"कैसे होता है बिहार-यूपी व एमपी: "मृत्यु संस्कार की विधि" पहले दिन से लेकर तेरहवीं तक की संपूर्ण जानकारी

"बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और मध्यप्रदेश के रहने वाले सनातनियों (हिंदूओं) के मरने के बाद श्मशान तक क्या विधि होती है? शव तैयार करना, पिंड दान, मुखाग्नि, दस कर्म, एकादश और तेरहवीं का पूरा विधान जानें। मृतक से माफी मांगने का तरीका और महिलाओं की भूमिका"। 

funeral at the crematorium

"अंतिम संस्कार विधि, मृत्यु के बाद के संस्कार, श्मशान घाट रीति रिवाज"

*मृत्यु जीवन का अटल सत्य है, और सनातन धर्म में इसे एक संस्कार के रूप में, एक पारलौकिक यात्रा की शुरुआत माना जाता है। यह यात्रा केवल शरीर के त्याग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके बाद की विधियां, संस्कार और रीति-रिवाज आत्मा की शांति और उसके अगले जन्म की नींव रखते हैं। यदि आपके मन में भी अंतिम संस्कार से जुड़े रहस्यमय और पवित्र कर्मकांडों, जैसे शव को तैयार करने की विधि, पिंड दान का महत्व, श्मशान की देवी, या तेरहवीं के विधान के बारे में प्रश्न हैं, तो यह ब्लॉग आपके लिए ही है।

*इस व्यापक मार्गदर्शिका में, हम आपको सनातन धर्म के अनुसार मृत्यु के बाद श्मशान घाट तक और उसके बाद तक की पूरी यात्रा से अवगत कराएंगे। हम न केवल "क्या" करना है, बल्कि "क्यों" करना है, इसके पीछे के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक कारणों पर भी प्रकाश डालेंगे। शव की अंगुलियां बांधने से लेकर चिता की परिक्रमा तक, दस कर्म से लेकर ब्रह्म भोज तक, हर एक पहलू को सरल भाषा में समझाया जाएगा। यह ज्ञान न केवल आपको एक पारंपरिक ज्ञान देगा, बल्कि इस पवित्र संस्कार के प्रति आपकी श्रद्धा को और गहरा करेगा। आइए, शुरू करते हैं इस गंभीर और ज्ञानवर्धक यात्रा को।

*शव को कैसे तैयार करें, पिंड दान कहां दिया जाता है, मुखाग्नि कैसे दें, श्मशान की देवी कौन है। दस कर्म क्या है, एकादश कितने दिन पर होता है, तेरहवीं ब्रह्मभोज विधान, मृत व्यक्ति की चीजें इस्तेमाल करें न करें। 

***के अलावा नीचे दिए दए गए विषयों के संबंध में विस्तार से पढ़ें रंजीत के ब्लॉग पर 

*01.शव को तैयार करने की विधि की जानकारी 

*02.शव को घर से श्मसान घाट शव ले जाने के दौरान कहां कहां पिंड दिया जाता है। 

*03.शमशान घाट जाने के बाद क्या करें? 

*04.शमशान की देवी कौन होती है? 

*05.मरने के बाद पैर की उंगलियां क्यों बांधी जाती हैं? 

*06.शमशान में पेशाब करने से क्या होता है? 

*07.शव को जलाने के लिए क्या-क्या लकड़ी चाहिए। और कितने मन वजन चाहिए

*08.शव जलाते समय मुख अग्नि देने का क्या है विधान है

*09.चिता को कितने बार परिक्रमा किया जाता है 

*10.शमशान से आने के बाद क्या करना चाहिए? 

*11.दस कर्म क्या है। यह किस दिन मनाया जाता है और क्या है विधान। 

*12.एकादश कितने दिन पर होता है और क्या-क्या विधान है

*13.तेरहवीं अर्थात ब्रह्म भोज के दिन क्या क्या किया जाता है और क्या क्या नहीं करना चाहिए? 

*14.मरे हुए व्यक्ति की कौन सी चीज इस्तेमाल नहीं करनी चाहिए? 

*15.मृत व्यक्ति से माफी कैसे मांगें? 

*16.सनातन अंतिम संस्कार: मृत्यु के बाद घाट तक की पूरी विधि एक विस्तृत मार्गदर्शिका

*17.शव को तैयार करने की विधि

*मृत्यु के बाद शव को तैयार करना एक अत्यंत पवित्र और संवेदनशील प्रक्रिया है, जिसे सामान्यतः परिवार के बड़े सदस्य या विशेष जाति के लोग करते हैं। इसकी पूरी प्रक्रिया शास्त्रीय नियमों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार होती है।

01. स्नान कराना (स्नान संस्कार): सबसे पहले शव को एक चटाई या भूमि पर लिटाकर उसे गंगाजल या सामान्य जल से स्नान कराया जाता है। इस जल में हल्दी, चंदन, या तिल भी मिलाए जा सकते हैं। यह शुद्धिकरण का प्रतीक है, जो शरीर को भौतिक दुनिया से मुक्त करने का संकेत देता है। बहुत जगहों पर शव का मुंडन कराने का विधान है।

*02. नए वस्त्र पहनाना: स्नान के बाद शव को नए, सफेद (सामान्यतः) या पीले रंग के सूती वस्त्र पहनाए जाते हैं। विवाहित महिला के लिए लाल या रंगीन साड़ी (शृंगारिक वस्त्र) का भी विधान है, जो उसकी सुमंगली स्थिति को दर्शाता है। पुरुषों के लिए धोती-कुर्ता या सफेद कपड़ा प्रयोग होता है।

*03. पैरों की अंगुलियां बांधना: दोनों पैरों की अंगुलियों को एक सूत या कपड़े से बांध दिया जाता है। इसका एक कारण शव की मुख्य नस (डोर्सलिस पेडिस आर्टरी) को दबाव देकर शरीर से वायु निकालना और शव को स्थिर रखना माना जाता है, ताकि अंतिम यात्रा के दौरान कोई असुविधा न हो।

*04. हाथों की मुद्रा: हाथों को या तो सीने पर फैला दिया जाता है या फिर उंगलियों को एक विशेष मुद्रा में रखा जाता है। कई बार हाथों को ऐसे बांधा जाता है मानो वह प्रार्थना या नमस्ते की मुद्रा में हो।

*05. श्रृंगार एवं तिलक: पुरुषों के माथे पर चंदन, हल्दी या भस्म का तिलक लगाया जाता है। साधु-संतों के शव पर भभूत लगाई जाती है। स्त्रियों को यदि श्रृंगार कर वस्त्र पहनाए गए हैं, तो उनके माथे पर सिंदूर भी लगाया जाता है।

*06. फूल मालाएं एवं तुलसी: शव को फूलों की मालाओं से सजाया जाता है। विशेष रूप से गले में तुलसी की माला पहनाई जाती है। मान्यता है कि तुलसी विष्णु प्रिया होने के कारण आत्मा को मोक्ष दिलाने में सहायक होती है और यमदूतों से रक्षा करती है।

*07. शव को भूमि पर रखना: तैयार करने के बाद शव को उसके सिर को दक्षिण दिशा की ओर करके भूमि पर लिटा दिया जाता है। दक्षिण दिशा को यम की दिशा माना जाता है। शव के पास एक दीपक जलाया जाता है और अगरबत्ती लगाई जाती है।

इस पूरी प्रक्रिया में वेद पाठ या मंत्रोच्चारण चलता रहता है, *जिससे वातावरण पवित्र और आध्यात्मिक बना रहे।

"शव को घर से श्मशान घाट ले जाने के दौरान पिंड दान"

*शव को बांस या काष्ठ के डंडों से बनी पालकी (अर्थी) पर लिटाकर श्मशान की ओर ले जाया जाता है। इस यात्रा को "अंतिम यात्रा" कहा जाता है। इस दौरान कुछ विशिष्ट स्थानों पर रुककर पिंड दान किया जाता है। पिंड दान का अर्थ है आटे, तिल और जल से बनी गोलाकार आकृतियां (पिंड) अर्पित करना। यह मृतक की नई लौकिक योनि के लिए भोजन का प्रतीक है। शवयात्रा के दौरान राम नाम सत्य है का जयघोष करते हुए चलते हैं।

*01. घर के द्वार पर: यात्रा शुरू होने से पहले ही पहला पिंड दान किया जा सकता है।

*02. नदी या तालाब के किनारे: यदि रास्ते में कोई जलाशय आता है, तो वहां रुककर पिंड दान किया जाता है। जल को पारलौकिक यात्रा में सहायक माना जाता है।

*03. चौराहे पर: चौराहा एक संक्रमण स्थल है, जहां चार दिशाएं मिलती हैं। यहां पिंड दान करने का अर्थ है मृतात्मा को दिशाओं के भ्रम से मुक्त करना और उसका मार्ग प्रशस्त करना।

04. श्मशान घाट के प्रवेश द्वार पर: श्मशान में प्रवेश से ठीक पहले आखिरी पिंड दान किया जाता है। यह भौतिक संसार से पूर्ण विमुक्ति का प्रतीक है।

*इन स्थानों पर शव को जमीन पर रख दिया जाता है और मुख्य शोकाकुल (आमतौर पर पुत्र या निकटतम पुरुष रिश्तेदार) द्वारा पिंड दान किया जाता है। यह कर्मकांड एक तरह से आत्मा को इस बात का आश्वासन देता है कि उसके प्रियजन उसकी यात्रा के लिए आवश्यक सामग्री प्रदान कर रहे हैं और उसे विदा करने के लिए तैयार हैं।

"श्मशान घाट जाने के बाद क्या करें"? 

*श्मशान घाट पहुंचने के बाद शव को चिता स्थल के पास उतारकर जमीन पर रख दिया जाता है। इसके बाद की प्रक्रिया इस प्रकार है:

*चिता तैयार करना: सबसे पहले चिता (लकड़ियों का ढेर) तैयार की जाती है। चिता की लकड़ियों का चुनाव और वजन स्थानीय उपलब्धता पर निर्भर करता है, लेकिन आम तौर पर 3 से 5 मन (लगभग 100-200 किलो) लकड़ी की आवश्यकता होती है। पवित्र माने जाने वाले वृक्षों जैसे आम, पीपल, या चंदन की लकड़ी का प्रयोग शुभ माना जाता है।

*शव को चिता पर रखना: चिता तैयार होने के बाद शव को उस पर लिटा दिया जाता है। शव का मुख दक्षिण दिशा की ओर रखा जाता है। कई परंपराओं में शव को पैर दक्षिण की ओर करके लिटाया जाता है।

*अंतिम स्नान एवं अर्पण: शव पर घी, चंदन, गुग्गल, इलायची आदि सुगंधित पदार्थ छिड़के जाते हैं। नए कपड़े और फूल चिता पर रखे जाते हैं।

*मुखाग्नि देना: इसके बाद मुख्य शोकाकुल (प्रायः पुत्र) द्वारा मुखाग्नि दी जाती है। यह कर्मकांड बेहद पवित्र माना जाता है।

"श्मशान की देवी कौन होती है"? 

*श्मशान भूमि को अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली स्थान माना जाता है, जहां भौतिक शरीर का विसर्जन होता है और आत्मा मुक्त होती है। इस स्थान की अधिष्ठात्री देवी मां काली या श्मशान काली मानी जाती हैं। इन्हें देवी काली का ही एक रूप माना जाता है।

*देवी काली समय और परिवर्तन की प्रतीक हैं। वह संहार की शक्ति हैं, जो पुराने का अंत करके नए के लिए मार्ग प्रशस्त करती हैं। श्मशान उनका निवास स्थल है, क्योंकि यहां सबसे बड़ा संहार - शरीर का संहार होता है। मां श्मशानकाली को इस स्थान की रक्षक और शासक माना जाता है।

*मान्यताएं: ऐसा विश्वास है कि श्मशान में मौजूद सभी आत्माएं और शक्तियां मां श्मशान काली के अधीन होती हैं। इसलिए श्मशान में प्रवेश करने से पहले और अंतिम संस्कार शुरू करने से पहले उनकी अनुमति और आशीर्वाद लिया जाता है। कई जगहों पर श्मशान में उनकी प्रतिमा या पिंडी स्थापित होती है, जहां लोग माथा टेकते हैं।

*तंत्र साधना: श्मशान भूमि तंत्र-मंत्र की साधना के लिए भी पवित्र मानी जाती है, क्योंकि यहां मां काली की शक्ति सर्वाधिक प्रबल मानी जाती है। साधक यहां शून्यता और विरक्ति की भावना से साधना करते हैं।

*उद्देश्य: श्मशान की देवी की अवधारणा का मुख्य उद्देश्य मृत्यु के भय को दूर करना और इसे एक दैवीय प्रक्रिया के रूप में स्वीकार करना है। यह समझाना है कि मृत्यु अंत नहीं, बल्कि देवी के हाथों होने वाला एक रूपांतरण है।

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"मरने के बाद पैर की उंगलियां क्यों बांधी जाती हैं"? 

*यह प्रथा देखने में साधारण लगती है, लेकिन इसके पीछे वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक कारण सम्मिलित हैं।

*01. वैज्ञानिक/शारीरिक कारण: मृत्यु के बाद शरीर में रिगोर मॉर्टिस नामक प्रक्रिया शुरू होती है, जिसमें मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं और शव जकड़ सा जाता है। इस प्रक्रिया में पैरों की उंगलियां अक्सर अलग-अलग दिशाओं में फैल सकती हैं या मुड़ सकती हैं। उन्हें बांधने से शव को सीधा और स्थिर रखने में मदद मिलती है। साथ ही, पैरों की एक विशेष नस (डोर्सलिस पेडिस) पर दबाव पड़ने से शरीर में बची हवा निकलने में मदद मिल सकती है, जिससे शव में सड़न देरी से शुरू होती है। यह उन गर्म इलाकों में विशेष रूप से उपयोगी था, जहां शीघ्र अंतिम संस्कार संभव नहीं होता था।

*02. आध्यात्मिक कारण: आध्यात्मिक मान्यता है कि प्राण निकलने के बाद भी शरीर से सूक्ष्म ऊर्जाएं निकलती रहती हैं। पैरों की उंगलियां बांधने से इस ऊर्जा का रिसाव रुकता है और उसे शरीर के मध्य भाग में एकत्रित किया जाता है, जो आत्मा की अंतिम यात्रा के लिए अनुकूल माना जाता है। इसे शरीर को "बंद" करने की एक प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है।

*03. व्यावहारिक एवं शारीरिक  कारण: अंतिम यात्रा के दौरान शव को कंधे पर उठाकर ले जाया जाता है। इस दौरान हिलने-डुलने से पैर लटकते हैं। उंगलियां बंधी होने से वे अस्त-व्यस्त नहीं होती और शव की सज्जा बनी रहती है, जो सम्मान का प्रतीक है।

*04. प्रतीकात्मक कारण: इसे भौतिक दुनिया के बंधन से मुक्ति का प्रतीक भी माना जा सकता है। जिस प्रकार जन्म के समय नाभि नाल काटी जाती है, उसी प्रकार मृत्यु के समय पैरों को बांधकर इस लौकिक यात्रा को पूर्ण करने का संकेत दिया जाता है।

"श्मशान में पेशाब करने से क्या होता है"? 

*श्मशान घाट को एक पवित्र और संवेदनशील स्थान माना जाता है, जहां सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों प्रकार की सूक्ष्म ऊर्जाएं विद्यमान रहती हैं। धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के अनुसार, श्मशान में मूत्र या मल त्याग करना अशुभ और अनुचित माना जाता है।

*अपवित्रता: श्मशान को देवी काली का स्थान माना जाता है। ऐसे पवित्र स्थान पर मूत्र जैसा अपवित्र कार्य करना देवी का अनादर माना जाता है। यह स्थान की पवित्रता को भंग करता है।

*दोष लगना: लोकमान्यता है कि ऐसा करने से श्मशान दोष लग सकता है, जिससे व्यक्ति को जीवन में कई तरह की मानसिक, शारीरिक और आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसा माना जाता है कि यहां विचरण कर रही आत्माएं नाराज हो सकती हैं।

*व्यावहारिक स्वच्छता: व्यावहारिक दृष्टि से भी, यह एक सार्वजनिक स्थान है जहां अंतिम संस्कार जैसे गंभीर कर्मकांड होते हैं। ऐसे में मूत्र त्याग करना अस्वच्छ और अनैतिक है, जो दूसरे शोकाकुल लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचा सकता है।

*अतः श्मशान जाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि शौच आदि से निवृत्त होकर ही जाएं और वहां किसी भी प्रकार की अपवित्रता न फैलाएं।

"शव को जलाने के लिए लकड़ी" 

*शव दाह के लिए लकड़ी का चुनाव स्थानीय उपलब्धता, आर्थिक स्थिति और पारंपरिक मान्यताओं पर निर्भर करता है। आमतौर पर 3 से 5 मन (लगभग 100 से 200 किलोग्राम) लकड़ी की आवश्यकता होती है। एक मन लगभग 40 किलोग्राम के बराबर होता है। यह मात्रा शव के वजन और लकड़ी के प्रकार पर भी निर्भर करती है।

"लकड़ी के प्रकार":

*01. आम की लकड़ी: सबसे आम और शुभ मानी जाती है। यह आसानी से जलती है और तेज आग पैदा करती है। इसे पवित्र माना जाता है।

*02. पीपल की लकड़ी: पीपल के वृक्ष को धार्मिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र माना जाता है। इसकी लकड़ी का प्रयोग भी शुभ माना जाता है, हालांकि यह कम उपलब्ध होती है।

03. चंदन की लकड़ी: चंदन की लकड़ी सर्वोत्तम मानी जाती है। यह सुगंधित होती है और माना जाता है कि इसकी सुगंध आत्मा को शांति और उच्च लोकों की यात्रा में सहायक होती है। हालांकि, यह महंगी होती है।

*04. नीम की लकड़ी: कई स्थानों पर नीम की लकड़ी का भी प्रयोग होता है। नीम में कीटाणुनाशक गुण होते हैं, जो वैज्ञानिक दृष्टि से फायदेमंद हो सकते हैं।

*05. सरकारी श्मशान घाट: आजकल अधिकांश शहरी श्मशान घाटों में विद्युत या गैस चूल्हे उपलब्ध हैं, या फिर प्रबंधन द्वारा ही एक निश्चित मात्रा में लकड़ी का इंतजाम कर दिया जाता है। वहां लकड़ी ले जाने की आवश्यकता नहीं होती।

*चिता का ढांचा: चिता सामान्यतः तीन परतों में बनाई जाती है। सबसे नीचे मोटी लकड़ियां, बीच में मध्यम आकार की और सबसे ऊपर पतली लकड़ियां या घास-फूस रखी जाती है, ताकि आग आसानी से पकड़ सके। शव को मध्य परत पर रखा जाता है।

"मुखाग्नि देने का विधान" 

*मुखाग्नि देना सनातन धर्म में अंतिम संस्कार का सबसे महत्वपूर्ण और भावनात्मक क्षण होता है। यह कार्य आमतौर पर मृतक के सबसे बड़े पुत्र या निकटतम पुरुष रिश्तेदार (पति, भाई, पौत्र आदि) द्वारा किया जाता है।

*विधि: मुख्य शोकाकुल को उत्तर दिशा की ओर मुंह करके खड़ा होना होता है (शव का मुख दक्षिण में होता है)। उसे एक मुट्ठी जल लेकर शव के चारों ओर घुमाते हुए जमीन पर गिरा देना होता है, जिसे "जल तर्पण" कहते हैं। इसके बाद, उसे चिता में लगी हुई अग्नि को एक लकड़ी या घास के पूल्ले से लेकर शव के मुख के पास ले जाना होता है। कई बार यह कार्य पुरोहित द्वारा बताए गए मंत्रों के साथ किया जाता है। शोकाकुल को शव के मुख के पास जलती लकड़ी रखकर आग प्रज्वलित करनी होती है।

*मान्यता: यह कर्मकांड पुत्र के कर्तव्य का अंतिम भाग माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि पुत्र द्वारा दी गई मुखाग्नि ही पिता को मोक्ष दिलाने में सहायक होती है। इस क्षण को "पितृ ऋण से मुक्ति" का प्रतीक माना जाता है। अग्नि देवता को साक्षी मानकर यह कार्य किया जाता है, जो शव को पंचतत्व में विलीन कर देते हैं।

"हां, सनातन धर्मशास्त्रों और परंपराओं के अनुसार दूसरे नंबर के पुत्र (मंजिला या छोटे भाइयों) को भी मुखाग्नि देने का अधिकार है, लेकिन यह विशेष परिस्थितियों में होता है। मूल नियम यह है कि यह कर्तव्य सबसे बड़े पुत्र (ज्येष्ठ पुत्र) का होता है"।

🔍 "किन परिस्थितियों में दूसरा पुत्र मुखाग्नि दे सकता है"?

*,दूसरे पुत्र द्वारा मुखाग्नि देने की मुख्य परिस्थितियां इस प्रकार हैं:

*01. ज्येष्ठ (सबसे बड़े) पुत्र की अनुपस्थिति:

यह सबसे सामान्य स्थिति है। अगर सबसे बड़ा पुत्र किसी कारण वश (जैसे विदेश में होना, गंभीर रूप से बीमार होना, या फिर मृत्युशय्या पर होना) उपस्थित नहीं हो पा रहा है, तो यह कर्तव्य अगले पुत्र (द्वितीय पुत्र) को निभाना चाहिए।

*02. अन्य विशेष परिस्थितियां:

*यदि ज्येष्ठ पुत्र अपनी जाति या धर्म छोड़ चुका है।

*यदि वह मानसिक रूप से इस कर्म को करने में असमर्थ है।

*ऐसी मान्यता भी है कि यदि सबसे बड़ा पुत्र गोद लिया हुआ है और दूसरा पुत्र स्वयं की संतान है, तो दूसरे पुत्र को प्राथमिकता दी जा सकती है। हालांकि, यह एक जटिल विषय है और स्थानीय परंपराओं पर निर्भर करता है।

👨‍👦 "यदि कोई पुत्र ही न हो तो क्या करें"?

*शास्त्रों में इस स्थिति के लिए भी व्यवस्था है। पुत्र की अनुपस्थिति में यह श्रद्धापूर्ण कार्य निम्नलिखित क्रम में कोई भी व्यक्ति कर सकता है:

*पत्नी

*पुत्री या दत्तक पुत्र

*भाई या भतीजा

*कोई अन्य निकटतम पुरुष रिश्तेदार

💡 "महत्वपूर्ण सलाह"

*ध्यान रखें कि सनातन रीति-रिवाज क्षेत्र, समुदाय और परिवार की परंपराओं के अनुसार थोड़े भिन्न हो सकते हैं। अगर आपके मन में इस विषय में कोई संशय है, तो सबसे अच्छा यही है कि आप परिवार के वरिष्ठ सदस्यों या किसी योग्य पंडित/धर्मगुरु से सलाह लें, जो आपकी विशिष्ट परिस्थिति के अनुसार सही मार्गदर्शन दे सकें।

*संक्षेप में: मुख्य नियम बड़े पुत्र को प्राथमिकता देता है, लेकिन उसकी अनुपस्थिति या असमर्थता में दूसरे पुत्र सहित अन्य निकटतम रिश्तेदार भी यह पवित्र कर्तव्य निभा सकते हैं।

"क्या भाई को रहते हुए बहन अपने माता-पिता की मुखाग्नि दे सकती है। सनातन धर्म, गरुड़ पुराण और परंपरा क्या कहता है"।

*यह प्रश्न बहुत गहरा और संवेदनशील है, जो पारंपरिक शास्त्रीय दृष्टिकोण और आधुनिक सामाजिक परिवर्तन के बीच के तनाव को दर्शाता है। संक्षिप्त उत्तर यह है: पारंपरिक और शास्त्रीय व्यवस्था के अनुसार, भाई की उपस्थिति में बहन को मुखाग्नि देने की अनुमति नहीं है। हालांकि, आधुनिक समय में सामाजिक-कानूनी परिवर्तनों और व्यक्तिगत विवेक के आधार पर यह प्रथा बदल रही है।

📜 "सनातन धर्म व गरुड़ पुराण का पारंपरिक दृष्टिकोण"

*पारंपरिक शास्त्रीय व्यवस्था पुरुष वंशजों को ही यह कर्तव्य सौंपती है, और इसमें एक स्पष्ट क्रम है:

*01. पुरुष रिश्तेदारों को प्राथमिकता: गरुड़ पुराण व अन्य धर्मशास्त्रों में अंतिम संस्कार के कर्मकांडों के लिए पुत्र को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। उसकी अनुपस्थिति में यह दायित्व क्रम से: अन्य पुत्र, पौत्र, भाई, भतीजा आदि पुरुष रिश्तेदारों का माना गया है।

*02. स्त्रियों की भूमिका: परंपरागत व्याख्या के अनुसार, स्त्रियों (चाहे पुत्री हो या बहन) को मुखाग्नि देने के विशिष्ट कर्म से अलग रखा गया है। इसके पीछे कई मान्यताएं रही हैं, जैसे उस समय की सामाजिक संरचना, स्त्रियों को यज्ञोपवीत संस्कार न दिया जाना, और यह धारणा कि उनकी उपस्थिति से संस्कार पूर्ण नहीं हो पाते। ऐसे में, यदि भाई उपस्थित है, तो पारंपरिक रीति से बहन के लिए मुखाग्नि देना संभव नहीं है।

⚖️ "आधुनिक संदर्भ एवं परिवर्तनशील परिप्रेक्ष्य"

*समय के साथ, इस पारंपरिक व्यवस्था पर सवाल उठे हैं और व्यवहार में बदलाव आया है:

*01. कानूनी एवं सामाजिक बदलाव: भारतीय उच्चतम न्यायालय ने कई मौकों पर यह स्पष्ट किया है कि धार्मिक प्रथाएं लैंगिक समानता के संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं कर सकतीं। पुत्री को पैतृक संपत्ति में समान अधिकार दिए जाने का रास्ता भी इसी सोच का हिस्सा है।

*02. व्यावहारिक स्थितियां: आज ऐसी many स्थितियां हैं जहां परिवार में कोई पुरुष सदस्य नहीं है, या फिर मौजूद होते हुए भी परिवार की सामूहिक इच्छा या मृतक की अंतिम इच्छा यह होती है कि पुत्री या बहन ही यह अंतिम कर्तव्य निभाए। आधुनिक सनातन समाज में ऐसे उदाहरण तेजी से बढ़ रहे हैं।

*03. शास्त्रों की आध्यात्मिक व्याख्या: कई आधुनिक विद्वान और धर्माचार्य मानते हैं कि शास्त्रों का मूल उद्देश्य श्रद्धा, भक्ति और कर्तव्य की भावना पर जोर देना है, न कि केवल लिंग पर। उनके अनुसार, जो सन्तान (चाहे पुत्र हो या पुत्री) सबसे अधिक श्रद्धा, स्नेह और कर्तव्य भाव से यह कर्म करना चाहती है, उसे प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

💡 "निष्कर्ष एवं सलाह"

*इस प्रकार, हम देखते हैं कि एक तरफ कठोर पारंपरिक नियम हैं, तो दूसरी तरफ बदलती सामाजिक मान्यताएं और कानूनी दृष्टिकोण हैं।

*यदि बात केवल शास्त्रीय पारंपरिक रीति की करें, तो भाई की उपस्थिति में बहन के लिए मुखाग्नि देना प्रचलन में नहीं है।

*लेकिन आधुनिक और व्यावहारिक धरातल पर, अनेक परिवार अपनी व्यक्तिगत श्रद्धा, पारिवारिक एकता और मृतक के प्रति स्नेह को सर्वोच्च महत्व देकर इस परंपरा को तोड़ रहे हैं। अंततः, यह परिवार की सामूहिक इच्छा और विवेक पर निर्भर एक अत्यंत निजी निर्णय है।

*सबसे उचित मार्ग: ऐसी संवेदनशील स्थिति में, परिवार को किसी ज्ञानी और उदारवादी धर्माचार्य या पंडित से सलाह लेनी चाहिए, जो शास्त्रों के ज्ञान के साथ-साथ आधुनिक संदर्भों को भी समझते हों। साथ ही, परिवार के सभी सदस्यों की सहमति और मृतक के प्रति श्रद्धा का भाव सबसे महत्वपूर्ण है।

"प्रश्नों का उत्तर सनातन धर्म के पारंपरिक शास्त्रीय नियमों के आधार में आता है। सामान्य प्रथा से इतर ये विशेष स्थितियां हैं, और दोनों ही के लिए शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश हैं"।

👨 *01. क्या मृत पुत्र को उसके पिता मुखाग्नि दे सकते हैं?

*पारंपरिक शास्त्रीय नियम के अनुसार, नहीं दे सकते।

*स्पष्ट निषेध: धर्मशास्त्रों में यह स्पष्ट कहा गया है कि पिता को अपने पुत्र का अंतिम संस्कार (दाह संस्कार) नहीं करना चाहिए। इसे वर्जित माना गया है।

*कारण: इस नियम के पीछे मुख्य भावना पीढ़ियों का क्रम (Hierarchy) और श्रद्धा का है। सनातन परंपरा में, पुत्र द्वारा पिता का अंतिम संस्कार करना पितृ ऋण से मुक्ति का प्रतीक है। इस कर्म कांडिक क्रम को उलट देने का विधान नहीं है। ऐसी स्थिति में संस्कार का दायित्व किसी अन्य रिश्तेदार का होता है।

*वैकल्पिक व्यवस्था: ऐसी दुखद स्थिति में, यह कर्तव्य परिवार का कोई दूसरा पुरुष सदस्य, जैसे कि मृतक का भाई, चाचा या भतीजा निभाता है।

👩 *02. क्या पति ही सिर्फ अपनी पत्नी को मुखाग्नि दे सकता है?

*पारंपरिक नियम के अनुसार, विवाहिता स्त्री (सुहागन) का दाह संस्कार करने का प्रथम अधिकार उसके पति को ही है।

*परंपरागत विधान: शास्त्रीय परंपरा में, "सुहागन महिला का संस्कार पति द्वारा किया जाना चाहिए"। पति-पत्नी का बंधन अत्यंत पवित्र माना जाता है और मृत्यु के बाद भी इसकी अभिव्यक्ति इसी रूप में होती है।

*अपवाद की स्थितियां: यह नियम तभी लागू होता है जब पति जीवित और शारीरिक रूप से सक्षम हो। यदि पति की मृत्यु पहले हो चुकी है, या वह अनुपस्थित है, तो यह कर्तव्य पुत्र या परिवार के किसी अन्य पुरुष सदस्य को निभाना होता है।

*आधुनिक संदर्भ: आजकल, जहां पुत्र नहीं है या परिवार की इच्छा हो, तो पुत्रियां भी अपनी मां का अंतिम संस्कार करती हैं। यह एक बदलती सामाजिक स्वीकार्यता को दर्शाता है।

📜 *निष्कर्ष

*संक्षेप में, परंपरागत नियम इस प्रकार हैं:

*पुत्र का संस्कार

*परंपरागत नियम: पिता द्वारा निषिद्ध है।

*वैकल्पिक व्यवस्था: भाई, चाचा या अन्य पुरुष रिश्तेदार करते हैं।

*पत्नी का संस्कार

*परंपरागत नियम: पति का प्रथम अधिकार है।

*अपवाद: पति की अनुपस्थिति में पुत्र या अन्य रिश्तेदार करते हैं।

*अंत में, ये शास्त्रीय नियम हैं, लेकिन व्यवहार में स्थानीय परंपराएं, परिवार की मान्यताएं और आधुनिक सामाजिक बदलाव भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। किसी विशिष्ट स्थिति में सबसे उचित मार्गदर्शन परिवार के वरिष्ठ सदस्यों या किसी ज्ञानी पंडित से लेना ही उचित रहता है।

"चिता को कितने बार परिक्रमा की जाती है"? 

*चिता को परिक्रमा करना एक प्रतीकात्मक और आध्यात्मिक कर्मकांड है। परिक्रमा की संख्या और दिशा स्थानीय परंपराओं के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकती है, लेकिन सबसे सामान्य प्रथा है तीन बार परिक्रमा करना।

*विधि: मुखाग्नि देने के बाद, मुख्य शोकाकुल (और कभी-कभी अन्य पुरुष रिश्तेदार) चिता के चारों ओर वामावर्त (घड़ी की सुई की दिशा के विपरीत) दिशा में परिक्रमा करते हैं। यह दिशा मृत्यु और विघटन से जुड़ी मानी जाती है, जबकि जीवन और उत्सव के अवसरों पर दक्षिणावर्त (घड़ी की सुई की दिशा में) परिक्रमा की जाती है।

*प्रतीकात्मक अर्थ: प्रत्येक परिक्रमा का एक विशेष अर्थ माना जाता है। एक मान्यता के अनुसार, यह तीन ऋणों - देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण से मुक्ति का प्रतीक है। एक अन्य व्याख्या यह है कि यह जन्म, जीवन और मृत्यु के चक्र से मुक्ति का प्रतीक है। परिक्रमा करते समय हाथ में जल की कलशी लेकर पानी की एक धारा जमीन पर गिराई जाती है, जो आत्मा की यात्रा के लिए एक अविच्छिन्न मार्ग बनाने का प्रतीक है। अंतिम परिक्रमा के बाद, कलश को पीछे की ओर फेंक दिया जाता है और बिना पीछे मुड़े देखे श्मशान से बाहर निकल जाते हैं।

"कुछ स्थानों पर चिता को परिक्रमा करने का तरीका इस प्रकार है":

*01. *पहली परिक्रमा*: शव के सबसे बड़े पुत्र या परिवार के सबसे बड़े सदस्य द्वारा चिता की पहली परिक्रमा की जाती है।

*02. *दूसरी परिक्रमा*: शव के परिवार के सदस्यों द्वारा चिता की दूसरी परिक्रमा की जाती है।

*03. *तीसरी परिक्रमा*: शव के मित्रों और संबंधियों द्वारा चिता की तीसरी परिक्रमा की जाती है।

*04. *चौथी परिक्रमा*: शव के परिवार के सदस्यों द्वारा चिता की चौथी परिक्रमा की जाती है।

*05. *पांचवीं परिक्रमा*: शव के सबसे बड़े पुत्र या परिवार के सबसे बड़े सदस्य द्वारा चिता की पांचवीं और अंतिम परिक्रमा की जाती है।

"श्मशान से आने के बाद क्या करना चाहिए"?

*श्मशान से लौटना एक संक्रमण काल की शुरुआत है। इस दौरान शोकाकुल परिवार को अशौच (सूतक) की अवधि में रहना होता है और कुछ विशेष नियमों का पालन करना होता है।

*01. स्नान एवं शुद्धि: श्मशान से लौटते ही सभी सदस्यों को नहा-धोकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। यह शारीरिक और मानसिक शुद्धि के लिए आवश्यक है। घर के मुख्य द्वार पर जल का छिड़काव किया जाता है। साथ ही निश्चित स्थान पर कुश गाड़ा जाता है। सभी लोग तिल मिले जल से तर्पण करने का विधान है। पुरूषों के स्नान के बाद महिलाएं स्नान कर कुश में जल डालती है।

*02. दीपक जलाना: मृतक की स्मृति में एक दीपक (अक्सर तिल के तेल का) 10-13 दिनों तक घर के द्वार पर निरंतर जलाया जाता है। मान्यता है कि इससे आत्मा को प्रकाश और ऊर्जा मिलती है।

*03. भोजन: श्मशान से लौटने के बाद पहला भोजन अक्सर पड़ोसियों या रिश्तेदारों द्वारा बनाकर दिया जाता है। शोकाकुल परिवार स्वयं पहले दिन भोजन नहीं बनाता। भोजन सादा और शाकाहारी होता है।

*04. पिंड दान की शुरुआत: मृत्यु की तिथि से गिनती शुरू होती है और अगले दिन से (या उसी दिन से, समय के अनुसार) पिंड दान का क्रम शुरू हो जाता है। प्रतिदिन एक पिंड (आटे, तिल और जल से बना) मृतक की आत्मा की शांति के लिए अर्पित किया जाता है। यह 10 वें या 13 वें दिन तक चलता है।

*05. अशौच के नियम: परिवार के सदस्य अशौच की अवधि (सामान्यतः 10-13 दिन) तक मंदिर नहीं जाते, कोई धार्मिक या शुभ कार्य नहीं करते, श्रृंगार नहीं करते और सामाजिक उत्सवों में भाग नहीं लेते। तेल और साबुन का इस्तेमाल भी वर्जित रहता है। यह समय आत्मचिंतन और शोक के लिए निर्धारित होता है।

*06. अस्थि संचयन: श्मशान से लौटते समय मृतक की अस्थियां (अस्थि कलश) लाने की प्रथा है, जिन्हें बाद में किसी पवित्र नदी (गंगा, यमुना आदि) में विसर्जित किया जाता है।

"दस कर्म क्या है"? 

"दस कर्म" या "दश क्रम  क्रियाएं" सनातन धर्म में मृत्यु के बाद किए जाने वाले दस अनिवार्य संस्कारों का समूह है। ये कर्म मृतक की आत्मा की शांति और उसके अगले जन्म की शुभता सुनिश्चित करने के लिए किए जाते हैं। ये कर्म मृत्यु के दिन से लेकर 13वें दिन तक किए जाते हैं।

"दस कर्म और उनका विधान":

*01. मृतक स्नान (घट स्नान): मृत्यु के बाद शव को स्नान कराकर शुद्ध किया जाता है। (पहले दिन)

02. वस्त्र दान: शव को नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और पुराने वस्त्र दान कर दिए जाते हैं। (पहले दिन)

*03. कपाल क्रिया (मुखाग्नि): श्मशान में शव को अग्नि दी जाती है। यह सबसे प्रमुख कर्म है। (पहले दिन)

*04. अस्थि संचयन (अस्थि संचय): दाह संस्कार के बाद तीसरे दिन (या दूसरे दिन, परंपरानुसार) अस्थियां एकत्रित की जाती हैं और एक कलश में रख ली जाती हैं। (तीसरा दिन)

*05. सपिंडीकरण: यह सबसे महत्वपूर्ण कर्म है, जिसमें मृतक की आत्मा को पितरों (पूर्वजों) में शामिल कर लिया जाता है। इसमें पिंडों का विशेष विधान होता है। यह कर्म 10वें, 11वें या 12वें दिन किया जाता है। (दसवां/ग्यारहवां दिन)

*06. पिंड दान (नित्य पिंड): मृत्यु के बाद से लेकर सपिंडीकरण तक प्रतिदिन पिंड दान किया जाता है। यह आत्मा के लिए आहार का काम करता है। (प्रतिदिन)

*07. दान (दशगात्र दान): मृत्यु के बाद ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र, अनाज, धन आदि का दान दिया जाता है। यह पुण्य कर्म मृतक के लिए फलदायी माना जाता है।

*08. तर्पण: प्रतिदिन जल, तिल, कुशा और फूल अर्पित करके पितरों को तृप्त किया जाता है। (प्रतिदिन)

*09. ब्रह्मभोज (श्राद्ध): ब्राह्मणों या बुजुर्गों को भोजन कराकर उनके माध्यम से मृतक को भोजन पहुंचाया जाता है। यह 13वें दिन विशेष रूप से किया जाता है। (तेरहवां दिन)

*10. विसर्जन (अस्थि विसर्जन): अस्थि कलश को किसी पवित्र नदी या तीर्थ स्थान पर ले जाकर विसर्जित किया जाता है। यह कर्म अक्सर 10 वें दिन के पहले कभी भी किया जा सकता है। लेकिन आमतौर पर 10 वें दिन के पहले ही किया जाता है।

*महत्व: इन कर्मों का उद्देश्य केवल रीति-रिवाज निभाना नहीं है। मान्यता है कि ये कर्म मृतात्मा को एक नए शरीर की प्राप्ति तक की यात्रा में सहायक होते हैं। ये परिवार को शोक को संस्कारों में ढालकर उबरने में भी मदद करते हैं और उन्हें यह एहसास दिलाते हैं कि उन्होंने अपने प्रियजन के प्रति अपना कर्तव्य पूर्ण कर दिया है।

*एकादश कितने दिन पर होता है"? 

*मृत्यु के बाद एकादश (या एकादश) का बहुत महत्व है। यह मृत्यु की तारीख से गिनती करने पर 11वां दिन होता है। एकादश का अर्थ है "ग्यारहवां"।

*विधान एवं महत्व: सनातन मान्यता के अनुसार, मृत्यु के बाद आत्मा को नए शरीर की प्राप्ति तक विचरण करना पड़ता है। यह यात्रा लगभग 13 दिनों की मानी जाती है। 11वें दिन तक आत्मा कई लोकों से गुजर चुकी होती है और इस दिन वह यमलोक के द्वार पर पहुंचती है। इसलिए, इस दिन किए गए कर्म आत्मा की यमलोक में सहज यात्रा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

"क्या किया जाता है"?:

 *इस दिन विशेष पिंड दान और तर्पण किया जाता है।

*एकादशाह श्राद्ध किया जाता है, जिसमें ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है और दान-दक्षिणा दी जाती है।

*विष्णु पूजा: चूंकि एकादश का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है, इसलिए इस दिन विष्णु जी की पूजा करने का भी विधान है। ऐसा माना जाता है कि विष्णु की कृपा से आत्मा को मोक्ष मिलता है।

*कई परिवार इस दिन सफेद वस्त्र धारण करते हैं और व्रत रखते हैं।

*कुछ परंपराओं में इसी दिन अस्थि विसर्जन भी किया जाता है।

*उद्देश्य: एकादश के कर्मों का मुख्य उद्देश्य आत्मा को यमलोक में किसी भी कष्ट से बचाना, उसके लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाना और अंततः उसे मोक्ष की ओर अग्रसर करना है। यह परिवार के लिए भी एक महत्वपूर्ण दिन है, जब वे अपने प्रियजन की आत्मा की शांति के लिए विशेष प्रयास करते हैं।

"तेरहवीं (ब्रह्मभोज) का विधान" 

*तेरहवां दिन, जिसे ब्रह्मभोज, तेरहवीं श्राद्ध या क्रियाकर्म समापन कहा जाता है, हिंदू शोक संस्कारों का अंतिम प्रमुख दिन है। इस दिन अशौच (सूतक) की अवधि समाप्त हो जाती है और परिवार सामान्य जीवन में लौटना शुरू करता है।

"क्या किया जाता है" (विधान):

*01. श्राद्ध एवं ब्रह्मभोज: इस दिन का सबसे महत्वपूर्ण कर्म है ब्रह्मभोज। इसमें एक या एक से अधिक ब्राह्मणों (विद्वान व्यक्तियों) को घर बुलाकर उन्हें पूरे विधि-विधान से भोजन कराया जाता है। मान्यता है कि ब्राह्मण के रूप में विष्णु स्वयं भोजन ग्रहण करते हैं और यह भोजन मृतक की आत्मा तक पहुंचता है। भोजन के बाद उन्हें दक्षिणा, वस्त्र, फल आदि दान में दिए जाते हैं।

*02. पिंड दान का समापन: इस दिन अंतिम पिंड दान किया जाता है, जिसे तीजा पिंड भी कह सकते हैं। इसके बाद प्रतिदिन के पिंड दान की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है।

*03. विसर्जन: यदि पहले न किया गया हो, तो इस दिन मृतक की अस्थियों के कलश को किसी पवित्र नदी में विसर्जित किया जाता है।

*04. दान-पुण्य: गरीबों, जरूरतमंदों और धार्मिक संस्थाओं को दान दिया जाता है। मृतक की स्मृति में पेड़ लगाना, कुएं बनवाना, या अन्य सामाजिक कार्य करना शुभ माना जाता है।

*05. सामूहिक भोज: ब्रह्मभोज के अलावा, परिवार के सभी सदस्य, रिश्तेदार और पड़ोसी एक साथ बैठकर भोजन करते हैं। यह एकता और सामाजिक सहयोग का प्रतीक है।

*06. मृतक की स्मृति: इस दिन मृतक की फोटो पर फूलमाला चढ़ाई जाती है और उनके प्रति श्रद्धांजलि दी जाती है।

*07. इस दिन सेजिया दान किया जाता है। व्यक्ति के उपयोग के सभी वस्तुएं मसलन चौकी, बिछावन, मछरदानी, रजाई, तोसक, सहित भोजन बनाने का बर्तन आदि दान करने का विधान है।

"दो प्रकार के कर्म एवं पंडितों का विवरण"

*श्राद्ध के दौरान "भगवान विष्णु के पंडित" और "यमराज की पंडित" शब्दावली सटीक रूप से प्रचलित नहीं है। सनातन धर्म में मृत्यु के बाद के क्रियाकर्मों को मुख्य रूप से दो प्रकार के उद्देश्यों से किया जाता है, और प्रत्येक के लिए अलग-अलग विशिष्ट पंडित या विद्वान अपनी भूमिका निभाते हैं

*01. प्रेत संबंधी कर्म (यमलोक/प्रेतलोक से संबंधित)

*उद्देश्य: मृत्यु के तुरंत बाद आत्मा की यमलोक या प्रेतलोक में सहज यात्रा सुनिश्चित करना और उसे शरीर के मोह से मुक्त करना।

*संबंधित देवता/आधार: यह कर्म मृत्यु के देवता यमराज और प्रेत विधान से संबंधित माने जाते हैं।

*पंडित की भूमिका: इन्हें अक्सर 'प्रेत कर्म' या 'मृत संस्कार' के विशेषज्ञ पंडित कहा जा सकता है। ये पंडित श्मशान घाट से लेकर तेरह दिनों तक चलने वाले अधिकांश अनुष्ठानों का संचालन करते हैं। इनका मुख्य कार्य मंत्रों के माध्यम से आत्मा को शरीर के बंधन से मुक्त करके यमलोक की यात्रा पर भेजना है।

*02. शांति, मोक्ष एवं विष्णुलोक संबंधी कर्म

*उद्देश्य: आत्मा को पितृलोक में स्थापित करना, उसे मोक्ष की ओर अग्रसर करना और परिवार में शांति स्थापित करना।

*संबंधित देवता/आधार: ये कर्म भगवान विष्णु के आशीर्वाद और पितृ देवताओं से जुड़े हैं।

*पंडित की भूमिका: इन्हें 'शांति कर्म' या 'मोक्ष कर्म' के विशेषज्ञ पंडित कहा जा सकता है। इनकी प्रमुख भूमिका 'सपिंडीकरण' (आत्मा को पितरों में मिलाने का कर्म) जैसे महत्वपूर्ण संस्कार कराना है, जो 12वें या 13वें दिन होता है। इसके बाद विष्णु पूजन, गणेश पूजन और ब्राह्मण भोज का आयोजन किया जाता है, जिसका संचालन यही पंडित करते हैं।

"कर्मकांडी पंडित कौन होते हैं और उनकी भूमिका क्या है"?

*व्यवहार में, परिवार अक्सर एक ही मुख्य पंडित (जो कर्मकांडी विद्वान हो) से 13 दिनों के सभी संस्कार करवाता है, जो दोनों ही प्रकार के कर्मों में निपुण होता है। हालांकि, कुछ विशेष कर्मों के लिए अलग विशेषज्ञ भी बुलाए जा सकते हैं।

"एक मुख्य पंडित की भूमिका इस प्रकार है":

*01. विधि-विधान का निर्देशन: वह परिवार को 13 दिनों के दौरान तिलांजली, पिंडदान, तर्पण आदि हर क्रिया का सही तरीका और मंत्र बताता है।

*02. गरुड़ पुराण का पाठ: मृत्यु के तीसरे दिन से दसवें दिन तक घर में गरुड़ पुराण के पाठ का आयोजन कराता है। यह पाठ परिवार को जीवन-मृत्यु के चक्र का दर्शन कराता है और आत्मा के लिए मार्गदर्शन का काम करता है।

*03. महत्वपूर्ण संस्कार कराना: वह दसवें और बारहवें दिन के विशेष पिंडदान और अंत में सपिंडीकरण जैसे निर्णायक संस्कार संपन्न कराता है, जिसके बाद ही आत्मा पितृलोक में पहुंचती है।

*04. शांति कर्म का समापन: तेरहवें दिन विष्णु पूजन, गणेश पूजन और ब्राह्मण भोज जैसे कर्मों का आयोजन कराकर शोक अवधि को समाप्त कराता है और घर में शांति स्थापित करता है।

*निष्कर्ष

*संक्षेप में, "यमराज के पंडित" और "विष्णु के पंडित" वास्तव में अलग-अलग व्यक्ति होते हैं और अलग-अलग कर्मकांड के कार्य को  संपादित करते हैं। पहले चरण में उनका कार्य यमलोक/प्रेतलोक से संबंधित विधियों (प्रेत कर्म) का निर्देशन करना है, और अंतिम चरण में उनका कार्य विष्णुलोक/मोक्ष से जुड़े शांति कर्म (शांति/मोक्ष कर्म) संपन्न कराना है।

"दोनों प्रकार के पंडितों और उनकी भूमिकाओं की व्याख्या दी गई है":

*बिहार, झारखंड , उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सहित अधिकांश सनातनी समाज में प्रचलित श्राद्ध के उस दशमा और एकादश के दिनों महा ब्राह्मण सभी कार्य संपादित करते हैं। 

*दशमा के दिन महा ब्राह्मण गांव से दूर घाट पर खाना बनाते हैं और परिवार के सभी सदस्य अपने सर का मुंडन करवाते हैं महा ब्राह्मण के भोजन करने के उपरांत थे घर में लहसुन, प्याज, हल्दी, तेल और मसाला का उपयोग शुरू हो जाता है। महा ब्राह्मण पिंडदान भी यहां पर करते हैं आज इसके दिन से लोग अपने शरीर में साबुन और तेल लगाना शुरू कर देते हैं।

*एकादश के दिन फिर से महा ब्राह्मण का कार्य शुरू हो जाता है। महा ब्राह्मण घाट पर आते हैं और अपना काम शुरू कर देते हैं। महा ब्राह्मण को इस दिन सेजिया दान होता है अर्थात मित्र आत्मा की सभी जरूरी सामान्य महा ब्राह्मण को दान किया जाता है मसलन चौकी, बिछावन, खाना बनाने के समान सहित बकरी भी दान करने का परंपरा है। अंत में दान किए हुए चौकी पर बैठकर महा ब्रह्मण तिल और दूध पीकर का एकादश के कार्यक्रम संबंध करते हैं।

*01. गृह/विष्णु पंडित

*पहचान: ये सामान्यतः गृहस्थ पंडित या वैष्णव पंडित होते हैं।

*संप्रदाय एवं कार्यक्षेत्र: ये भगवान विष्णु के उपासक होते हैं और घर के अंदर के सभी कर्मकांड संपन्न कराते हैं।

* प्रमुख भूमिकाएं:

 *परिवार को तर्पण, ब्राह्मण भोज एवं दान जैसी दैनिक विधियों का मार्गदर्शन करना।

*गरुड़ पुराण या अन्य शांति पुराणों के पाठ का आयोजन व संचालन करना।

*घर में शांति, सात्विकता और पवित्रता के वातावरण को बनाए रखने में सहायता करना।

*02. महा/यम पंडित

*पहचान: इन्हें "महा पंडित", "यम पंडित" या कभी-कभी "बाहरी पंडित" कहा जाता है।

*संप्रदाय एवं कार्यक्षेत्र: ये मृत्यु के देवता यमराज से संबंधित विधि-विधानों के विशेषज्ञ माने जाते हैं और मुख्य रूप से घर के बाहर (जैसे नदी घाट, चौराहा या खुले स्थान पर) कर्म कराते हैं।

 *प्रमुख भूमिकाएं:

 *दस कर्म (दस क्रियाएं) में महत्वपूर्ण भूमिका, विशेष रूप से वे कर्म जो प्रेतत्व से मुक्ति और यमलोक की यात्रा से जुड़े हैं।

*ग्यारहवें दिन (एकादश) के विशेष संस्कार का संचालन। मान्यता है कि इस दिन आत्मा यमलोक के द्वार पर पहुंचती है, और यम पंडित द्वारा किए गए विशिष्ट पिंडदान व तर्पण से उसे शांति मिलती है।

*सामान्यतः, ये पंडित नदी घाटों पर पिंडदान जैसे कर्म कराने में विशेष भूमिका निभाते हैं।

"दोनों पंडितों का संयुक्त महत्व"

*यह दोहरी व्यवस्था आत्मा की दोहरी यात्रा के सिद्धांत को दर्शाती है: एक ओर यमलोक की ओर (जिसके लिए महा पंडित जिम्मेदार हैं), और दूसरी ओर वैकुंठ या मोक्ष की ओर (जिसमें गृह पंडित सहायक हैं)। ग्यारहवें दिन के बाद, जब आत्मा को पितरों में मिला दिया जाता है, तब से आगे के शांति कर्मों में मुख्यतः विष्णु पंडित (गृह पंडित) की ही भूमिका रह जाती है।

*यह प्रथा क्षेत्र विशेष की परंपरा है और आधुनिक समय में सभी कर्म एक ही पंडित द्वारा भी कराए जा सकते हैं

"क्या नहीं करना चाहिए"(निषेध):

*01. शोक का अतिरेक: इस दिन के बाद अत्यधिक शोक और विलाप करने से मना किया जाता है। मान्यता है कि इससे आत्मा की यात्रा में बाधा आती है। परिवार को मानसिक रूप से मजबूत होकर आगे बढ़ना चाहिए।

*02. मांस-मदिरा का सेवन: इस पवित्र दिन पर किसी भी प्रकार का नशा या तामसिक भोजन (मांस, मछली, अंडा, प्याज-लहसुन) वर्जित होता है। भोजन सात्विक और शुद्ध शाकाहारी होना चाहिए।

*03. झगड़ा या कलह: इस दिन घर में किसी भी प्रकार का झगड़ा, बहस या नकारात्मक बातचीत नहीं करनी चाहिए। वातावरण शांत और पवित्र रखना चाहिए।

*04. अन्य शुभ कार्य: इस दिन कोई नया शुभ कार्य (जैसे गृहप्रवेश, विवाह, खरीदारी) शुरू नहीं किया जाता। यह दिन विशेष रूप से मृतक की आत्मा की शांति के लिए समर्पित होता है।

*05. भोजन में लापरवाही: ब्राह्मण या अतिथियों के भोजन की व्यवस्था में किसी प्रकार की कमी या अपमानजनक व्यवहार नहीं करना चाहिए।

*तेरहवीं का उद्देश्य परिवार को शोक से बाहर निकालकर जीवन की मुख्यधारा में लौटाना और यह विश्वास दिलाना है कि उन्होंने मृतक के प्रति सभी कर्तव्यों का पालन कर दिया है।

"मृत व्यक्ति की कौन सी चीज इस्तेमाल नहीं करनी चाहिए"?

*मृत्यु के बाद मृतक की निजी वस्तुओं के प्रति एक संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाया जाता है। इनके उपयोग को लेकर सांस्कृतिक मान्यताएं और व्यावहारिक सावधानियां दोनों ही महत्वपूर्ण हैं।

*01. सोना-चांदी और कीमती गहने: मृतक के गहने (विशेषकर सोने के) को धारण करना अशुभ माना जाता है। मान्यता है कि इनमें मृतक की ऊर्जा या संस्कार चिपके रहते हैं, जो नए धारण करने वाले के जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। इन्हें बेचकर दान कर देना, पुत्री को दे देना या मंदिर में अर्पित कर देना उचित माना जाता है।

*02. वस्त्र एवं जूते-चप्पल: मृतक के निजी वस्त्रों (अंडरगार्मेंट्स, धोतियां, साड़ियां, शर्ट-पैंट) और जूते-चप्पल का उपयोग नहीं करना चाहिए। यह स्वच्छता और संवेदनशीलता दोनों के विरुद्ध है। इन्हें धोकर गरीबों में दान कर देना चाहिए या नष्ट कर देना चाहिए।

*03. बिस्तर एवं तकिए: मृत्यु के तुरंत बाद बिस्तर, गद्दे, तकिए और चादरों को अच्छी तरह धोना चाहिए या बदल देना चाहिए। कई परिवार इन्हें दान भी कर देते हैं। इन पर लगे शारीरिक द्रव्यों के कारण स्वास्थ्य संबंधी जोखिम हो सकते हैं।

*04. दैनिक उपयोग की वस्तुएं: मृतक की टूथब्रश, कंघा, रेजर, तौलिया आदि का उपयोग बिल्कुल नहीं करना चाहिए। ये व्यक्तिगत स्वच्छता की वस्तुएं हैं और इन्हें तुरंत फेंक देना चाहिए।

*05. औषधियां एवं चश्मा: बीमारी के दौरान इस्तेमाल की गई दवाइयों को फेंक देना चाहिए। चश्मे का नंबर अलग हो सकता है, इसलिए इसे भी उपयोग में नहीं लाना चाहिए।

*06. अन्य निजी सामान: घड़ी, पेन, मोबाइल फोन जैसी चीजों को लेकर नियम स्पष्ट नहीं हैं। इन्हें यदि भावनात्मक लगाव न हो, तो दान कर देना या बेच देना उचित रहता है। यदि स्मृति के रूप में रखना चाहें, तो उन्हें अच्छी तरह साफ करके पूजा स्थल पर रख सकते हैं।

*सामान्य नियम: मूलभूत नियम यह है कि जो वस्तुएं सीधे शरीर के संपर्क में आती थीं या जिनसे मृतक का गहरा लगाव था, उनका तुरंत उपयोग न करें। इन्हें दान करना सबसे श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि इससे पुण्य प्राप्त होता है और वस्तुओं का सदुपयोग भी हो जाता है।

"मृत व्यक्ति से माफी कैसे मांगें"? 

*जीवित रहते हुए यदि मृतक के साथ कोई अनबन, अपराधबोध या बिना माफी छूटा कोई मनमुटाव रह गया हो, तो आत्मा की शांति के लिए उनसे माफी मांगना एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक कार्य है। इससे जीवित व्यक्ति को मानसिक शांति भी मिलती है।

*01. मन ही मन संवाद: शांत बैठकर मृतक का स्मरण करें। मन ही मन उनसे बात करें और अपनी भूल या कठोर व्यवहार के लिए क्षमा मांगें। दिल से यह विश्वास करें कि वह आपकी बात सुन रहे हैं।

*02. श्राद्ध या तर्पण के समय: तेरहवीं, एकादश या किसी भी श्राद्ध के अवसर पर, जब आप उनके निमित्त जल, पिंड या भोजन अर्पित कर रहे हों, उस पल को उनसे माफी मांगने के लिए उपयोग कर सकते हैं। उनके नाम से किए जा रहे दान को अपनी माफी का हिस्सा मान सकते हैं।

*03. उनकी पसंद का दान: मृतक की पसंद की किसी वस्तु या सेवा का दान करें। जैसे, यदि वे शिक्षा में विश्वास रखते थे, तो किसी गरीब छात्र की मदद करें और उनके नाम से करें। यह कार्य आपके अपराधबोध को कम करेगा।

*04. पत्र लिखना: कुछ लोग मृतक को एक पत्र लिखकर उसमें अपनी सारी भावनाएं व्यक्त करते हैं और माफी मांगते हैं। इस पत्र को फिर शांतिपूर्वक जला देते हैं या किसी पवित्र स्थान पर रख देते हैं।

*05. संकल्प लेना: मृतक से वादा करें कि आप भविष्य में उनकी शिक्षाओं या इच्छाओं के अनुरूप जीवन जिएंगे और उनके प्रति सम्मान बनाए रखेंगे। यह सकारात्मक संकल्प आपके रिश्ते को सुधारने का एक तरीका है।

*याद रखें, माफी मांगने का यह कर्म आपके अपने मन के भार को हल्का करने और मृतक की आत्मा को शांति देने के लिए है। इसे पूरे हृदय से करें।

"पारंपरिक वार्षिक बरसी vs. ब्रह्मभोज-बाद बरखी"

*पहलू पारंपरिक वार्षिक बरसी (वर्षगांठ) ब्रह्मभोज के बाद की बरखी

*समय मृत्यु के ठीक एक वर्ष बाद, उसी तिथि को. ब्रह्मभोज (13वें दिन के भोज) के तुरंत बाद (यानी मृत्यु के 13-16 दिनों के भीतर)।

*प्रकृति वार्षिक स्मरण और श्राद्ध का सामान्य संस्कार। मृत्यु के तुरंत बाद के संस्कार काल का एक अंतिम और विशेष चरण, जो 13 दिनों के अनुष्ठानों की श्रृंखला को पूर्ण करता है।

*मुख्य उद्देश्य वार्षिक रूप से पूर्वज को याद करना, उनकी आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध करना और परिवार को एकत्रित करना. दस कर्मों और 13 दिनों के सभी अनुष्ठानों की समाप्ति का प्रतीक। आत्मा को घर के बंधन से पूरी तरह मुक्त करके, पितृलोक की यात्रा के लिए विदा करना।

*पंडित की भूमिका मुख्य रूप से विष्णु/गृह पंडित द्वारा घर के भीतर श्राद्ध और भोज का संचालन। इसमें यम/महा पंडित की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ये पंडित घर के बाहर (नदी घाट, चौराहे पर) विशेष पिंडदान और तर्पण जैसे प्रेतत्व-निवारण संबंधी कर्म कराते हैं।

"ब्रह्म भोज के दूसरे दिन बरखी करने की परंपरा" 

*ब्रह्म भोज के उपरांत बरखी के दिन अंतिम पिंड दिया जाता है। बहुत से जगह पर पगड़ी का पहनाने का रश्म भी पूरा किया जाता है। किसी दिन घर के बड़े लड़के को मलिक का दायित्व दिया जाता है। समाज के लोग उसे बैठक विधि विधान का मंत्र उच्चारण के बीच पगड़ी पहनने का रश्म पूरा करते हैं।

इस ब्लॉग से संबंधित प्रश्नोत्तर" (FAQ) 

*01. प्रश्न: क्या आज के आधुनिक युग में भी इतने सारे संस्कारों की आवश्यकता है?

*उत्तर:संस्कारों का उद्देश्य केवल रीति-रिवाज निभाना नहीं, बल्कि मानवीय भावनाओं और आध्यात्मिक प्रक्रिया को एक व्यवस्थित रूप देना है। ये संस्कार शोकाकुल परिवार को एक संरचना देते हैं, जिससे वे धीरे-धीरे सदमे से बाहर आ सकें। आध्यात्मिक दृष्टि से, ये आत्मा की यात्रा के लिए मार्गदर्शन का काम करते हैं। हाँ, कुछ व्यावहारिक पहलुओं (जैसे अस्थि विसर्जन) में आधुनिकता आ गई है, लेकिन संस्कारों का मूल सार आज भी प्रासंगिक है।

*02. प्रश्न: यदि मृतक की कोई संतान नहीं है, तो मुखाग्नि कौन देगा?

*उत्तर:धर्मशास्त्रों में इसका लचीला विधान है। यदि पुत्र नहीं है, तो पत्नी, पुत्री, दत्तक पुत्र, भतीजा, भाई या कोई भी निकटतम पुरुष रिश्तेदार यह कार्य कर सकता है। आजकल, कई परिवारों में पुत्रियां भी यह कर्तव्य निभा रही हैं। महत्व इरादे और श्रद्धा का है, न कि केवल लिंग का।

*03. प्रश्न: क्या विद्युत शवदाह गैस चूल्हे से संस्कार पूर्ण हो जाते हैं?

*उत्तर:हां, पूर्ण हो जाते हैं। अग्नि का प्रतीकात्मक महत्व है - पंचतत्वों में विलीन होना। विद्युत या गैस चूल्हा भी अग्नि का ही एक रूप है। यह पर्यावरण के अनुकूल और कई बार अधिक संपूर्ण दाह प्रदान करने वाला विकल्प है। मान्यता है कि अग्नि देवता किसी भी रूप में स्वीकार्य हैं, बशर्ते विधि पूर्वक और श्रद्धापूर्वक कर्म किया जाए।

*04. प्रश्न: क्या महिलाएं श्मशान घाट जा सकती हैं?

*उत्तर:यह एक विवादित और क्षेत्रीय परंपरा पर निर्भर प्रश्न है। पारंपरिक रूप से, महिलाओं (विशेषकर परिवार की) के श्मशान न जाने का रिवाज था, जिसके पीछे उनकी भावनात्मक संवेदनशीलता और सामाजिक सुरक्षा जैसे कारण रहे होंगे। हालांकि, आधुनिक समय में यह बदल रहा है। कई परिवार अब महिलाओं को भी अंतिम यात्रा और श्मशान तक जाने देते हैं। यह पूर्णतः परिवार की सोच और स्थानीय प्रचलन पर निर्भर करता है।

*05. प्रश्न: मृत्यु के बाद 13 दिनों तक क्यों मंदिर नहीं जाते?

*उत्तर:इस अवधि को "अशौच" या "सूतक" कहा जाता है। इसके पीछे दो मुख्य कारण माने जाते हैं। पहला, आध्यात्मिक: यह समय मृतक की आत्मा की यात्रा और परिवार के शोक के लिए पूर्णतः समर्पित होता है। दूसरा, व्यावहारिक: पुराने समय में संक्रामक बीमारियों से बचाव के लिए परिवार को एकांत में रहने की सलाह दी जाती थी। मंदिर एक सार्वजनिक और पवित्र स्थान है, इसलिए अशुद्धि या शोक की अवस्था में जाना उचित नहीं माना गया।

"ब्लॉग के कुछ अनसुलझे पहलू" 

*हिंदू अंतिम संस्कार विधि व्यापक और गहन है, फिर भी कई पहलू ऐसे हैं जो स्थान, जाति, परिवार और समय के अनुसार बदलते रहते हैं, जिससे भ्रम की स्थिति बनती है।

*01. महिलाओं की भूमिका: यह सबसे बड़ा अनसुलझा पहलू है। कुछ परंपराओं में महिलाएं श्मशान नहीं जा सकतीं, तो कुछ में जा सकती हैं। कुछ क्षेत्रों में विधवा स्त्री को चिता पर बैठने की प्रथा थी (जो अब अप्रचलित है), जबकि दूसरे क्षेत्रों में ऐसा नहीं था। आधुनिक समय में पुत्रियों द्वारा मुखाग्नि देने के मामले बढ़ रहे हैं, लेकिन यह अभी भी एक बहस का विषय है।

*02. अस्थि विसर्जन का स्थान और समय: गंगा में विसर्जन को श्रेष्ठ माना जाता है, लेकिन क्या अन्य नदियां या समुद्र भी उतने ही पवित्र हैं? कुछ का मानना है कि अस्थियां तुरंत विसर्जित कर देनी चाहिए, तो कुछ इसे 13 दिन बाद तक रोककर रखते हैं। कोई एक सार्वभौमिक नियम नहीं है।

*03. बच्चों, साधुओं और आत्महत्या के मामले: छोटे बच्चों या सन्यासियों का दाह संस्कार अलग तरीके से किया जाता है (कई बार दफनाया जाता है)। आत्महत्या जैसी अकाल मृत्यु के संस्कारों में भी भिन्नताएं हैं। इन विशेष परिस्थितियों में क्या करें, यह अक्सर स्थानीय पंडित या परंपरा पर निर्भर करता है।

*04. वामावर्त परिक्रमा की संख्या: जहां अधिकांश जगह तीन बार परिक्रमा का विधान है, वहीं कुछ क्षेत्रों में चार या सात बार परिक्रमा की प्रथा भी है। इसके पीछे के सटीक और एकमत मंत्र या कारण स्पष्ट नहीं हैं।

*इन अनसुलझे पहलुओं का समाधान अक्सर स्थानीय परंपरा, पारिवारिक रीति और किसी जानकार धर्माचार्य के मार्गदर्शन में निहित है।

"सामाजिक, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक जानकारी" 

*सनातन अंतिम संस्कार के संस्कार सिर्फ आस्था नहीं, बल्कि सामाजिक सहयोग, वैज्ञानिक समझ और आध्यात्मिक दर्शन का अनूठा समन्वय हैं।

*सामाजिक पहलू: ये संस्कार एक मजबूत सामाजिक सुरक्षा तंत्र का काम करते हैं। मृत्यु के समय पड़ोसी और रिश्तेदार स्वतः आगे आकर खाना बनाने, व्यवस्था संभालने और आर्थिक मदद करने लगते हैं। तेरहवीं का सामूहिक भोज टूटे हुए परिवार को फिर से समाज से जोड़ता है। मृतक की वस्तुओं के दान से सामाजिक पुनर्वितरण को बढ़ावा मिलता है।

*वैज्ञानिक पहलू: कई रीतियों के पीछे वैज्ञानिक कारण छिपे हैं। पैर की अंगुलियां बांधना रिगोर मॉर्टिस के कारण शव को स्थिर रखता है। शीघ्र दाह संस्कार संक्रमण फैलने के खतरे को कम करता है। अशौच की अवधि परिवार को संक्रमण या मानसिक आघात से उबरने का समय देती है। तुलसी में रोगाणुरोधी गुण होते हैं। नीम की लकड़ी भी कीटाणुनाशक होती है।

*आध्यात्मिक पहलू: ये सभी कर्म आत्मा की अमरता और पुनर्जन्म के सिद्धांत पर आधारित हैं। संस्कारों का उद्देश्य शरीर को पंचतत्वों में विसर्जित करके आत्मा को इस बंधन से मुक्त करना है। पिंड दान नए सूक्ष्म शरीर के निर्माण में, मुखाग्नि पितृ ऋण से मुक्ति में और सपिंडीकरण पितरों में सम्मिलित होने में सहायक माने जाते हैं। यह पूरी प्रक्रिया मोक्ष की ओर एक यात्रा है।

"डिस्क्लेमर" 

*इस ब्लॉग में प्रस्तुत सभी जानकारी हिंदू धर्मशास्त्रों, सामान्य प्रचलित परंपराओं, लोक मान्यताओं और सार्वजनिक ज्ञान पर आधारित है। यह केवल जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है।

*01. विविधता का ध्यान: हिंदू धर्म अत्यंत विविधतापूर्ण है। संस्कारों, मंत्रों और रीतियों में क्षेत्र, जाति, सम्प्रदाय और परिवार के अनुसार भारी भिन्नता पाई जाती है। इस ब्लॉग में दी गई जानकारी सार्वभौमिक या एकमात्र सही विधि नहीं है।

*02. विशेषज्ञ परामर्श: अंतिम संस्कार एक गंभीर और संवेदनशील विषय है। व्यावहारिक कर्मकांड करते समय किसी योग्य पुरोहित (पंडित जी), परिवार के बुजुर्गों या स्थानीय धार्मिक विशेषज्ञ का मार्गदर्शन अवश्य लें। उनकी सलाह को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

*03. कानूनी बाध्यताएं: आजकल अंतिम संस्कार से संबंधित स्थानीय नगर निगम, श्मशान घाट और पर्यावरण संबंधी नियम भी लागू होते हैं (जैसे- बिजली/गैस चूल्हे की उपलब्धता, शवयात्रा के नियम)। इन कानूनी पहलुओं की जानकारी संबंधित अधिकारियों से प्राप्त करें।

*04. मानसिक स्वास्थ्य: मृत्यु और शोक एक कठिन भावनात्मक अनुभव है। यदि आप या आपका कोई परिजन इससे अत्यधिक व्यथित है, तो मनोवैज्ञानिक परामर्श लेने में संकोच न करें। धार्मिक संस्कारों के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

*05. लेखक की सीमा: ब्लॉग लेखक कोई धर्मगुरु, शास्त्रीय विद्वान या पुरोहित नहीं है। यह सामग्री सामान्य शोध पर आधारित है। किसी भी संदेह की स्थिति में प्रामाणिक धार्मिक ग्रंथों और विशेषज्ञों की शरण लें।

*निष्कर्षतः, यह ब्लॉग आपको एक संरचित जानकारी और समझ प्रदान करने का प्रयास है, न कि एक कठोर नियम पुस्तिका। अपने विवेक, परंपरा और विशेषज्ञ सलाह का उपयोग करते हुए ही इन संस्कारों को पूर्ण करें।


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