चैत्र नवरात्रि 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त, घटस्थापना विधि और पौराणिक कथा | संपूर्ण गाइड
byRanjeet Singh-
0
"2026 में चैत्र नवरात्रि कब से शुरू है? घटस्थापना मुहूर्त, नौ देवियों की पूजा विधि, व्रत के नियम, कन्या पूजन और महत्वपूर्ण तिथियों की संपूर्ण हिंदी में जानकारी प्राप्त करें। जानें नवरात्रि का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व"
"चैत्र नवरात्रि की पौराणिक कथा: शक्ति के प्राकट्य और विजय का महा वृत्तांत"
*भारतीय अध्यात्म में चैत्र नवरात्रि का स्थान अत्यंत गौरवशाली है। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि अधर्म पर धर्म और अंधकार पर प्रकाश की विजय का कालखंड है।
*दूसरी ओर भारतीय संस्कृति में नवरात्रि का पर्व केवल उपासना का समय नहीं, बल्कि प्रकृति और जीवन के नवीन चक्र का प्रारंभ भी है। चैत्र नवरात्रि, जिसे वासंतिक नवरात्रि भी कहा जाता है, सनातन पंचांग के नए साल नवसंवत्सर 2083 की शुरुआत का प्रतीक है। यह वह पावन समय है जब प्रकृति पतझड़ के बाद नए पत्तों, नए फूलों और नई ऊर्जा से सजती है, ठीक वैसे ही जैसे मनुष्य को मां दुर्गा की आराधना से नवचेतना और नव शक्ति मिलती है।
*यह नवरात्रि विशेष रूप से शक्ति के आह्वान का पर्व है। नौ दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में भक्त मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की अर्चना करते हुए अपने भीतर की नकारात्मकताओं को दूर करने और सकारात्मक शक्तियों को आमंत्रित करने का प्रयास करते हैं। चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होकर नवमी तिथि तक चलने वाला यह पर्व, केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। यह कृषि और ऋतुचक्र से भी जुड़ा है। इस समय रबी की फसल पककर तैयार होती है और किसान नई फसल के स्वागत की तैयारी करते हैं, इसलिए यह समृद्धि और उत्सव का भी समय है।
*आधुनिक समय में, जब जीवन अत्यधिक व्यस्त और तनावपूर्ण हो गया है, चैत्र नवरात्रि आत्मोद्धार और आत्मोन्नति का एक सुनहरा अवसर प्रदान करती है। व्रत, संयम, साधना और प्रार्थना के माध्यम से व्यक्ति अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण पाने का अभ्यास करता है। यह ब्लॉग आपको चैत्र नवरात्रि 2026 की तिथियों, पूजन विधि, महत्व, पौराणिक कथा और हर एक अनुष्ठान की विस्तृत जानकारी प्रदान करेगा, ताकि आप इस पावन पर्व का पूर्ण लाभ उठा सकें और मां दुर्गा की कृपा को अपने जीवन में अविरल प्रवाहित कर सकें। आइए, जानते हैं इस आध्यात्मिक यात्रा का हर पड़ाव।
"नीचे दिए गए विषयों के संबंध में विस्तार से पढ़ें रंजीत के ब्लॉग पर"
*01.चैत्र नवरात्रि 2026 – घटस्थापना से विसर्जन तक की संपूर्ण जानकारी पाएं?
*02.2026 में चैत्र नवरात्रि कब से शुरू होगी?
*03.चैत्र नवरात्र में मां का आगमन और प्रस्थान किस पर होगी?
*04.नवरात्रि के में मां दुर्गा की नौ रूपों की जानकारी मिलेंगे विस्तार से?
*05.सप्तमी अष्टमी और नवमी को विशेष पूजा का विस्तार से जानकारी यहां मिलेगा?
*06.कन्या पूजन किस दिन होगी?
*07.किस उम्र की कन्या की किस दिन पूजा की जाती है?
*08.कन्या पूजन का क्या है विधान?
*09.हवन कब होगा। क्या-क्या सामग्री लगेगी। हवन करने का विधि क्या है?
*10.व्रत का पारण कब होगा?
*11.चैत्र नवरात्रि का पौराणिक कथा क्या है?
*12.सिंदूर खेला कब होगा?
*13.खिईछा भराई विधि कब होती है क्या है परंपरा है?
*14.व्रत से संबन्धित प्रश्न और उत्तर?
*15.अनसुलझे पहलुओं की?
*16.वैज्ञानिक, समाजिक और अध्यात्मिक महत्व क्या है?
"चैत्र नवरात्रि 2026 – घटस्थापना से विसर्जन तक की संपूर्ण जानकार"
*चैत्र नवरात्रि नौ दिनों का एक सशक्त आध्यात्मिक महोत्सव है, जिसमें हर एक दिन का अपना विशेष महत्व और अनुष्ठान है। आइए, इस यात्रा को प्रारंभ से अंत तक समझते हैं।
*01. घटस्थापना एवं कलश पूजा (प्रथम दिवस):
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन प्रातःकाल शुभ मुहूर्त में घटस्थापना की जाती है। इसमें एक स्वच्छ मिट्टी के घड़े (कलश) में जल भरकर, उस पर नारियल स्थापित करते हैं और उसे स्थापित कलश के ऊपर रखा जाता है। कलश को जौ बोए हुए मिट्टी के पात्र के ऊपर रखा जाता है। यह कलश सृष्टि के केंद्र स्वरूप मां दुर्गा का प्रतीक माना जाता है। इसके बाद कलश पूजन और मां शैलपुत्री की पूजा-आराधना की जाती है।
*02. नौ दिनों की देवी आराधना:
*प्रत्येक दिन दुर्गा मां के एक विशेष रूप की पूजा की जाती है, उनके मंत्रों का जाप किया जाता है और उनसे संबंधित कथा सुनी जाती है। देवी के नौ रूपों की पूजा का क्रम इस प्रकार है: शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। प्रतिदिन देवी को भोग के रूप में अलग-अलग व्यंजन अर्पित किए जाते हैं।
*03. अखंड दीप एवं जौ की रस्म:
*नौ दिनों तक घर या मंदिर में अखंड दीप जलाए रखने की परंपरा है, जो दिव्य ज्ञान और चेतना का प्रतीक है। साथ ही, घटस्थापना के दिन बोए गए जौ के पौधे (जौरा) की वृद्धि को शुभ माना जाता है। यह पौधा नवरात्रि के अंत में विशेष पूजन के बाद हटा दिया जाता है।
*04. पूजन, आरती एवं भजन:
*प्रतिदिन सुबह और शाम विधि-विधान से देवी की पूजा, आरती और भजन-कीर्तन किया जाता है। मां दुर्गा के स्तोत्र, चालीसा और दुर्गा सप्तशती का पाठ विशेष फलदायी माना गया है।
*05. महासप्तमी, महाअष्टमी एवं महानवमी:
*नवरात्रि के अंतिम तीन दिनों का विशेष महत्व है। सप्तमी के दिन देवी के प्राकट्य की पूजा होती है। अष्टमी को दुर्गा अष्टमी या महाष्टमी कहते हैं, इस दिन संधि पूजन और कन्या पूजन जैसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान होते हैं। नवमी के दिन महानवमी का पूजन किया जाता है, इस दिन हवन और बलिदान (प्रतीकात्मक) का विधान है।
*06. हवन:
नवमी के दिन विस्तृत हवन किया जाता है। इसमें विशेष मंत्रों के साथ आहुतियां डालकर देवी को प्रसन्न किया जाता है और अपनी मनोकामनाएं पूर्ण करने की प्रार्थना की जाती है।
*07. कन्या पूजन:
*अष्टमी या नवमी के दिन नौ कन्याओं (जो देवी के नौ रूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं) और एक लड़के (भैरव स्वरूप) को भोजन कराया जाता है और उनका पूजन किया जाता है। इसे कुमारी कन्या पूजा भी कहते हैं।
*08. सिंदूर खेला (दुर्गा विसर्जन):
नवमी के दिन शाम को या दशमी के दिन प्रातः सिंदूर खेला का आयोजन होता है। इसमें महिलाएं एक-दूसरे पर सिंदूर लगाती हैं और देवी की मूर्ति या कलश का विसर्जन किया जाता है। यह देवी के प्रस्थान और अगले वर्ष पुनः आगमन की आशा का प्रतीक है।
*09. व्रत का पारण:
*दशमी के दिन सभी व्रत-अनुष्ठान पूर्ण होने के बाद पारण किया जाता है, यानी व्रत खोला जाता है। इस दिन प्रसाद ग्रहण करने का विधान है।
*इस प्रकार, घटस्थापना से लेकर विसर्जन तक का यह सफर भक्त को आंतरिक शक्ति, संयम और आध्यात्मिक आनंद से भर देता है।
"2026 में चैत्र नवरात्रि कब से शुरू होगी"?
*2026 में चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व 27 मार्च, शुक्रवार से प्रारंभ होगा। सनातनी पंचांग के अनुसार, यह चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को पड़ेगी, जो नवसंवत्सर 2083 का प्रथम दिन भी है।
*महत्वपूर्ण तिथियां एवं समय (2026):
*घटस्थापना (प्रथम दिवस): 19 मार्च, गुरुवार (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा)
*प्रतिपदा तिथि प्रारंभ: 19 मार्च 2026, सुबह 04:24 बजे से
*घटस्थापना मुहूर्त: 19 मार्च को सुबह 06:02 से 07 :30 बजे तक शुभ मुहूर्त (अभिजित मुहूर्त 11:29 बजे से लेकर 12:17 बजे तक )
*20 मार्च दिन शुक्रवार द्वितीया तिथि
*21 मार्च दिन शनिवार तृतीया तिथि
*22 मार्च दिन रविवार चतुर्थी तिथि
*23 मार्च दिन सोमवार पंचमी तिथि
*24 मार्च दिन मंगलवार षष्ठी तिथि
*25 मार्च दिन बुधवार सप्तमी तिथि
*26 मार्च दिन गुरुवार अष्टमी तिथि
*27 मार्च दिन शुक्रवार नवमी तिथि
*28 मार्च दिन शनिवार दशमी तिथि
*विसर्जन / सिंदूर खेला: 27 मार्च (नवमी की शाम) या 28 मार्च (दशमी की सुबह)
व्रत पारण: 28 मार्च, रविवार (चैत्र शुक्ल दशमी)
*ध्यान देने योग्य बातें:
*01. चूंकि प्रतिपदा तिथि 19 मार्च की सुबह पहले से ही चल रही होगी, इसलिए घटस्थापना 19 मार्च को ही की जाएगी।
*02. राम नवमी का पर्व भी चैत्र नवरात्रि की नवमी को ही मनाया जाता है, इसलिए 2026 में यह दोनों पर्व 27 अप्रैल को साथ-साथ पड़ रहे हैं।
*03. स्थानीय पंचांग और परंपराओं के अनुसार तिथि व समय में थोड़ा अंतर हो सकता है, अतः स्थानीय ज्योतिषी या मंदिर से पुष्टि कर लेनी चाहिए।
*इस प्रकार, 19 मार्च 2026 से नौ दिनों तक चलने वाला यह पर्व आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर रहेगा।
*चैत्र नवरात्रि 2026 में मां दुर्गा का आगमन और प्रस्थान किस वाहन पर होगा, इसकी गणना ज्योतिष शास्त्र और 'देवी भागवत पुराण' के विशेष श्लोकों के आधार पर की जाती है। वार के अनुसार वाहन का निर्धारण होता है, जिसका प्रभाव देश, दुनिया और प्रकृति पर पड़ता है।
*यहां इसका विस्तार वर्णन है:
*01. मां दुर्गा का आगमन: नौका (नाव) पर
*वर्ष 2026 में चैत्र नवरात्रि का प्रारंभ 19 मार्च, गुरुवार को हो रहा है।
*शास्त्रों के अनुसार:
शशिसूर्ये गजारूढ़ा शनिभौमे तुरंगमे।
*गुरौ शुक्रे च दोलायां बुधै नौका प्रकीर्तिता॥
*यद्यपि सामान्य नियम के अनुसार गुरुवार को 'डोला' (पालकी) का विचार किया जाता है, किंतु कई विशिष्ट पंचांगों और तिथियों की गणना के अनुसार, जब नवरात्रि का प्रारंभ गुरुवार को हो और प्रतिपदा तिथि का विशेष संयोग बने, तो मां का आगमन नौका (नाव) पर माना जाता है।
*नौका वाहन का फल और प्रभाव:
*सुख-समृद्धि: नौका पर माता का आना अत्यंत शुभ माना जाता है। यह इस बात का संकेत है कि भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी।अच्छी वर्षा: कृषि प्रधान देश होने के नाते, नौका का आगमन अच्छी वर्षा और भरपूर फसल का प्रतीक है।
*कल्याणकारी: यह वाहन शांति और प्रचुरता लेकर आता है। इस वर्ष जल संसाधनों में वृद्धि होगी और प्राकृतिक रूप से यह साल संपन्नता लेकर आएगा।
*02. मां दुर्गा का प्रस्थान: मुर्गा (चरणायुध) पर
*मां दुर्गा की विदाई या प्रस्थान उस दिन के आधार पर तय होता है जिस दिन दशमी तिथि (विसर्जन का दिन) होती है। वर्ष 2026 में नवरात्रि का समापन और विसर्जन 28 मार्च, शनिवार को होगा।
*शास्त्रों के अनुसार, यदि देवी शनिवार या मंगलवार को विदा होती हैं, तो उनका वाहन मुर्गा (चरणायुध) होता है।
*मुर्गा वाहन का फल और प्रभाव:
*अशांति का संकेत: देवी का मुर्गे पर सवार होकर प्रस्थान करना ज्योतिषीय दृष्टि से बहुत शुभ नहीं माना जाता है। यह समाज में कलह, मानसिक तनाव और लोगों के बीच वैचारिक मतभेद बढ़ने का संकेत देता है।
*प्राकृतिक आपदाएं: यह वाहन कभी-कभी अप्रत्याशित प्राकृतिक बदलावों या कष्टों का प्रतीक भी होता है।
*सावधानी की आवश्यकता: इसका अर्थ यह है कि विदाई के समय देश और दुनिया में राजनीतिक या सामाजिक उथल-पुथल की स्थिति बन सकती है।
*निष्कर्ष और संदेश
*ज्योतिषीय गणना के अनुसार, चैत्र नवरात्रि 2026 में मां का आगमन (नौका) जहां खुशहाली और तरक्की का संदेश दे रहा है, वहीं उनका प्रस्थान (मुर्गा) हमें सजग रहने और भक्ति मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
*भक्तों के लिए सलाह है कि वे नवरात्रि के नौ दिनों में मां की पूर्ण श्रद्धा से आराधना करें ताकि आगमन की शुभता का लाभ मिले और प्रस्थान के समय होने वाले नकारात्मक प्रभावों से मां उनकी रक्षा करें। विसर्जन के दिन विशेष प्रार्थना और क्षमा याचना करना फलदायी रहेगा।
"नवरात्रि में मां दुर्गा की नौ रूपों की जानकारी"
*नवरात्रि के नौ दिन, मां दुर्गा के नौ शक्तिशाली और कल्याणकारी रूपों की आराधना के लिए समर्पित हैं। प्रत्येक रूप की अपनी विशेषता, कथा और महत्व है।
*01. प्रथम दिन: मां शैलपुत्री
*मां दुर्गा का यह प्रथम रूप है। इन्हें पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण शैलपुत्री कहा जाता है। इनका वाहन वृषभ (बैल) है और यह दो हाथों में त्रिशूल और कमल धारण करती हैं। यह रूप मूलाधार चक्र से जुड़ा है और स्थिरता, दृढ़ संकल्प व आधार शक्ति प्रदान करता है। इनकी पूजा से सभी प्रकार के कष्ट दूर होते हैं।
*02. द्वितीय दिन: मां ब्रह्मचारिणी
*मां का यह रूप तपस्या और मर्यादा का प्रतीक है। इन्होंने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। इनके दाएं हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमंडल (तपस्या का पात्र) है। यह रूप स्वाधिष्ठान चक्र से संबंधित है और साधक को संयम, तप और धैर्य का वरदान देता है।
*03. तृतीय दिन: मां चंद्रघंटा
*इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र विराजमान है, इसलिए इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। यह रूप शांति और कोमलता का प्रतीक है, किंतु युद्ध के समय इनका रूप भयानक हो जाता है। इनके दस हाथों में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र हैं। यह मणिपुर चक्र से जुड़ी हैं और साधक को निर्भयता व वीरता प्रदान करती हैं।
*04. चतुर्थ दिन: मां कुष्मांडा
*मान्यता है कि इन्होंने ही ब्रह्मांड (कुंड) को उत्पन्न किया था, इसलिए इनका नाम कुष्मांडा पड़ा। इनकी आठ भुजाएं हैं और वाहन सिंह है। इन्हें सूर्य लोक में निवास करने वाली देवी कहा जाता है। यह रूप अनाहत चक्र से संबंधित है और नवग्रहों पर अपना प्रभाव रखती हैं। इनकी पूजा से आयु, यश, बल और आरोग्य की प्राप्ति होती है।
*05. पंचम दिन: मां स्कंदमाता
*यह भगवान कार्तिकेय(स्कंद) की माता हैं। इनकी गोद में बाल रूप में स्कंद विराजमान हैं। इनका वाहन भी सिंह है। यह रूप विशुद्धि चक्र से जुड़ा है। इनकी पूजा से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है और साधक को ज्ञान की प्राप्ति होती है। यह मातृत्व की ममता और ज्ञान दोनों का प्रतीक हैं।
*06. षष्ठ दिन: मां कात्यायनी
*ऋषि कात्यायन के आश्रम में तपस्या करके उन्हें पुत्री रूप में प्राप्त करने वाली देवी हैं। इन्होंने महिषासुर का वध किया था। इनका रंग स्वर्ण के समान है और चार भुजाओं में खड्ग, कमल, अभय मुद्रा और वरमुद्रा धारण करती हैं। यह आज्ञा चक्र से संबंधित हैं और साधक को शत्रुओं पर विजय, धर्म की रक्षा और असुरी शक्तियों के विनाश का वरदान देती हैं।
*07. सप्तम दिन: मां कालरात्रि
*यह मां दुर्गा का सबसे उग्र और भयंकर रूप है, जो राक्षसों का संहार करने वाली हैं। इनका शरीर काले रंग का है, बिखरे हुए बाल और गले में विद्युत की माला है। इनका वाहन गधा है। यह रूप सहस्रार चक्र से जुड़ा है। यह भय और अंधकार का नाश करने वाली हैं। इनकी पूजा से भूत-प्रेत, नकारात्मक ऊर्जा आदि से रक्षा होती है।
*08. अष्टम दिन: मां महागौरी
*मां कालरात्रि के रूप में तपस्या करने के बाद जब इन्होंने गंगा जल में स्नान किया तो इनका शरीर गौर वर्ण का हो गया, इसलिए इन्हें महागौरी कहा जाता है। इनके वस्त्र श्वेत हैं और वाहन वृषभ है। यह शांति, पवित्रता और सादगी का प्रतीक हैं। इनकी कृपा से सभी पाप धुल जाते हैं और साधक में शांति और पवित्रता का वास होता है।
*09. नवम दिन: मां सिद्धिदात्री
*मां दुर्गा का यह अंतिम और सर्वशक्तिमान रूप है। यह सभी प्रकार की सिद्धियों (अलौकिक शक्तियों) को प्रदान करने वाली हैं। इनका आसन कमल है और वाहन सिंह है। इनकी चार भुजाएं हैं जिनमें गदा, चक्र, कमल और शंख हैं। नवदुर्गाओं में यह परम कल्याणकारी रूप हैं। इनकी उपासना से मनुष्य को समस्त सिद्धियों की प्राप्ति होती है और वह जीवन-मुक्त हो जाता है।
"सप्तमी, अष्टमी और नवमी को विशेष पूजा का विस्तार"
*नवरात्रि के अंतिम तीन दिन—सप्तमी, अष्टमी और नवमी—अत्यंत ही महत्वपूर्ण और ऊर्जा से परिपूर्ण माने जाते हैं। इन दिनों विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं।
*महासप्तमी (सातवां दिन):
*इस दिन देवीके सक्रिय रूप में प्रकट होने की पूजा की जाती है।
*प्रातः काल: नदी या पवित्र जलाशय से जल लाकर कलश का अभिषेक किया जाता है, जिसे "प्राण प्रतिष्ठा" का प्रतीक माना जाता है।
*नव पत्रिका पूजन (कोलाबौ पूजा): नौ प्रकार के पत्तों या पौधों (केला, हल्दी, जयंती, बिल्व, डाड़िम (अनार), अशोक, मान, धान और अरुई) को एक साथ बांधकर देवी के साथ स्थापित किया जाता है और उनका पूजन किया जाता है। ये नौ पत्ते देवी के नौ रूपों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
*मां कालरात्रि की पूजा: इस दिन मां कालरात्रि की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। उनके मंत्रों का जाप किया जाता है।
*महाअष्टमी (आठवां दिन):
*यह नवरात्रि का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है।
*संधि पूजन: अष्टमी तिथि के अंतिम 24 मिनट और नवमी तिथि के प्रारंभ के 24 मिनट—इन कुल 48 मिनट के समय को संधि काल कहा जाता। मान्यता है कि इसी समय देवी चंडिका ने महिषासुर के सेनापतियों चंड-मुंड का वध किया था। इस समय विशेष संधि पूजन किया जाता है, जो अत्यंत फलदायी माना जाता है।
*कन्या पूजन: इस दिन या नवमी के दिन नौ कन्याओं (देवी के नौ रूप) और एक लड़के (भैरव स्वरूप) का पूजन किया जाता है। उन्हें प्रसाद और भोजन कराया जाता है।
*महागौरी की पूजा: इस दिन मां महागौरी की आराधना की जाती है।
*पुष्पांजलि: कई स्थानों पर अष्टमी की संध्या को देवी को पुष्पांजलि अर्पित की जाती है।
*महानवमी (नवां दिन):
*यह नवरात्रि का समापन और सिद्धियों का दिन है।
*महानवमी पूजन: इस दिन मां सिद्धिदात्री की विधिवत पूजा की जाती है। दुर्गा सप्तशती के सम्पूर्ण पाठ का समापन भी इसी दिन किया जाता है।
*हवन: नवमी के दिन बड़ा हवन किया जाता है। इसमें घी, समिधा, विशेष औषधियों और 108 या 1008 आहुतियां दी जाती हैं। यह सम्पूर्ण अनुष्ठान का फल प्राप्त करने और देवी को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है।
*बलिदान (प्रतीकात्मक): पुराने समय में जहां बलिदान की परंपरा थी, वहां आजकल कुम्हड़ा (कद्दू), नारियल या लौकी का प्रतीकात्मक बलिदान दिया जाता है, जो अहंकार के विनाश का प्रतीक है।
*सिंदूर खेला एवं विसर्जन: नवमी की संध्या को देवी की मूर्ति या कलश का सिंदूर विसर्जन किया जाता है, जिसमें महिलाएं एक-दूसरे पर सिंदूर लगाती हैं। इसके बाद देवी की प्रतिमा या कलश का जल में विसर्जन कर दिया जाता है, जो देवी के प्रस्थान का प्रतीक है।
*राम नवमी: चैत्र नवमी को भगवान राम के जन्मोत्सव राम नवमी के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन रामचरितमानस का पाठ और भजन-कीर्तन किए जाते हैं।
"कन्या पूजन किस दिन होगा"?
*2026 में चैत्र नवरात्रि के दौरान कन्या पूजन के लिए मुख्य रूप से दो दिन उपयुक्त होंगे: महाअष्टमी और महानवमी।
*01. महाअष्टमी (26 मार्च 2026, शुक्रवार): यह कन्या पूजन का सबसे प्रचलित और श्रेष्ठ दिन माना जाता है। अष्टमी तिथि को दुर्गा पूजा का विशेष महत्व है और इस दिन कन्याओं के रूप में देवी के नौ स्वरूपों की पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। अधिकांश परिवार इसी दिन कन्या पूजन करते हैं।
*02. महानवमी (27 मार्च 2026, शनिवार): यदि किसी कारणवश अष्टमी के दिन पूजन नहीं कर पाते, तो नवमी के दिन भी कन्या पूजन किया जा सकता है। चूंकि 2026 में नवमी के दिन ही राम नवमी भी है, इसलिए इस दिन का महत्व और भी बढ़ जाता है।
*निर्णय कैसे करें?
*पारंपरिक नियम: पारंपरिक रूप से अष्टमी तिथि के दिन, विशेषकर संधि काल के बाद कन्या पूजन करना उत्तम माना गया है।
*स्थानीय परंपरा: आपके क्षेत्र या परिवार की जो परंपरा रही हो, उसका पालन करना चाहिए।
*सुविधा: जिस दिन आप पूर्ण श्रद्धा और व्यवस्था के साथ इस पवित्र अनुष्ठान को संपन्न कर सकें, वही दिन उत्तम है।
*सुझाव: 2026 में अष्टमी (3 अप्रैल) के दिन कन्या पूजन करना अधिकांश मान्यताओं के अनुसार श्रेष्ठ रहेगा।
"किस उम्र की कन्या की किस दिन पूजा की जाती है"
*कन्या पूजन में अलग-अलग आयु की कन्याओं को देवी के विभिन्न रूपों का अवतार मानकर पूजा जाता है। इन कन्याओं को कुमारी कहा जाता है। प्रत्येक आयु वर्ग की कन्या एक विशेष देवी स्वरूप का प्रतिनिधित्व करती है।
*आयु वर्ग और देवी स्वरूप:
*01. दो वर्ष की कन्या: इसे कुमारी कहा जाता है और यह मां काली का प्रतिनिधित्व करती है। इसकी पूजा से घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है।
*02. तीन वर्ष की कन्या: इसे त्रिमूर्ति कहा जाता है और यह मां तारा का प्रतिनिधित्व करती है। यह साधक को भय से मुक्ति दिलाती है।
*03. चार वर्ष की कन्या: इसे कल्याणी कहा जाता है और यह मां भुवनेश्वरी का प्रतिनिधित्व करती है। इसकी पूजा से सभी प्रकार का कल्याण होता है।
*04. पांच वर्ष की कन्या: इसे रोहिणी कहा जाता है और यह मां छिन्नमस्ता का प्रतिनिधित्व करती है। इसकी पूजा से रोगों से मुक्ति मिलती है।
*05. छह वर्ष की कन्या: इसे कालिका कहा जाता है और यह मां घोर रूपा/चंडिका का प्रतिनिधित्व करती है। इसकी पूजा से शत्रुओं पर विजय मिलती है।
*06. सात वर्ष की कन्या: इसे चंडिका कहा जाता है और यह मां चंडी का प्रतिनिधित्व करती है। इसकी पूजा से धन और संपत्ति की प्राप्ति होती है।
*07. आठ वर्ष की कन्या: इसे शांभवी कहा जाता है और यह मां महालक्ष्मी का प्रतिनिधित्व करती है। इसकी पूजा से घर में सुख-समृद्धि आती है।
*08. नौ वर्ष की कन्या: इसे दुर्गा कहा जाता है और यह मां दुर्गा का प्रतिनिधित्व करती है। इसकी पूजा से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
*09. दस वर्ष की कन्या: इसे सुभद्रा कहा जाता है और यह मां सुभद्रा/राजराजेश्वरी का प्रतिनिधित्व करती है। इसकी पूजा से सभी सिद्धियों की प्राप्ति होती है।
*इसके अलावा:
*एक लड़के (बटुक) की पूजा: नौ कन्याओं के साथ एक लड़के (लगभग 10-12 वर्ष आयु) का भी पूजन किया जाता है, जो भैरव का प्रतीक माना जाता है। इससे साधक को सुरक्षा और निर्भयता प्राप्त होती है।
*पूजन का क्रम:
*पूजन में सबसे पहले सबसे छोटी कन्या (दो वर्ष) से शुरुआत करके क्रमशः बड़ी कन्याओं तक पहुंचते हैं। प्रत्येक कन्या के पैर धोए जाते हैं, उन्हें आसन पर बिठाया जाता है, उनके हाथ में मौली बांधी जाती है, तिलक लगाया जाता है और फिर उन्हें पूजनीय मानकर प्रसाद और भोजन परोसा जाता। भोजन के बाद उन्हें दक्षिणा (एक उपहार राशि) और कुछ उपहार देकर विदा किया जाता है।
*आधुनिक व्यवहार
*आजकल,सटीक आयु वर्ग की नौ कन्याएं मिलना कठिन हो सकता है, इसलिए तीन, पांच या सात कन्याओं का भी पूजन प्रचलित है। मुख्य भावना श्रद्धा और देवी के प्रति समर्पण की है।
"कन्या पूजन का क्या है विधान"?
*कन्या पूजन एक पवित्र अनुष्ठान है, जिसे श्रद्धा और विधि-विधान से करना चाहिए।
*01. पूर्व तैयारी:
*कन्याओं को आमंत्रित करने से पहले घर की स्वच्छता और शुद्धि कर लें।
*भोजन और प्रसाद (जैसे हलवा-पूरी, चना, मीठा चावल) पहले से तैयार कर लें।
*आवाहन: कन्याओं को घर लाकर स्वागत करें और उन्हें पूर्व या उत्तर दिशा में आसन पर बिठाएं।
*पाद्य अर्घ्य: सबसे पहले सभी कन्याओं के पैर गंगाजल या स्वच्छ जल से धोएं। फिर उनके पैरों में कुमकुम लगाएं।
*मौली और तिलक: प्रत्येक कन्या के दाएं हाथ में मौली (कलावा) बांधें और उनके माथे पर रोली-चावल से तिलक लगाएं।
*पुष्प अर्पण: प्रत्येक कन्या को फूल अर्पित करें।
*देवी ध्यान: मन ही मन प्रत्येक कन्या को देवी का विशेष रूप मानकर उनका ध्यान करें।
*भोजन परोसना: कन्याओं को प्रसाद और पूरा भोजन परोसें। भोजन में मीठा, नमकीन और पौष्टिक व्यंजन शामिल हों। उन्हें पूर्ण सम्मान के साथ भोजन कराएं।
*दक्षिणा एवं उपहार: भोजन के बाद, प्रत्येक कन्या को उनकी आयु के अनुसार दक्षिणा (पैसे), फल, मिठाई, खिलौने या उपयोगी वस्तुएं भेंट करें।
*आशीर्वाद: अंत में कन्याओं से हाथ जोड़कर आशीर्वाद लें। मान्यता है कि इस दिन कन्याओं का आशीर्वाद सीधा देवी का आशीर्वाद होता है।
*विदाई: उन्हें प्रणाम करके प्यार से विदा करें
*03. महत्वपूर्ण बातें:
*कन्याओं के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव न करें।
*उन्हें प्यार और सम्मान से भोजन कराएं, जल्दबाजी न करें।
*पूजन के समय घर का माहौल शांत और पवित्र रखें।
*कन्या पूजन के समय स्वयं भी शुद्ध वस्त्र धारण करें और मन को पवित्र रखें।
"हवन कब होगा? क्या-क्या सामग्री लगेगी? हवन करने की विधि"
*हवन का समय (2026):
*चैत्र नवरात्रि में महानवमी,27 मार्च 2026, शनिवार के दिन हवन करने का विधान है। हवन प्रायः नवमी तिथि के दिन, पूजन के बाद और विसर्जन से पहले किया जाता है। शुभ मुहूर्त में दोपहर के समय हवन करना उत्तम रहता है।
*हवन की सामग्री:
*01. हवन कुंड: पवित्र मिट्टी या तांबे का हवन कुंड।
*02. समिधा (लकड़ी): आम, पीपल, बड़, गूलर या खैर की लकड़ी।
*03. घृत: शुद्ध देसी घी (मुख्य आहुति के लिए)।
*04. हवन सामग्री: यज्ञ में डालने वाली विशेष सामग्री जिसे "हवन समिधि" कहते हैं। इसमें शामिल हैं:
*05. आहुति के लिए: घी से भरी कलछी और आहुति डालने का चम्मच।
*06. अन्य: कमंडल, जल, रुद्राक्ष की माला, दुर्गा सप्तशती पुस्तक।
*हवन करने की विधि:
*01. स्थापना: हवन कुंड को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके रखें। कुंड के चारों ओर रंगोली बनाएं।
*02. कलश पूजन: हवन कुंड के पास कलश की स्थापना कर उसका पूजन करें।
*03. अग्नि प्रज्वलन: हवन कुंड में समिधा रखकर शुद्ध घी से अग्नि प्रज्वलित करें। अग्नि को देवता का रूप मानकर उसकी पूजा करें।
*04. आहुति: अब मुख्य हवन शुरू करें। दुर्गा सप्तशती के मंत्रों, दुर्गा चालीसा या सरल "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे" मंत्र का जाप करते हुए हाथ में घी और हवन सामग्री लेकर अग्नि में आहुति डालें।
*05. क्रम: पहले घी की आहुतियां डालें, फिर जौ, तिल, चावल, गुड़ और फिर अन्य सुगंधित सामग्रियों की आहुतियां डालें।
*06. संख्या: आहुति की संख्या 11, 21, 51, 108 या 1008 हो सकती है। सामान्यतः 108 आहुतियां दी जाती हैं।
*07. समापन: सभी आहुतियां देने के बाद, पूर्णाहुति दी जाती है, जिसमें पूरी हवन सामग्री एक साथ घी में मिलाकर अर्पित की जाती है।
*08. शांति पाठ: हवन के अंत में शांति पाठ और क्षमा प्रार्थना करें।
*09. प्रसाद वितरण: हवन की भस्म (राख) को पवित्र माना जाता है। इसे प्रसाद रूप में भक्ति
*हवन करने की विधि:
*01. स्थापना: हवन कुंड को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके रखें। कुंड के चारों ओर रंगोली बनाएं।
*02. कलश पूजन: हवन कुंड के पास कलश की स्थापना कर उसका पूजन करें।
*03. अग्नि प्रज्वलन: हवन कुंड में समिधा रखकर शुद्ध घी से अग्नि प्रज्वलित करें। अग्नि को देवता का रूप मानकर उसकी पूजा करें।
*04. आहुति: अब मुख्य हवन शुरू करें। दुर्गा सप्तशती के मंत्रों, दुर्गा चालीसा या सरल "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे" मंत्र का जाप करते हुए हाथ में घी और हवन सामग्री लेकर अग्नि में आहुति डालें।
*05. क्रम: पहले घी की आहुतियां डालें, फिर जौ, तिल, चावल, गुड़ और फिर अन्य सुगंधित सामग्रियों की आहुतियां डालें।
*06. संख्या: आहुति की संख्या 11, 21, 51, 108 या 1008 हो सकती है। सामान्यतः 108 आहुतियां दी जाती हैं।
*07. समापन: सभी आहुतियां देने के बाद, पूर्णाहुति दी जाती है, जिसमें पूरी हवन सामग्री एक साथ घी में मिलाकर अर्पित की जाती है।
*08. शांति पाठ: हवन के अंत में शांति पाठ और क्षमा प्रार्थना करें।
*09. प्रसाद वितरण: हवन की भस्म (राख) को पवित्र माना जाता है। इसे प्रसाद रूप में भक्तों में वितरित किया जाता है।
*हवन का उद्देश्य वातावरण को शुद्ध करना, देवी को प्रसन्न करना और अपनी इच्छाओं को अग्नि के माध्यम से देवी तक पहुंचाना है।
"व्रत का पारण कब होगा"?
*चैत्र नवरात्रि के व्रत का पारण (व्रत खोलना) दशमी तिथि के दिन किया जाता है। 2026 में, 5 अप्रैल, रविवार को चैत्र शुक्ल दशमी तिथि है, इसलिए इसी दिन व्रत का पारण करना उचित रहेगा।
*पारण का उचित समय:
*दशमी तिथि के दिन सूर्योदय के बाद, लेकिन दोपहर 12 बजे से पहले पारण कर लेना शुभ माना जाता है।
*यदि दशमी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाए, तो पारण नवमी के दिन नहीं बल्कि दशमी के दिन ही करना चाहिए।
*पारण से पहले अंतिम पूजा-आरती अवश्य कर लें और देवी से अनुमति लें।
*पारण में सबसे पहले देवी को भोग लगाया हुआ प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। इसके बाद हल्का, सात्विक और शुद्ध भोजन करना चाहिए।
*कई लोग पारण के रूप में पहले फल या मीठा दूध-पानी ग्रहण करते हैं।
*ध्यान रहे: व्रत का पारण श्रद्धा और विधि के साथ करने से ही पूरे व्रत का पुण्यफल प्राप्त होता है।
"चैत्र नवरात्रि का पौराणिक कथा"
*महिषासुर मर्दिनी: शक्ति का अभ्युदय
*प्राचीन काल में महिषासुर नामक एक अत्यंत शक्तिशाली और अहंकारी असुर हुआ करता था। उसने अपनी कठिन तपस्या से भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न किया और उनसे एक अद्भुत वरदान प्राप्त किया। महिषासुर ने मांगा कि उसकी मृत्यु न तो किसी देवता के हाथों हो, न मनुष्य के और न ही किसी पशु के। उसे लगा कि एक अबला स्त्री भला उसका क्या बिगाड़ पाएगी, इसलिए उसने अपनी मृत्यु के विधान में 'स्त्री' का उल्लेख नहीं किया।
*वरदान पाकर महिषासुर निरंकुश हो गया। उसने पाताल से लेकर पृथ्वी तक को त्रस्त कर दिया और अंततः स्वर्ग पर आक्रमण कर इंद्र का सिंहासन छीन लिया। सभी देवता असहाय होकर त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) की शरण में पहुंचे। देवताओं की करुण पुकार सुनकर और महिषासुर के अत्याचारों को देखकर तीनों देव अत्यंत क्रोधित हुए।
*उसी क्षण त्रिदेवों के मुख से और समस्त देवताओं के शरीर से एक दिव्य पुंज (तेज) निकला। यह प्रकाश पुंज चारों दिशाओं में फैल गया और एकाकार होकर एक अत्यंत सुंदर और तेजस्वी देवी के रूप में परिवर्तित हो गया। चूंकि यह शक्ति सभी देवताओं के अंश से बनी थी, इसलिए उन्हें 'महाशक्ति' कहा गया।
*शस्त्रों का अर्पण:
*देवी को महिषासुर के वध के लिए सुसज्जित किया गया। भगवान शिव ने उन्हें अपना त्रिशूल दिया, भगवान विष्णु ने चक्र प्रदान किया, वरुण देव ने शंख, अग्नि ने शक्ति, वायु ने धनुष और बाण, इंद्र ने वज्र और ऐरावत हाथी का घंटा, काल ने तलवार और ढाल, और पर्वतराज हिमालय ने उन्हें सवारी के लिए एक शक्तिशाली 'सिंह' भेंट किया।
*नौ दिनों का महायुद्ध:
*देवी दुर्गा ने महिषासुर की सेना पर आक्रमण किया। चैत्र मास के इन नौ दिनों में देवी ने महिषासुर के महान सेनापतियों—चक्षुर, चामर, और रक्तबीज का वध किया। अंत में, महिषासुर स्वयं युद्ध भूमि में आया। वह अपनी माया से रूप बदलता रहा—कभी भैंसा, कभी हाथी, तो कभी सिंह। अंततः, मां दुर्गा ने अपने त्रिशूल से उस असुर के हृदय पर प्रहार किया और उसका वध कर दिया। देवताओं ने पुष्प वर्षा की और ब्रह्मांड में शांति स्थापित हुई। यही कारण है कि इन नौ दिनों को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है।
*02. मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और चैत्र नवरात्रि
*एक अन्य महत्वपूर्ण कथा त्रेतायुग से जुड़ी है। भगवान श्रीराम ने रावण का वध करने और माता सीता को मुक्त कराने के लिए चैत्र नवरात्रि के दौरान मां शक्ति की कठोर आराधना की थी।
*हालांकि, कुछ ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि राम ने शारदीय नवरात्रि (अश्विन मास) में पूजा की थी, परंतु 'अध्यात्म रामायण' और कई क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार, सतयुग और त्रेतायुग में चैत्र नवरात्रि ही मुख्य रूप से प्रचलित थी। राम ने लंका विजय से पूर्व नौ दिनों तक उपवास रखकर शक्ति के नौ रूपों का आह्वान किया था।
*चैत्र नवरात्रि की नवमी तिथि को ही भगवान विष्णु ने राजा दशरथ के यहां पुत्र रूप में अवतार लिया था, जिसे हम 'राम नवमी' के रूप में मनाते हैं। इस प्रकार यह पर्व शक्ति और भक्ति (राम और दुर्गा) के मिलन का उत्सव बन गया।
*03. राजा सुरथ और समाधि वैश्य की कथा (मार्कंडेय पुराण)
*चैत्र नवरात्रि की महिमा 'दुर्गा सप्तशती' के प्रथम अध्याय में राजा सुरथ और समाधि नामक वैश्य की कथा के माध्यम से भी बताई गई है। राजा सुरथ का अपना राज्य शत्रुओं ने छीन लिया था और उनके अपने मंत्रियों ने उन्हें धोखा दिया था। दुखी होकर वे जंगल में महर्षि मेधा के आश्रम पहुंचे। वहां उनकी भेंट समाधि नाम के एक वैश्य से हुई, जिसे उसके परिवार ने धन के लोभ में घर से निकाल दिया था।
*दोनों ने ऋषि मेधा से पूछा कि वे मोह-माया में क्यों फंसे हैं, जबकि वे जानते हैं कि उनके अपने लोग उनके साथ बुरा कर रहे हैं। तब ऋषि मेधा ने उन्हें 'महामाया' की शक्ति के बारे में बताया। ऋषि ने समझाया कि यह समस्त संसार मां भगवती की इच्छा से संचालित है। उन्होंने राजा सुरथ और वैश्य को चैत्र मास में नदी के तट पर मिट्टी की मूर्ति बनाकर देवी की आराधना करने का परामर्श दिया।
*दोनों ने तीन वर्षों तक निराहार रहकर और 'नर्वाण मंत्र' का जाप करते हुए कठिन तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर मां जगदंबा ने उन्हें दर्शन दिए। राजा सुरथ को उनका खोया हुआ राज्य प्राप्त हुआ और वैश्य को आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई। तभी से सांसारिक बाधाओं की मुक्ति और मनोकामना पूर्ति के लिए चैत्र नवरात्रि का व्रत लोकमानस में प्रसिद्ध हुआ।
*04. मां दुर्गा का प्रथम प्राकट्य और सृष्टि की रचना
*पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना का कार्य शुरू किया था। उस समय संसार शून्य था। ब्रह्मा जी ने मां दुर्गा की शक्ति से ही ब्रह्मांड के तत्वों को व्यवस्थित किया। इसीलिए चैत्र नवरात्रि को 'सृष्टि का जन्मदिन' भी कहा जाता है। सतयुग में सबसे पहले चैत्र नवरात्रि की ही पूजा का विधान था, जिसे बाद में राजाओं और ऋषियों ने आगे बढ़ाया।
*सृष्टि के आरंभ की कथा:
*एक मान्यता के अनुसार, ब्रह्मांड की रचना का आरंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही हुआ था। इसी दिन से सतयुग का प्रारंभ भी माना जाता है। अतः यह नववर्ष और नव सृष्टि का प्रतीक है। नवरात्रि के नौ दिन सृष्टि की नौ दिव्य शक्तियों (नवदुर्गा) की उपासना का समय है।
*निष्कर्ष: कथा का सार
*चैत्र नवरात्रि की ये कथाएं हमें संदेश देती हैं कि चाहे अधर्म कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, यदि हम धैर्य और पूर्ण श्रद्धा के साथ 'शक्ति' की शरण में जाते हैं, तो विजय निश्चित है। यह पर्व हमारे भीतर के 'महिषासुर' (क्रोध, लोभ, अहंकार) को समाप्त कर 'रामत्व' (मर्यादा और शांति) को जगाने का अवसर है।
*इन कथाओं से स्पष्ट है कि चैत्र नवरात्रि विजय, शक्ति, नवीनता और बुराई पर अच्छाई की विजय का पावन पर्व है।
"सिंदूर खेला कब होगा"?
*2026 में चैत्र नवरात्रि में सिंदूर खेला का आयोजन महानवमी, 27 मार्च, शनिवार की संध्या में किया जाएगा। यह देवी के विसर्जन से ठीक पहले का एक रस्म है।
*समय: नवमी तिथि के दिन, पूजन और हवन के बाद, शाम के समय सिंदूर खेला जाता है। कुछ स्थानों पर इसे दशमी (5 अप्रैल) की सुबह भी करते हैं, लेकिन अधिकांश जगह नवमी की शाम को ही यह कार्यक्रम होता है।
*सिंदूर खेला क्या है?
*यह नवरात्रि समापन का एक उत्सवपूर्ण और सामुदायिक अनुष्ठान है, जिसमें विशेष रूप से महिलाएं भाग लेती हैं।
*इस दिन महिलाएं लाल रंग के पारंपरिक वस्त्र पहनती हैं।
*देवी की मूर्ति या कलश पर सिंदूर चढ़ाया जाता है।
*इसके बाद, महिलाएं एक-दूसरे पर सिंदूर लगाती हैं और मिठाइयां बांटती हैं। यह प्रसाद के रूप में भी देखा जाता है।
*सिंदूर को सुहाग और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। एक-दूसरे पर सिंदूर लगाना आपसी स्नेह, सौभाग्य और दीर्घायु की कामना का प्रतीक है।
*महत्व:
*01. यह देवी दुर्गा के प्रति श्रद्धा और उनके विदाई के अवसर पर हर्षोल्लास प्रकट करने का एक तरीका है।
*02. मान्यता है कि सिंदूर खेलने से देवी प्रसन्न होती हैं और सुहागिन स्त्रियों के पतियों की दीर्घायु होती है।
*03. यह समाज में स्त्री सशक्तिकरण और सामुदायिक एकता का भी प्रतीक है।
*सिंदूर खेले के तुरंत बाद ही देवी की मूर्ति या कलश का शोभायात्रा के साथ जलाशय में विसर्जन कर दिया जाता है, जो देवी के प्रस्थान और अगले वर्ष पुनः आगमन की आशा का प्रतीक है।
खोइछा भराई (Khoichha Bharna) एक पारंपरिक और भावनात्मक रस्म है, जिसका संबंध मुख्यतः दो अवसरों से है: देवी दुर्गा की विदाई और घर की बेटी या बहू की विदाई. यह समृद्धि, सुख-सौभाग्य और सुरक्षा की कामना का प्रतीक है.
"खोइछा भराई कब की जाती है"?
*नवरात्रि में: शारदीय और चैत्र नवरात्रि दोनों में, महाअष्टमी या नवमी के दिन देवी दुर्गा को विदाई देने से पहले यह रस्म की जाती है. मान्यता है कि नवरात्रि में मां दुर्गा अपने मायके (पृथ्वी) आती हैं और उन्हें विदा करते समय खोइछा भरा जाता है.
*पारिवारिक विदाई में: जब कोई विवाहित बेटी या बहू मायके से ससुराल वापस जाती है, तो उसकी विदाई के समय मां, भाभी या अन्य सुहागन महिलाएं उसे खोइछा भरकर देती हैं।
*खोइछा में क्या-क्या रखा जाता है?
*खोइछा में रखी जाने वाली वस्तुएं शुभता और आशीर्वाद का प्रतीक होती हैं. सामान्य सामग्री में शामिल हैं:
*धान या चावल: समृद्धि का प्रतीक।
*हल्दी की गांठ: स्वास्थ्य और सौभाग्य के लिए।
*दूर्वा (एक प्रकार की घास): लंबी उम्र और शुभता का प्रतीक।
*सुपारी-पान: सम्मान और शुभ शुरुआत का प्रतीक।
*सिक्के या रुपए: आर्थिक समृद्धि के लिए।
*मिठाई या गुड़: जीवन में मिठास के लिए।
*श्रृंगार का सामान (सिंदूर, चुनरी आदि): सुहाग की रक्षा की कामना।
*विशेष परिस्थितियों में ध्यान रखने योग्य बातें
*01. मासिक धर्म (पीरियड्स) के दौरान: ऐसी मान्यता है कि इस दौरान महिलाएं खोइछा भर सकती हैं, लेकिन देवी की मूर्ति को सीधे स्पर्श न करें. खोइछा तैयार करके किसी पुरुष सदस्य या पंडितजी के हाथों से देवी को अर्पित करवा सकती हैं.
*02. गर्भवती महिलाएं: गर्भवती महिलाएं भी यह रस्म कर सकती हैं. एक मान्यता के अनुसार, उन्हें खोइछा की पोटली की गांठ नहीं लगानी चाहिए, इससे परंपरा के बीच में न टूटने का भाव जुड़ा है.
🪔 *सरल विधि
*01. एक साफ नए कपड़े (अक्सर लाल रंग का) या आंचल में उपरोक्त सामग्री रखें.
*02. देवी के समक्ष या घर के मंदिर में रखकर उनका ध्यान करें और उनसे अपने परिवार तथा बेटी की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें.
*03. देवी को अर्पित करने के बाद या बेटी को विदा करते समय उसे सौंप दें.
*क्या आप नवरात्रि के दौरान देवी को खोइछा अर्पित करने की विशेष विधि, या फिर किसी विशेष क्षेत्र (जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश) की परंपरा के बारे में और विस्तार से जानना चाहेंगे?
*चैत्र नवरात्रि ब्लॉग: संपूर्ण प्रश्नोत्तर, विश्लेषण एवं तकनीकी जानकारी
भाग *01: पाठकों के लिए प्रमुख प्रश्न एवं उत्तर (FAQ)
प्रश्न *01: 2026 में चैत्र नवरात्रि की सही तिथि क्या है और घटस्थापना का शुभ मुहूर्त कब है?
*उत्तर:2026 में चैत्र नवरात्रि 27 मार्च, शुक्रवार से प्रारंभ होगी। घटस्थापना (कलश स्थापना) के लिए शुभ मुहूर्त 27 मार्च को सुबह 06:02 बजे से 10:16 बजे तक (अभिजित मुहूर्त) रहेगा। यह चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का दिन है, जो हिंदू नव वर्ष की भी शुरुआत है।
प्रश्न *02: चैत्र और शारदीय नवरात्रि में क्या अंतर है? कौन सी अधिक महत्वपूर्ण है?
*उत्तर:दोनों ही समान रूप से पवित्र हैं, परंतु उद्देश्य भिन्न हैं। चैत्र नवरात्रि वसंत ऋतु में आती है और इसे 'वासंतिक नवरात्रि' कहते हैं। यह नवसंवत्सर (नया साल) और प्रकृति में नई ऊर्जा का प्रतीक है। शारदीय नवरात्रि शरद ऋतु में आती है और दुर्गा पूजा के रूप में व्यापक रूप से मनाई जाती है। पौराणिक दृष्टि से चैत्र नवरात्रि में देवी के आविर्भाव और राम द्वारा पूजन की कथा प्रसिद्ध है, जबकि शारदीय में महिषासुर वध की कथा केंद्रीय है।
प्रश्न *03: क्या नवरात्रि व्रत में प्याज-लहसुन छोड़ना अनिवार्य है? इसका वैज्ञानिक कारण क्या है?
*उत्तर:हां, व्रत में प्याज-लहसुन (तामसिक भोजन) त्यागने की सलाह दी जाती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, ये पदार्थ शरीर में गर्मी और उत्तेजना पैदा कर सकते हैं। नवरात्रि व्रत का उद्देश्य शरीर और मन को हल्का, शांत और सात्विक बनाना है ताकि साधना व ध्यान में सहायता मिले। इन्हें छोड़ने से पाचन तंत्र को आराम मिलता है और शरीर डिटॉक्स होता है।
प्रश्न *04: अगर मैं पूरे नौ दिन का व्रत नहीं रख सकता, तो क्या करूं?
*उत्तर:पूर्ण व्रत संभव न हो तो आप आंशिक उपवास या संकल्प पूर्वक किसी एक दिन (विशेषकर प्रथम, अष्टमी या नवमी) का व्रत रख सकते हैं। महत्वपूर्ण है भाव की शुद्धता। आप नियमित पूजा-पाठ, मंत्र जाप या फलाहार करते हुए भी देवी की आराधना में समय दे सकते हैं। मां दुर्गा भक्ति के भाव को ही सर्वाधिक महत्व देती हैं।
प्रश्न *05: कन्या पूजन में कितनी कन्याएं बुलानी चाहिए और क्या दक्षिणा देना जरूरी है?
*उत्तर:पारंपरिक रूप से नौ कन्याओं (दो से दस वर्ष आयु) और एक बटुक (लड़का, भैरव स्वरूप) का पूजन किया जाता है। यदि यह संभव न हो, तो दो
प्रश्न *06: घटस्थापना का सबसे शुभ मुहूर्त क्या है?
*उत्तर: 19 मार्च को घटस्थापना के लिए सबसे श्रेष्ठ समय 'अभिजीत मुहूर्त' है, जो सामान्यतः सुबह 11:45 से दोपहर 12:35 तक रहेगा। सूर्योदय के समय का मुहूर्त भी श्रेष्ठ माना जाता है।
प्रश्न *07: क्या अष्टमी और नवमी एक ही दिन हो सकती है?
*उत्तर: तिथियों के घटने-बढ़ने के कारण ऐसा संभव होता है, लेकिन 2026 के पंचांग के अनुसार अष्टमी 26 मार्च को और नवमी 27 मार्च को मनाई जाएगी।
प्रश्न *08: नवरात्रि में अखंड ज्योति जलाना क्यों जरूरी है?
*उत्तर: अखंड ज्योति को साक्षात देवी का स्वरूप और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। यह घर की नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त कर निरंतर भक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।
प्रश्न *09: क्या बिना उपवास रखे भी पूजा का फल मिलता है?
*0उत्तर: जी हां, यदि आप स्वास्थ्य कारणों से उपवास नहीं रख सकते, तो आप केवल सात्विक भोजन ग्रहण कर, मंत्रों का जाप और मानसिक रूप से मां की भक्ति कर पुण्य प्राप्त कर सकते हैं।
प्रश्न *10: चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि में क्या अंतर है?
*उत्तर: चैत्र नवरात्रि हिंदू नववर्ष और आत्मिक शुद्धि (योग) से जुड़ी है, जबकि शारदीय नवरात्रि बुराई पर अच्छाई की जीत और सामाजिक शक्ति के उत्सव (दुर्गा पूजा) के लिए जानी जाती है।
प्रश्न *11: क्या मासिक धर्म के दौरान नवरात्रि पूजा की जा सकती है?
*उत्तर: शास्त्रों के अनुसार, मासिक धर्म के दौरान मंदिर जाना या मूर्तियों को छूना वर्जित है, लेकिन आप मानसिक जप, ध्यान और मन ही मन मां का स्मरण कर सकते हैं।
"चैत्र नवरात्रि के कुछ अनसुलझे और रहस्यमयी पहलू"
*चैत्र नवरात्रि केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि गूढ़ रहस्यों का संगम है। इसका एक अनसुलझा पहलू 'ऋतु संधि' का विज्ञान है। चैत्र नवरात्रि ठीक उस समय आती है जब शीत ऋतु समाप्त होती है और ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है। इस संधि काल में ब्रह्मांड में सूक्ष्म कीटाणु और व्याधियां बढ़ती हैं। प्राचीन ऋषियों ने 'उपवास' का नियम इसलिए बनाया ताकि हमारा शरीर इस बदलाव के लिए तैयार हो सके।
*एक अन्य रहस्य 'रात' शब्द में छिपा है। इसे 'नव दिवस' न कहकर 'नवरात्रि' क्यों कहा जाता है? माना जाता है कि दिन की तुलना में रात में शांति होती है, जिससे हमारे मस्तिष्क की तरंगें (Alpha waves) ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ जल्दी जुड़ती हैं। तांत्रिक साधनाओं के लिए रात का समय अधिक प्रभावशाली माना गया है क्योंकि उस समय प्रकृति की शक्तियां जागृत अवस्था में होती हैं।
*इसके अलावा, 'कलश स्थापना' के पीछे का विज्ञान भी अद्भुत है। कलश में रखे जाने वाले सप्तधान्य और नारियल ब्रह्मांडीय तरंगों के 'एंटीना' का कार्य करते हैं। यह माना जाता है कि नौ दिनों तक कलश के भीतर का जल दिव्य ऊर्जा को अवशोषित कर लेता है, जो बाद में पूरे घर में छिड़कने पर शांति लाता है। मां का वाहन (जैसे इस बार नौका) केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि यह आने वाले वैश्विक मौसम और आर्थिक स्थितियों के सटीक ज्योतिषीय पूर्वानुमान की एक प्राचीन विधि है जिसे आज भी आधुनिक विज्ञान पूरी तरह डिकोड नहीं कर पाया है।
"डिस्क्लेमर" (Disclaimer)
*इस ब्लॉग पोस्ट में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं, प्रचलित पंचांगों और ज्योतिषीय गणनाओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य पाठकों को चैत्र नवरात्रि 2026 के विषय में सामान्य जानकारी प्रदान करना और उन्हें जागरूक बनाना है।
*सटीकता: यद्यपि हमने तिथियों और मुहूर्तों को सटीक रखने का प्रयास किया है, लेकिन स्थान (जैसे कि भारत के अलग-अलग शहर या विदेश) और स्थानीय पंचांग के अनुसार तिथियों में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है। किसी भी विशेष अनुष्ठान से पहले अपने स्थानीय पुरोहित या विद्वान ज्योतिषी से परामर्श अवश्य लें।
*स्वास्थ्य: नवरात्रि व्रत के दौरान खान-पान के जो सुझाव दिए गए हैं, वे सामान्य हैं। यदि आप मधुमेह (Diabetes), उच्च रक्तचाप या किसी अन्य बीमारी से ग्रसित हैं, तो लंबे उपवास रखने से पहले अपने चिकित्सक की सलाह जरूर लें।
*धार्मिक भावनाएं: इस लेख का उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। यहां वर्णित कथाएं और मान्यताएं विभिन्न धर्मग्रंथों से प्रेरित हैं।
*परिवर्तन: ग्रह-नक्षत्रों की चाल के अनुसार भविष्यवाणियां बदल सकती हैं। यह ब्लॉग केवल मार्गदर्शन के लिए है और लेखक इसके परिणामों की कानूनी या आध्यात्मिक जिम्मेदारी नहीं लेता है।