148 वर्षों बाद मकर-संक्रांति 2026 और षट्तिला एकादशी का क्यों बन रहा महासंयोग

"148 वर्षों बाद मकर-संक्रांति के दिन बन रहा महासंयोग। क्योंकि इसी दिन षट्तिला एकादशी है। कभी-कभी ही ऐसे अद्भुत संयोग बनते हैं जो आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। क्यों खाएं जाते हैं खिचड़ी, पतंगबाजी का रहस्य और पाठकों के सवालों के जवाब।">

,"साल 2026 में 14 जनवरी को मकर संक्रांति और षट्तिला एकादशी का एक साथ आना आध्यात्मिक दृष्टि से एक "महा-संयोग" माना जा रहा है। शास्त्रों के अनुसार, ऐसा दुर्लभ संयोग कई वर्षों (कुछ गणनाओं के अनुसार लगभग 148 वर्ष) के बाद बन रहा है, जहां सूर्य की उपासना और भगवान विष्णु की भक्ति का संगम हो रहा है"

 जानें 14 जनवरी को मकर संक्रांति और  संयोग का आध्यात्मिक महत्व, खिचड़ी क्यों खाते हैं, क्या न खाएं, पतंगबाजी का रहस्य और पाठकों के सवालों के

"नीचे दिए गए विषयों पर विस्तार से पढ़ें रंजीत के ब्लॉग पर" 

*01.सावधान! 2026 की मकर संक्रांति क्यों है इतनी खास? जानें षट्तिला एकादशी का अद्भुत मेल।"

*02."मकर संक्रांति 2026: एक ही दिन सूर्य उपासना और विष्णु भक्ति, भूलकर भी न चूकें ये दान!"

*03."14 जनवरी 2026: विज्ञान और अध्यात्म का अनोखा संगम, जानें क्या करें और क्या नहीं।"

*04.मकर संक्रांति 14 जनवरी 2026 और षट्तिला एकादशी एक ही दिन मिलन का संयोग क्या कहता है। आध्यात्मिक, पौराणिक और वैज्ञानिक जानकारी दें?  

*05.मकर संक्रांति हमेशा 14 जनवरी को ही क्यों मनाई जाती है? 

*06.14 जनवरी मकर संक्रांति के दिन आपके घर में क्या खाया जाता है? 

*07.मकर संक्रांति के दिन उरद दाल की बनी खिचड़ी क्यों खाई जाती है? 

*08.मकर संक्रांति से संबंधित प्रश्न और उसका उत्तर ?

*09.अनसूलझे पहलुओं की जानकारी?

"मकर संक्रांति 2026: जब सूर्य का उत्तरायण होगा और षट्तिला एकादशी का पुण्य मिलन"

*भारतीय त्योहारों की गंगा-जमुनी संस्कृति में कभी-कभी ऐसे अद्भुत संयोग बनते हैं जो आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। 14 जनवरी 2026 का दिन ऐसा ही एक दुर्लभ और विशेष संयोग लेकर आ रहा है, जब दो प्रमुख सनातन पर्व - मकर संक्रांति और षट्तिला एकादशी - एक ही दिन मनाए जाएंगे। यह संयोग मात्र कैलेंडर का संपात नहीं, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक संदेश देता है जो प्रकृति, ईश्वर और मानव जीवन के बीच सामंजस्य स्थापित करता है।

*मकर संक्रांति, जो सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का प्रतीक है, हमें बाह्य प्रकृति के परिवर्तन और सूर्य की उर्जा से जोड़ता है। वहीं षट्तिला एकादशी, जो भगवान विष्णु को समर्पित व्रत है, आंतरिक शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग दिखाती है। जब ये दोनों पर्व एक साथ मिलते हैं, तो यह समझाने का संकेत देते हैं कि बाह्य प्रकृति के साथ सामंजस्य और आंतरिक चेतना का विकास - दोनों ही मानव जीवन के लिए अनिवार्य हैं।

*यह संयोग हमें यह भी याद दिलाता है कि भारतीय परंपरा ने कभी भी भौतिक और आध्यात्मिक को अलग-अलग नहीं देखा जाता है। खेतों में फसल पकना और हृदय में भक्ति का पुष्प खिलना - दोनों ही समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। 14 जनवरी 2026 का यह दिन हमें प्रकृति के चक्र के साथ चलते हुए आत्मा के विकास का पाठ पढ़ाएगा।

*इस ब्लॉग में हम इस अद्भुत संयोग के आध्यात्मिक, पौराणिक और वैज्ञानिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे, साथ ही मकर संक्रांति से जुड़े रोचक तथ्यों और परंपराओं को भी समझेंगे।

"मकर संक्रांति 14 जनवरी 2026 और षट्तिला एकादशी: एक दिन, दो पर्व - गहरा आध्यात्मिक संयोग" 

*आध्यात्मिक दृष्टिकोण:

*आध्यात्मिक रूप से,यह संयोग बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। मकर संक्रांति सूर्य के उत्तरायण होने का प्रतीक है, जिसे सनातन शास्त्रों में "देवताओं का दिन" कहा गया है। महाभारत में भीष्म पितामह ने इसी काल का इंतजार किया था अपने प्राण त्यागने के लिए। उत्तरायण काल को मोक्ष प्राप्ति के लिए शुभ माना जाता है। वहीं षट्तिला एकादशी व्रत का उद्देश्य मनुष्य को पापों से मुक्ति दिलाकर मोक्ष के मार्ग पर ले जाना है। दोनों का एक साथ आना मानव को सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर उन्नति का अवसर प्रदान करता है।

*पौराणिक महत्व:

*पौराणिक कथाओं के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन ही सूर्य देव अपने पुत्र शनि से मिलने मकर राशि में प्रवेश करते हैं। शनि और सूर्य के बीच विवाद की कथा प्रसिद्ध है, पर इस दिन पिता-पुत्र का मिलन सभी मतभेदों को भुलाकर एकता का संदेश देता है।

*षट्तिला एकादशी की कथा: पद्म पुराण के अनुसार, एक ब्राह्मणी ने बहुत तपस्या की थी लेकिन कभी भोजन दान नहीं किया। भगवान विष्णु ने उसे दान का महत्व समझाने के लिए षट्तिला एकादशी का मार्ग बताया। इस दिन तिल का दान दरिद्रता का नाश करता है।

*भीष्म पितामह और उत्तरायण: महाभारत के अनुसार, भीष्म पितामह ने अपना देह त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण (मकर संक्रांति) होने की प्रतीक्षा की थी। एकादशी के दिन प्राण त्यागने या भक्ति करने से मोक्ष की प्राप्ति सुलभ मानी जाती है।

*वैज्ञानिक आधार:

*वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो 14 जनवरी के आसपास सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में प्रवेश करता है, जिससे दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं। इससे मौसम में परिवर्तन आता है और शीतलहर कम होने लगती है। षट्तिला एकादशी के तिल के प्रयोग का वैज्ञानिक आधार है - सर्दियों में तिल शरीर को गर्मी प्रदान करते हैं और त्वचा को स्वस्थ रखते हैं। दोनों पर्व प्रकृति के चक्र और मानव स्वास्थ्य के बीच गहरा संबंध दर्शाते हैं।

*संयोग का संदेश:

*इस दुर्लभ संयोग का मुख्य संदेश है संतुलन। जैसे सूर्य अपनी गति से ऋतु परिवर्तन करता है, वैसे ही मनुष्य को अपने जीवन में भौतिक और आध्यात्मिक के बीच संतुलन बनाना चाहिए। तिल दान और सूर्योपासना दोनों ही मनुष्य को स्वार्थ से ऊपर उठने की प्रेरणा देते हैं।

*क्या करें इस दिन:

इस विशेष दिन पर सुबह स्नान कर तिल दान दें,सूर्य को अर्घ्य दें और विष्णु भगवान की पूजा करें। खिचड़ी और तिल के व्यंजनों का सेवन करें। पूजा-अर्चना के साथ-साथ प्रकृति के प्रति कृतज्ञता जताएं।

"मकर संक्रांति हमेशा 14 जनवरी को ही क्यों मनाई जाती है"? 

*मकर संक्रांति मूलतः सौर पंचांग पर आधारित त्योहार है और यह सूर्य की स्थिति से निर्धारित होता है। खगोलीय घटना के रूप में यह वह दिन है जब सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है, इसे 'मकर संक्रांति' कहते हैं। ज्योतिषीय गणना के अनुसार यह घटना प्रतिवर्ष 14 या 15 जनवरी को ही घटित होती है।

*इसकी मुख्य वजह है पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने का समय (लगभग 365.25 दिन) और हमारे कैलेंडर का समय (365 दिन) में अंतर। इस अंतर को समायोजित करने के लिए लीप ईयर बनाया जाता है, जिसके कारण संक्रांति की तिथि में 24 घंटे से अधिक का खिसकाव नहीं हो पाता।

*वैज्ञानिक दृष्टि से, 22 दिसंबर को सूर्य दक्षिणायन में रहते हुए दक्षिणी गोलार्ध की ओर अधिक झुका होता है, जिससे उत्तरी गोलार्ध में सबसे छोटा दिन होता है। इसके बाद सूर्य उत्तर की ओर बढ़ना शुरू करता है और लगभग 14 जनवरी तक यह गति इतनी हो जाती है कि परिवर्तन स्पष्ट दिखने लगता है। इसलिए इसे उत्तरायण का प्रारंभ माना जाता है।

*परंपरागत रूप से, 14 जनवरी को मकर संक्रांति मनाने की प्रथा इसलिए भी रही है क्योंकि इस समय तक खरीफ की फसल पककर तैयार हो जाती है और किसान नई फसल का उत्सव मनाते हैं।

"14 जनवरी मकर संक्रांति के दिन आपके घर में क्या खाया जाता है"? 

*मकर संक्रांति के दिन हमारे घर में परंपरागत और स्वास्थ्यवर्धक व्यंजनों का विशेष रूप से सेवन किया जाता है। सबसे पहले तो उरद दाल और चावल की खिचड़ी बनती है, जिसे इस दिन का मुख्य व्यंजन माना जाता है। इसे देसी घी के साथ परोसा जाता है और अक्सर इसके साथ बैंगन या आलू का भरता, पापड़ और अचार भी होता है।

*तिल से बने व्यंजन इस दिन की विशेषता होते हैं। तिल के लड्डू तो हर घर में बनते हैं, जो न केवल स्वादिष्ट होते हैं बल्कि सर्दी में शरीर को गर्मी भी प्रदान करते हैं। कुछ घरों में तिल की चिक्की और तिल-गुड़ के पट्टे भी बनाए जाते हैं।

*मिठाइयों में गजक (तिल और गुड़ से बनी) और रेवड़ी भी लोकप्रिय हैं। सब्जियों में पालक, सरसों का साग, मेथी आदि हरी पत्तेदार सब्जियों का प्रयोग किया जाता है क्योंकि ये इस मौसम में स्वास्थ्य के लिए अच्छी मानी जाती हैं।

*कई परिवारों में तिल और गुड़ के पराठे भी बनाए जाते हैं। पेय पदार्थों में गर्म दूध के साथ बादाम और खजूर का सेवन किया जाता है। ये सभी व्यंजन न केवल स्वाद में बेहतरीन होते हैं बल्कि सर्दियों में शरीर को आवश्यक ऊर्जा और गर्मी भी प्रदान करते हैं।

"मकर संक्रांति के दिन उरद दाल की बनी खिचड़ी क्यों खाई जाती है"? 

*मकर संक्रांति पर उरद दाल की खिचड़ी खाने की परंपरा के पीछे कई आध्यात्मिक, पौराणिक और वैज्ञानिक कारण हैं:

*आध्यात्मिक मान्यता:

*ऐसी मान्यता है कि इस दिन खिचड़ी खाने से सूर्य देव प्रसन्न होते हैं और घर में सुख-समृद्धि आती है। खिचड़ी को संतुलित आहार का प्रतीक माना जाता है जो सात्विकता को दर्शाता है।

"पौराणिक कथा":

*मान्यता है कि इस परंपरा की शुरुआत बाबा गोरखनाथ के समय से हुई। कहते हैं कि नाथ योगियों ने दाल और चावल को एक साथ पकाने की विधि विकसित की जो पौष्टिक भी थी और साधना के लिए उपयुक्त भी। मकर संक्रांति के दिन उन्होंने इसे प्रसाद रूप में वितरित किया, तब से यह परंपरा चली आ रही है।

"वैज्ञानिक कारण":

*01. पोषण: उरद दाल प्रोटीन से भरपूर होती है और चावल कार्बोहाइड्रेट का स्रोत है। दोनों का संयोजन संपूर्ण पोषण प्रदान करता है।

*02. पाचन: सर्दियों में पाचन तंत्र मजबूत रहता है और खिचड़ी आसानी से पच जाती है।

*03. ऊर्जा: यह शरीर को पर्याप्त ऊर्जा देती है जो ठंड के मौसम में आवश्यक है।

*04. संतुलन: आयुर्वेद के अनुसार, उरद दाल और चावल का संयोजन वात, पित्त और कफ को संतुलित रखता है।

*सांस्कृतिक महत्व:

*खिचड़ी को एकता का प्रतीक भी माना जाता है क्योंकि इसमें अलग-अलग सामग्रियों का सम्मिलित रूप होता है। यह समाज में एकता और समरसता का संदेश देती है।

*साथ ही, इस दिन खिचड़ी दान करने की भी परंपरा है जो सेवा और दान के महत्व को दर्शाती है।

"मकर संक्रांति के दिन क्या नहीं खाना चाहिए"? 

*मकर संक्रांति के शुभ दिन पर कुछ चीजों के सेवन से परहेज करने की सलाह दी जाती है, जिसके पीछे धार्मिक और स्वास्थ्य संबंधी कारण हैं:

*तामसिक भोजन:

*इस दिन मांस,मछली, अंडे आदि तामसिक भोजन का सेवन वर्जित माना गया है। मकर संक्रांति सात्विकता और पवित्रता का पर्व है, इसलिए तामसिक भोजन शरीर और मन को भारी बनाता है।

*प्याज और लहसुन:

*अधिकांश घरों में इस दिन प्याज और लहसुन का प्रयोग नहीं किया जाता। आयुर्वेद के अनुसार ये तामसिक गुण वाले होते हैं और सात्विकता को कम करते हैं। साथ ही, धार्मिक मान्यताओं में इसे देवताओं के प्रसाद में शामिल नहीं किया जाता।

*बासी या फ्रिज का ठंडा खाना:

इ*स दिन ताजा बना हुआ भोजन ही ग्रहण करना चाहिए। बासी भोजन या फ्रिज में रखा ठंडा खाना स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं माना जाता और इस दिन की पवित्रता को भी कम करता है।

*अत्यधिक नमकीन या मसालेदार भोजन:

*सर्दियोंके मौसम में पाचन तंत्र संवेदनशील होता है, इसलिए अत्यधिक मसालेदार या तेल-घी वाले भोजन से परहेज करना चाहिए।

*मदिरा और नशीले पदार्थ:

*किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन इस पवित्र दिन पर वर्जित है। यह न केवल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है बल्कि आध्यात्मिक उन्नति में भी बाधक है।

*अनाज विशेष:

*कुछ क्षेत्रोंमें इस दिन चने की दाल और मसूर की दाल खाने से मना किया जाता है। मान्यता है कि ये दालें शरीर में गर्मी पैदा करती हैं जो इस मौसम में अनुकूल नहीं होती।

*इन परहेजों का मुख्य उद्देश्य शरीर और मन को पवित्र रखना, सात्विक भोजन ग्रहण करना और इस शुभ दिन का पूरा लाभ उठाना है।

*01. आध्यात्मिक एवं ज्योतिषीय महत्व

*सूर्य और विष्णु का मिलन: मकर संक्रांति सूर्य देव को समर्पित है, जबकि एकादशी भगवान विष्णु को। जब ये दोनों एक ही दिन हों, तो इसे 'हरि-हर' संयोग जैसा फलदायी माना जाता है।

*तिल का प्रधान्य: षट्तिला एकादशी में तिल का 6 प्रकार से उपयोग (स्नान, उबटन, तर्पण, आहुति, भोजन और दान) अनिवार्य है। वहीं मकर संक्रांति पर भी तिल-गुड़ का दान मुख्य परंपरा है। दोनों पर्वों का आधार 'तिल' होने से इस दिन किए गए दान का फल अनंत गुना हो जाता है।

*शनि दोष से मुक्ति: ज्योतिषीय गणना के अनुसार, सूर्य जब मकर (शनि की राशि) में प्रवेश करते हैं और साथ में एकादशी का व्रत हो, तो यह शनि की साढ़े साती या ढैय्या के नकारात्मक प्रभावों को कम करने के लिए सर्वश्रेष्ठ समय होता है।

"विवरण समय/तिथि"

*षट्तिला एकादशी तिथि 13 जनवरी (03:17 PM) से 14 जनवरी (05:52 PM) तक

*मकर संक्रांति (सूर्य गोचर) 14 जनवरी 2026

*पुण्य काल मुहूर्त 14 जनवरी सुबह (स्नान-दान के लिए सर्वोत्तम)

*विशेष टिप: 2026 में इस दिन "सर्वार्थ सिद्धि योग" "अमृत काल" और "अमृत सिद्धि योग" भी बन रहा है। ऐसे में यदि आप कोई नया निवेश या आध्यात्मिक अनुष्ठान शुरू करना चाहते हैं, तो यह दिन सर्वोत्तम है।

*निष्कर्ष: यह संयोग 'त्याग' (एकादशी) और 'उल्लास' (संक्रांति) का अद्भुत संतुलन है। इस दिन तिल मिश्रित जल से स्नान करना और खिचड़ी का दान करना विशेष फलदायी होगा

*मकर संक्रांति और षट्तिला एकादशी के इस दुर्लभ महा-संयोग (14 जनवरी 2026) पर पूजा और दान का फल तब और बढ़ जाता है जब इसे सही विधि से किया जाए। चूकि इस दिन "तिल" का महत्व सबसे अधिक है, इसलिए आपकी सुविधा के लिए विस्तृत सूची यहाँ दी गई है:

"विशेष पूजा विधि" (Step-by-Step)

*इस दिन की पूजा में भगवान विष्णु और सूर्य देव दोनों की आराधना समाहित होनी चाहिए:

*ब्रह्म मुहूर्त स्नान: पानी में गंगाजल और काले तिल मिलाकर स्नान करें। यह 'षट्तिला' का पहला चरण है।

*सूर्य अर्घ्य: तांबे के लोटे में जल, लाल चंदन, तिल और गुड़ डालकर सूर्य देव को अर्घ्य दें।

*संकल्प: हाथ में जल और तिल लेकर एकादशी व्रत और संक्रांति दान का संकल्प लें।

*विष्णु पूजा: भगवान विष्णु (या कृष्ण जी) की मूर्ति को गंगाजल और तिल मिश्रित जल से अभिषेक कराएं। उन्हें पीले फूल, धूप, दीप और तिल के लड्डू का भोग लगाएं।

*मंत्र जाप: * भगवान विष्णु के लिए: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

*सूर्य देव के लिए: ॐ घृणि सूर्याय नमः

"षट्तिला एकादशी: तिल के 6 प्रयोग"

*शास्त्रों के अनुसार इस दिन इन 6 तरीकों से तिल का उपयोग करने पर नर्क के कष्टों से मुक्ति मिलती है:

*तिल स्नान: पानी में तिल डालकर नहाना।

*तिल उबटन: शरीर पर तिल का लेप लगाना।

*तिल तर्पण: पितरों को तिल मिला जल अर्पित करना।

*तिल होम (आहुति): हवन में तिल की आहुति देना।

*तिल भक्षण: प्रसाद के रूप में तिल खाना।

*तिल दान: सबसे महत्वपूर्ण चरण।

"दान की जाने वाली वस्तुओं की सूची" (Donation List)

*संक्रांति और एकादशी का संयोग होने के कारण इन 10 वस्तुओं का दान 'महादान' माना जाता है:

*तिल और गुड़: यह शनि और सूर्य दोनों को प्रसन्न करने के लिए अनिवार्य है।

*गर्म कपड़े: कंबल, ऊनी वस्त्र या जूते-चप्पल किसी जरूरतमंद को दें।

खिचड़ी (कच्ची सामग्री): चावल, काली उड़द की दाल, नमक और घी का पैकेट।

*पीले वस्त्र: भगवान विष्णु की कृपा के लिए किसी ब्राह्मण को पीले वस्त्र दान करें।

*मिट्टी का पात्र या घड़ा: जल सेवा के लिए।

*गौ सेवा: गाय को हरा चारा और तिल-गुड़ के लड्डू खिलाएं।

"अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न" (FAQ Section)

प्रश्न *01. 2026 में मकर संक्रांति कब है?

उत्तर: साल 2026 में मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाएगी। इसी दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करेंगे।

प्रश्न *02. क्या एकादशी और मकर संक्रांति एक ही दिन होने पर चावल खा सकते हैं?

उत्तर: चूंकि इस दिन षट्तिला एकादशी का व्रत है, इसलिए शास्त्रों के अनुसार चावल का सेवन वर्जित है। आप खिचड़ी का दान कर सकते हैं, लेकिन भोजन में तिल और फलाहार का ही उपयोग करना चाहिए।

प्रश्न *03. षट्तिला एकादशी पर तिल का दान क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्तर: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, षट्तिला एकादशी पर तिल का दान करने से स्वर्ण दान के समान पुण्य मिलता है और व्यक्ति को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है।

प्रश्न *04. मकर संक्रांति और एकादशी के संयोग में किसका पूजन पहले करें?

उत्तर: सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान के पश्चात सबसे पहले सूर्य देव को अर्घ्य दें, फिर भगवान विष्णु की षट्तिला एकादशी की विधि-विधान से पूजा करें।

प्रश्न *05. इस दिन कौन सी चीजों का दान करना सबसे शुभ है?

उत्तर: इस दिन तिल, गुड़, नए ऊनी वस्त्र, काली उड़द की दाल और घी का दान करना अत्यंत शुभ माना गया है।

प्रश्न *06.: मकर संक्रांति अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तिथियों को क्यों मनाई जाती है?

उत्तर:यह भिन्नता मुख्य रूप से दो कारणों से है। पहला, कुछ क्षेत्र सौर पंचांग के आधार पर मनाते हैं, जिसमें तिथि 14-15 जनवरी के आसपास ही रहती है। दूसरा, कुछ परंपराएं चंद्र पंचांग पर आधारित हैं, जिसमें यह 'माघ मास' के कृष्ण पक्ष में आती है और इसकी तिथि चलती रहती है। साथ ही, जब सूर्य वास्तव में मकर राशि में प्रवेश करता है (सौर संक्रांति), उसी दिन मनाना 'सूर्य संक्रांति' कहलाता है, जबकि एक दिन बाद मनाना 'सौर संक्रांति' कहलाता है, जैसे तमिलनाडु में पोंगल।

प्रश्न *07: मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ का इतना महत्व क्यों है?

उत्तर:तिल और गुड़ का महत्व बहुआयामी है। आध्यात्मिक मान्यता है कि तिल पितरों को प्रिय है और गुड़ पवित्रता का प्रतीक है, इसलिए इनके दान और सेवन से पापों का नाश होता है। वैज्ञानिक दृष्टि से, सर्दी के मौसम में तिल शरीर को आवश्यक वसा और गर्मी प्रदान करते हैं, जबकि गुड़ आयरन से भरपूर है और पाचन में सहायक है। यह संयोजन स्वास्थ्य के लिए आदर्श माना जाता है।

प्रश्न *08.: पतंगबाजी का मकर संक्रांति से क्या संबंध है?

उत्तर:पतंगबाजी का संबंध मुख्य रूप से स्वास्थ्य से जोड़ा जाता है। माना जाता है कि सर्दी के मौसम में सुबह की तेज धूप शरीर के लिए बहुत लाभकारी होती है। पतंग उड़ाने के लिए लोग छतों पर निकलते हैं और सीधे सूर्य के प्रकाश के संपर्क में आते हैं, जो विटामिन-डी का प्राकृतिक स्रोत है। इसके अलावा, यह सांस्कृतिक उत्साह और सामुदायिक आनंद का प्रतीक भी बन गया है।

प्रश्न *09: क्या मकर संक्रांति केवल सनातनियों (हिंदुओं) का त्योहार है?

उत्तर:नहीं, यह मूलतः एक सांस्कृतिक और कृषि पर्व है जो प्रकृति के चक्र से जुड़ा है। इसे विभिन्न नामों और रीति-रिवाजों से देश के विभिन्न समुदाय मनाते हैं, जैसे सिख समुदाय में 'लोहड़ी' (13 जनवरी), तमिलनाडु में 'पोंगल', असम में 'भोगाली बिहू' और केरल में मलयाली समुदाय द्वारा। यह मुख्य रूप से नई फसल और उत्तरायण का उत्सव है।

प्रश्न *10.: इस दिन स्नान और दान का क्या महत्व है?

उत्तर:पौराणिक मान्यता है कि इस दिन सूर्य देव अपने पुत्र शनि से मिलने आते हैं, इसलिए पवित्र नदियों में स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं और शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलती है। दान को 'अन्नदान' या 'तिलदान' के रूप में विशेष महत्व दिया जाता है। माना जाता है कि इससे सूर्य देव प्रसन्न होते हैं और घर में सुख-समृद्धि आती है। यह परंपरा समाज में साझा करने और कमजोर वर्ग की मदद करने की भावना को भी दर्शाती है।

मकर संक्रांति: कुछ अनसुलझे और विवादित पहलुओं पर विचार 

मकर संक्रांति के कुछ पहलू ऐसे हैं जिन पर एकमत नहीं है और वे शोध व चर्चा का विषय बने हुए हैं।

1. सही खगोलीय तिथि बनाम परंपरागत तिथि: आधुनिक खगोलीय गणनाओं के अनुसार, सूर्य वास्तव में अब 21-22 दिसंबर को ही मकर रेखा (दक्षिणायन से उत्तरायण) को पार करता है, न कि 14 जनवरी को। 14 जनवरी लगभग 2000 साल पहले की सही तिथि थी, लेकिन पृथ्वी की गति में होने वाले 'प्रीसेशन' नामक हलचल के कारण यह तिथि खिसक गई है। फिर भी, परंपरागत रूप से 14 जनवरी को ही यह पर्व ज्यादातर जगहों पर मनाया जाता है। क्या खगोलीय सत्य को स्वीकार कर तिथि बदलनी चाहिए या परंपरा को बनाए रखना चाहिए, यह एक बड़ा प्रश्न है।

2. क्षेत्रीय नाम और परंपराओं में विविधता का मूल कारण: भारत में इसे पोंगल, लोहड़ी, उत्तरायण, माघ बिहू आदि नामों से जाना जाता है। यह विविधता कब और कैसे विकसित हुई? क्या यह विभिन्न कृषि कालों और स्थानीय देवताओं की पूजा से जुड़ी है, या फिर आर्य और द्रविड़ संस्कृतियों के मिश्रण का परिणाम है? इस पर स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाणों का अभाव है।

3. पतंगबाजी से जुड़े पर्यावरणीय और सुरक्षा चिंताएं: पतंगबाजी के दौरान इस्तेमाल होने वाला 'मांझा' (विशेषकर कांच या धातु मिला हुआ) पक्षियों के लिए घातक सिद्ध होता है। साथ ही, बिजली की तारों में फंसने से दुर्घटनाएं भी होती हैं। क्या इस परंपरा को पूरी तरह से पर्यावरण-मित्र बनाना संभव है? क्या पतंगबाजी के बिना भी त्योहार का आनंद उसी तरह लिया जा सकता है? यह एक आधुनिक चुनौती है।

डिस्क्लेमर 

इस ब्लॉग में प्रस्तुत सभी जानकारी विभिन्न धार्मिक ग्रंथों, लोक परंपराओं, मान्यताओं, सामान्य ज्ञान और खुले स्रोतों से एकत्रित की गई है। यह जानकारी केवल शैक्षिक और सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए प्रदान की जा रही है।

सटीकता के संबंध में: हम इस ब्लॉग में दी गई किसी भी जानकारी की 100% सटीकता, पूर्णता या अद्यतनता की गारंटी नहीं देते हैं। खगोलीय घटनाओं की गणना, तिथियों और स्थानीय रीति-रिवाजों में भिन्नता हो सकती है। पाठकों से अनुरोध है कि किसी भी धार्मिक अनुष्ठान या परंपरा से संबंधित विशिष्ट मार्गदर्शन के लिए अपने क्षेत्र के विद्वान पंडित, ज्योतिषी या सांस्कृतिक विशेषज्ञों से परामर्श अवश्य लें।

वैज्ञानिक और धार्मिक दृष्टिकोण: इस ब्लॉग में दिए गए वैज्ञानिक तर्क सामान्य समझ पर आधारित हैं और इन्हें चिकित्सकीय या वैज्ञानिक शोध का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। साथ ही, धार्मिक मान्यताएं आस्था का विषय हैं और इनमें विविधता स्वाभाविक है। किसी एक मान्यता को दूसरे से श्रेष्ठ बताना हमारा उद्देश्य नहीं है।

उत्तरदायित्व: इस ब्लॉग की सामग्री के आधार पर कोई भी निर्णय लेने या कार्रवाई करने से पहले पाठक की स्वयं की विवेक बुद्धि जिम्मेदार होगी। ब्लॉग लेखक, प्रकाशक या संबंधित प्लेटफॉर्म किसी भी प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष, आकस्मिक, परिणामस्वरूप होने वाली क्षति या हानि के लिए किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं होंगे।

बाहरी लिंक: यदि इस ब्लॉग में किसी बाहरी वेबसाइट का लिंक दिया गया है, तो हम उसकी सामग्री, गोपनीयता नीतियों या प्रथाओं के लिए जिम्मेदार नहीं हैं।

इस ब्लॉग को पढ़कर आप उपरोक्त सभी बातों से सहमत होते हैं। यदि आप किसी जानकारी को गलत पाते हैं तो कृपया हमें सूचित करने का कष्ट करें।


एक टिप्पणी भेजें (0)
और नया पुराने