। इससे यह संदेश जाता है कि समाज में बालक और बालिका दोनों का समान महत्व है।

*04. तांत्रिक महत्व: तंत्र साधना में बटुक भैरव को देवी का रक्षक और सेवक माना गया है। देवी के साथ उनके पूजन से साधना पूर्ण और सफल होती है तथा साधक को किसी प्रकार की ऊर्जात्मक अशुद्धि या बाधा का सामना नहीं करना पड़ता।

*इस प्रकार, कुमारिका पूजन में कुमार को शामिल करना एक गहन सांकेतिक प्रक्रिया है, जो आध्यात्मिक पूर्णता और सामाजिक समरसता दोनों को ही दर्शाता है।

"कन्या पूजन के बाद कन्या को क्या देना चाहिए"? 

*कन्या पूजन के बाद कन्या को दिया जाने वाला भेंट (दक्षिणा) इस अनुष्ठान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसे केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि देवी को प्रसन्न करने का एक साधन माना जाता है। दान में कंजूसी नहीं करनी चाहिए।

*पारंपरिक रूप से निम्नलिखित वस्तुएं दी जाती हैं:

*01. नए वस्त्र: प्रत्येक कन्या को उसकी रुचि के अनुसार नए कपड़े या चुनरी (दुपट्टा) अवश्य देना चाहिए। लाल या पीला रंग शुभ माना जाता है।

*02. भोजन एवं मिष्ठान्न: सबसे पहले उन्हें पूर्ण सात्विक एवं स्वादिष्ट भोजन कराया जाता है। भोजन के बाद मीठा प्रसाद (जैसे हलवा-पूरी, खीर, मिठाई) दिया जाता है।

*03. दक्षिणा (धनराशि): भोजन के बाद प्रत्येक कन्या को शुभ मूल्यवर्ग (जैसे 11, 21, 51, 101, 501 रुपये) में दक्षिणा देनी चाहिए। राशि आपकी श्रद्धा और सामर्थ्य पर निर्भर करती है, लेकिन इसे उदारतापूर्वक देना चाहिए।

*04. उपयोगी उपहार: परंपरा को आधुनिक संदर्भ में जोड़ते हुए, उन्हें पुस्तकें, स्टेशनरी का सामान, बैग, खिलौने, या कोई शैक्षणिक वस्तु भी दी जा सकती है। इससे बच्चियों को पढ़ाई के प्रति प्रोत्साहन मिलता है।

*05. सुहाग की वस्तुएं (वैवाहिक कन्याओं के लिए): यदि कोई कन्या विवाहित है (जो कम उम्र में दुर्लभ है), तो उसे सिंदूर, बिंदी, चूड़ी, मेहंदी आदि सुहाग की वस्तुएं देना शुभ माना जाता है।

*सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कन्याओं को प्रेम, आदर और आशीर्वाद के साथ विदा करें। दान देते समय भक्ति और श्रद्धा का भाव प्रमुख होना चाहिए।

"कन्या पूजन में कन्या ना मिले तो क्या करें"

*यह एक व्यावहारिक समस्या है, खासकर छोटे परिवारों या एकल परिवारों में। शास्त्रों में इस स्थिति के लिए भी विकल्प बताए गए हैं। घबराने की आवश्यकता नहीं है।

*01. अन्य बालिकाओं को आमंत्रित करें: पड़ोस, रिश्तेदार, या मित्रों की बालिकाओं को पूजन के लिए आमंत्रित किया जा सकता है। आजकल कई आवासीय समितियां सामूहिक कन्या पूजन का आयोजन भी करती हैं।

*02. किसी एक कन्या का पूजन: यदि नौ कन्याएं उपलब्ध न हों, तो एक या दो कन्याओं का भी पूजन किया जा सकता है। शास्त्र कहते हैं कि श्रद्धापूर्वक की गई एक कन्या की पूजा भी देवी को प्रसन्न करने के लिए पर्याप्त है।

*03. कन्या के प्रतीक का पूजन: यदि कोई भी कन्या उपलब्ध न हो (जो अत्यंत दुर्लभ स्थिति है), तो कल्पना द्वारा भी पूजन किया जा सकता है। इसके लिए एक स्वच्छ आसन पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर अक्षत रखें और मानसिक रूप से वहां देवी के बाल रूप की कल्पना करके उनका पूजन, आह्वान और भोग अर्पित करें। भावना सर्वोपरि है।

*04. गुड़िया का प्रयोग (विशेष परिस्थिति में): कुछ परंपराओं में, विशेषकर जहां तांत्रिक विधि से पूजन होता है, वहां नई, सुंदर गुड़िया को कन्या का प्रतिनिधि मानकर पूजा जाता है। लेकिन यह विधि सामान्य गृहस्थों के लिए अनुशंसित नहीं है। कन्या का सान्निध्य ही श्रेष्ठ है।

*सबसे अच्छा यह है कि पूजन की तैयारी पहले से कर लें और कन्याओं को पहले ही आमंत्रित कर लें, ताकि ऐसी स्थिति न आए।

"क्या शाम के समय कन्या पूजन कर सकते हैं"? 

*शास्त्रीय दृष्टि से कन्या पूजन के लिए सुबह का समय (पूर्वाह्न काल) सर्वोत्तम माना गया है। विशेष रूप से नवरात्रि की अष्टमी या नवमी तिथि के सूर्योदय के बाद से लेकर दोपहर 12 बजे तक का समय शुभ माना जाता है।

"शाम के समय पूजन को अशुभ क्यों माना जाता है"?

*01. सात्विकता का समय: सुबह का समय प्रकाश, ऊर्जा और सात्विकता का प्रतीक है। कन्या पूजन एक सात्विक अनुष्ठान है, इसलिए इसके लिए सुबह का समय उपयुक्त है।

*02. देवी का प्रकाश स्वरूप: देवी प्रकाश और ऊर्जा की अधिष्ठात्री हैं। दिन के उजाले में उनके इस स्वरूप की पूजा अधिक फलदायी मानी जाती है।

*03. राक्षसी प्रवृत्ति का भय: प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, सूर्यास्त के बाद रजोगुण और तमोगुण प्रबल होते हैं। शाम या रात्रि में कन्याओं का आह्वान करने पर अशुद्ध या नकारात्मक शक्तियों के आने का भय रहता है।

*04. बालिकाओं की सुविधा: व्यावहारिक रूप से भी, शाम के समय छोटी बच्चियों को बाहर बुलाना या उनका भोजन कराना सही नहीं होता। उनकी दिनचर्या और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भी सुबह का समय बेहतर है।

*क्या कोई अपवाद है?

*तांत्रिक मत के कुछ विशेष अनुष्ठानों में रात्रि काल में भी कुमारी पूजन का विधान है, लेकिन वह सामान्य गृहस्थों के लिए नहीं, बल्कि विशेष साधकों के लिए है। अतः सामान्य नवरात्रि पूजन में शाम के समय कन्या पूजन करने से बचना चाहिए और इसे दिन के उजाले में ही संपन्न करना उचित रहता है।

"कन्या पूजन के बाद कलश का क्या करना चाहिए"? 

*नवरात्रि में स्थापित कलश (घट) की पूजा नौ दिनों तक चलती है। कन्या पूजन के बाद, विशेषकर नवमी के दिन, इस कलश का विसर्जन किया जाता है। यह नवरात्रि समापन का एक महत्वपूर्ण चरण है।

*कलश विसर्जन की सही विधि:

*01. समय: कन्या पूजन के बाद, नवमी तिथि के दिन ही कलश का विसर्जन कर देना चाहिए। कुछ परंपराओं में दशमी (विजयादशमी) के दिन सुबह भी विसर्जन किया जाता है।

*02. पूजन: विसर्जन से पहले कलश की अंतिम पूजा करें। उसमें लगे नारियल, मौली, आम के पत्ते आदि को हटाया नहीं जाता।

*03. स्थान: कलश को किसी पवित्र जल स्रोत जैसे नदी, तालाब, या समुद्र में विसर्जित करना श्रेष्ठ है। यदि यह संभव न हो, तो घर के किसी पौधे (विशेषकर तुलसी) की जड़ में या बगीचे में जमीन खोदकर उसका जल चढ़ा दें और कलश को वहीं दबा दें।

*04. विधि: कलश को सिर पर रखकर या हाथ में लेकर जल स्रोत तक ले जाएं। वहां फिर से थोड़ी पूजा करके जल में धीरे से उतार दें। विसर्जन के समय मंत्र "यानि कानि च पापानि जन्मांतरकृतानि च..." का उच्चारण कर सकते हैं।

*05. घट सामग्री का उपयोग: कलश में डाला गया जल पवित्र होता है। इसे घर में छिड़काव करने से वातावरण शुद्ध होता है। नारियल को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जा सकता है। कलश के नीचे बिछाए गए जौ को घर के बर्तन में रख दें और बाद में उन्हें बो दें या किसी पवित्र स्थान पर डाल दें।

*ध्यान रखें: कलश विसर्जन के बाद घर के मुख्य द्वार पर स्वस्तिक बनाएं और देवी से घर में सदैव उनकी कृपा बनाए रखने की प्रार्थना करें। इस प्रकार, कन्या पूजन और कलश विसर्जन के साथ नवरात्रि की पूर्ण साधना संपन्न होती है।

"प्रश्न-उत्तर: कन्या पूजन से जुड़े कुछ सामान्य प्रश्न" 

प्रश्न *01: क्या विवाहित महिला को कन्या पूजन में बिठाया जा सकता है?

*उत्तर:पारंपरिक रूप से कन्या पूजन का अर्थ 'कुमारी पूजन' ही है, अर्थात अविवाहित बालिकाओं का पूजन। शास्त्रों में नौ वर्ष से कम आयु की कुमारियों को ही देवी का शुद्धतम रूप माना गया है। हालांकि, कुछ परंपराओं में विवाहित युवतियों (सुहागिन) को भी सम्मानपूर्वक भोजन कराया जाता है, लेकिन मुख्य पूजन (आसन पर बिठाकर पैर धोना, मौली बांधना) विशेष रूप से कुमारी कन्याओं के लिए ही निर्धारित है।

प्रश्न *02: कन्या पूजन में किस आयु की कन्या को प्राथमिकता देनी चाहिए?

*उत्तर:दो से दस वर्ष के मध्य की आयु को उपयुक्त माना गया है। लेकिन दो से नौ वर्ष तक की आयु को सर्वोत्तम माना जाता है। विशेषकर तीन, पांच या सात वर्ष की कन्या को अत्यंत पुण्य दायी माना जाता है। मान्यता है कि इस आयु में कन्या में देवी का वास सहज रूप से रहता है।

प्रश्न *03: क्या अपनी ही पुत्री का पूजन कर सकते हैं?

*उत्तर: हां, बिल्कुल कर सकते हैं। अपनी पुत्री भी तो देवी का ही रूप है। लेकिन यदि संभव हो तो अन्य परिवारों की कन्याओं को भी शामिल करना अधिक शुभ माना जाता है, क्योंकि इससे समाज के प्रति उदारता और सामूहिक कल्याण की भावना प्रबल होती है। पूजन के बाद उसे भी समान रूप से भोजन और उपहार देना चाहिए।

प्रश्न *04: क्या कन्या पूजन केवल नवरात्रि में ही किया जाता है?

*उत्तर:यद्यपि नवरात्रि में इसका सर्वाधिक प्रचलन है, लेकिन किसी भी शुभ दिन या विशेष साधना के समय कन्या पूजन किया जा सकता है। जैसे दुर्गा सप्तशती पाठ के समापन पर, या किसी मन्नत के पूरी होने पर भी कन्याओं को भोजन कराने और दान देने की परंपरा है।

"कन्या पूजन: कुछ अनसुलझे एवं विचारणीय पहलू" 

*कन्या पूजन की गहरी परंपरा के बावजूद, आधुनिक सामाजिक संदर्भ में इसके कुछ ऐसे पहलू हैं जिन पर चिंतन और सुधार की आवश्यकता है:

*01. वार्षिक औपचारिकता बनाम दैनिक सम्मान: सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या साल में एक बार कन्या को देवी मानकर पूजना और बाकी दिनों में उसके अधिकारों या सम्मान को नज़र अंदाज़ करना उचित है? कन्या पूजन का वास्तविक उद्देश्य तभी सिद्ध होगा जब यह भावना एक सतत सामाजिक चेतना में बदले और बालिकाओं के प्रति सम्मान, सुरक्षा और अवसर की समानता रोज़मर्रा के जीवन में दिखे।

*02. भौतिक उपहारों का दबाव: आज कई स्थानों पर यह परंपरा प्रतिस्पर्धा और दिखावे का रूप ले चुकी है, जहाँ महँगे उपहार देना आवश्यक समझा जाता है। इससे गरीब परिवारों पर अनावश्यक दबाव बनता है। मूल भावना तो श्रद्धा और सादगी की है, न कि भौतिकवाद की।

*03. सामाजिक असमानता का प्रतिबिंब: अक्सर देखा गया है कि पूजन के लिए विशेष रूप से 'सवर्ण' या 'उच्च जाति' की कन्याओं को ही बुलाया जाता है। यह पूरी तरह शास्त्र-विरुद्ध है, क्योंकि देवी का स्वरूप किसी जाति या वर्ग से परे है। यह एक गंभीर अनसुलझा पहलू है जिस पर सामाजिक जागरूकता की आवश्यकता है।

*04. बालिका की सहमति और सुविधा: कई बार छोटी बच्चियों को लंबे समय तक बैठाया जाता है, उनकी भूख-प्यास या थकान का ध्यान नहीं रखा जाता। यह ज़रूरी है कि इस पूजन में बाल केंद्रित दृष्टिकोण अपनाया जाए और उनकी सहमति व सुविधा को प्राथमिकता दी जाए।

*इन पहलुओं पर विचार करके ही हम इस पवित्र परंपरा को उसके वास्तविक और सार्थक रूप में जीवित रख सकते हैं।

"डिस्क्लेमर" 

*इस ब्लॉग में दी गई जानकारी हिंदू धर्म ग्रंथों, पुराणों, मान्यताओं और लोक परंपराओं पर आधारित है। यह जानकारी सामान्य ज्ञान एवं शैक्षणिक उद्देश्य से एकत्रित की गई है।

*01. धार्मिक मान्यताएं: विभिन्न सम्प्रदायों, परिवारों और क्षेत्रों में कन्या पूजन की विधियों और मान्यताओं में भिन्नता हो सकती है। यहां बताए गए नियम सर्वमान्य नहीं हैं। किसी विशेष अनुष्ठान के लिए योग्य पुरोहित या अपने पारिवारिक रीति-रिवाज को अंतिम मानें।

*02. सलाह का दर्जा: यह ब्लॉग किसी भी प्रकार की धार्मिक, कानूनी या व्यावसायिक सलाह नहीं है। धार्मिक क्रियाएं व्यक्तिगत श्रद्धा पर निर्भर करती हैं। कोई भी अनुष्ठान करने से पूर्व अपने विवेक का प्रयोग करें।

*03. सामाजिक दृष्टिकोण: ब्लॉग में व्यक्त सामाजिक विश्लेषण लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं, जिनका उद्देश्य चर्चा एवं चिंतन को प्रेरित करना है। ये किसी भी समूह या विचारधारा से संबद्ध नहीं हैं।

*04. सूचना की शुद्धता: हमने जानकारी को यथासंभव सटीक रखने का प्रयास किया है, फिर भी त्रुटियों की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। पाठक गण किसी भी संदेह की स्थिति में मूल ग्रंथों या विशेषज्ञों से परामर्श लें।

*05. उत्तरदायित्व: इस ब्लॉग की सामग्री के आधार पर की गई किसी भी प्रकार की क्रिया के परिणाम के लिए लेखक या प्रकाशक उत्तरदायी नहीं होंगे।

*इस ब्लॉग को पढ़ने और हमारे सांस्कृतिक ज्ञान को बढ़ाने के लिए आपका धन्यवाद।


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