="मौनी अमावस्या 2026 (18 जनवरी) की संपूर्ण जानकारी। जानें शुभ मुहूर्त, मौन व्रत का महत्व, पितरों के लिए तर्पण विधि, दान का महत्व और पितृ दोष खत्म करने के अचूक उपाय।">
मौनी अमावस्या 2026: पितरों को प्रसन्न करने और आत्मिक शांति पाने का संपूर्ण मार्गदर्शन
सनातन धर्म में अमावस्या का दिन पितरों (पूर्वजों) को समर्पित माना जाता है, और माघ मास में आने वाली इस अमावस्या को 'मौनी अमावस्या' कहा जाता है। यह दिन न केवल पितृ कर्म के लिए ही नहीं बल्कि आत्मिक उन्नति और मौन साधना के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। 'मौनी' शब्द 'मौन' से बना है, जिसका अर्थ है सभी प्रकार के वाचिक और मानसिक कोलाहल से मुक्त होकर आत्मचिंतन में लीन रहना। मान्यता है कि इस दिन पवित्र नदियों, विशेष रूप से गंगा में स्नान करने से सारे पाप धुल जाते हैं और मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति के मार्ग प्रशस्त होते हैं। यह वह पावन अवसर है जब हम अपने पितरों को याद करते हैं, उन्हें तर्पण देकर प्रसन्न करते हैं और अपने मन को शांत कर आध्यात्मिक ऊर्जा अर्जित करते हैं। इस लेख में हम मौनी अमावस्या 2026 से जुड़ी सभी महत्वपूर्ण बातों—तिथि, मुहूर्त, करणीय-अकरणीय कर्म, उपाय और आहार संबंधी नियमों पर विस्तार से प्रकाश डालेंगे।
नीचे दिए गए विषयों के संबंध में विस्तार से जानकारी प्राप्त करें रंजीत के ब्लॉग पर
*मौनी अमावस्या 2026 – पितृ दोष निवारण का श्रेष्ठ दिन क्यों है
*मौनी अमावस्या के दिन पितरों के लिए क्या करना चाहिए?
*मौनी अमावस्या 2026 में कितनी तारीख को है? शुभ मुहूर्त और कैसा रहेगा दिन
*मौनी अमावस्या के दिन मौन रहना जरूरी है।
*पितृ दोष खत्म करने के लिए क्या उपाय करें?
*मौनी अमावस्या के दिन क्या करें और क्या न करें?
*मौनी अमावस्या दिन क्या खाएं और क्या ना खाएं
*अमावस्या दोष के घरेलू उपाय
*अमावस्या के दिन कौन सा टोटका करना चाहिए?
*मौनी अमावस्या के दिन पितरों को खुश कैसे करें?
*मौनी अमावस्या से संबंधित प्रश्न और उत्तर
*मौनी अमावस्या के वैज्ञानिक, सामाजिक और आध्यात्मिक पहलू जानें
📅 "मौनी अमावस्या 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त और दिन का महत्व"
*सन 2026 में मौनी अमावस्या 18 जनवरी, रविवार के दिन मनाई जाएगी। हिंदू पंचांग के अनुसार, अमावस्या तिथि का प्रारंभ 18 जनवरी की रात्रि 12:03 बजे से होगा और इसका समापन 19 जनवरी की रात्रि 01:21 बजे पर होगा। चूंकि उदया तिथि (सूर्योदय से लेकर अगले सूर्योदय तक) के अनुसार व्यावहारिक पूजा-कर्म 18 जनवरी को ही किए जाएंगे, इसलिए यही मुख्य तिथि मानी जाएगी।
"शुभ मुहूर्त":
*सूर्योदय: प्रातः 07:15 बजे
*सूर्यास्त: सायं 05:49 बजे
*ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 05:27 से 06:21 तक (ध्यान, जप और स्नान के लिए श्रेष्ठ)
*अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:10 से 12:53 तक (दान और महत्वपूर्ण पूजा के लिए शुभ)
*गोधूलि मुहूर्त: सायं 05:46 से 06:13 तक
*दिन का महत्व एवं फल: मौनी अमावस्या का दिन अत्यंत पुण्य फलदायी माना जाता है। इस दिन गंगा आदि पवित्र नदियों में स्नान करने का विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि इस स्नान से जाने-अनजाने में किए गए समस्त पापों का नाश होता है और पितृ दोष से मुक्ति मिलती है। यह दिन आत्मशुद्धि और मन को एकाग्र करने का अवसर प्रदान करता है। पितर इस दिन धरती पर आते हैं और अपने वंशजों द्वारा किए गए तर्पण से तृप्त होकर उन्हें आशीर्वाद प्रदान करते हैं। इस प्रकार, यह दिन पारलौकिक कल्याण और सांसारिक सुख-समृद्धि दोनों का द्वार खोलता है।
🙏 "मौनी अमावस्या के दिन पितरों के लिए क्या करना चाहिए"?
*मौनी अमावस्या के दिन पितरों की शांति और कृपा प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित कर्म अवश्य करने चाहिए:
*01. पवित्र स्नान एवं तर्पण: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर यथासंभव किसी पवित्र नदी (गंगा, यमुना, संगम आदि) में स्नान करें। यदि संभव न हो तो घर पर स्नान के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान कर सकते हैं। स्नान के बाद सूर्यदेव को जल अर्पित करें। इसके पश्चात काले तिल, जल और कुशा से पितरों का तर्पण करें। पिंडदान करना भी अत्यंत फलदायी माना गया है।
*02. दान-पुण्य का विशेष महत्व: इस दिन दान करने का विशेष फल प्राप्त होता है। गरीब एवं जरूरतमंद व्यक्तियों को अनाज (गेहूं, चावल), काले तिल, गुड़, फल, गर्म कपड़े, कंबल आदि का दान करें। किसी सुपात्र ब्राह्मण को भोजन कराएं अथवा भोजन सामग्री दान करें।
*03. पूजा-अर्चना एवं स्मरण: इस दिन पीपल के वृक्ष को जल चढ़ाएं क्योंकि पीपल में पितरों का वास माना जाता है। भगवान विष्णु, शिव और मां लक्ष्मी की पूजा करें। गाय की सेवा करना भी पुण्य कारी है; उन्हें हरा चारा या गुड़ खिलाएं। शाम के समय दक्षिण दिशा की ओर मुख करके घी का दीपक जलाएं और पितरों का स्मरण करें।
*04. विशेष उपाय: कच्चे दूध में जौ, तिल और चावल मिलाकर नदी में प्रवाहित करना चाहिए। गाय के गोबर के उपले जलाकर उस पर घी व गुड़ की आहुति दें और "ॐ पितृ देवतायै नम:" या "ॐ पितृ गणाय विद्मा हे..." मंत्र का उच्चारण करें।
🤫 "मौनी अमावस्या के दिन मौन रहना क्यों जरूरी है"?
*'मौनी अमावस्या' नाम स्वयं ही इसके महत्व को दर्शाता है। इस दिन मौन रहने की परंपरा केवल चुप रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक गहन आध्यात्मिक साधना है। मौन का अर्थ है मन, वचन और कर्म से होने वाली सभी प्रकार की उथल-पुथल को शांत करना।
*आत्मिक शांति एवं एकाग्रता: मौन रहने से मन की चंचलता कम होती है और विचारों की उथल-पुथल शांत हो जाती है। इससे भागवत चिंतन व ध्यान में एकाग्रता बढ़ती है और आत्मबल मजबूत होता है।
*ऊर्जा का संरक्षण: वाणी पर नियंत्रण से व्यर्थ की ऊर्जा व्यय नहीं होती। यह ऊर्जा संचित होकर सकारात्मक कार्यों एवं आध्यात्मिक उन्नति में सहायक बनती है।
*वाचिक पापों से मुक्ति: मौन रहने से झूठ, कटु वचन, चुगली, अनावश्यक वाद-विवाद जैसे वाचिक पापों से स्वतः ही बचाव हो जाता है, जिससे मन शुद्ध होता है।
*पूजा-कर्म का बढ़ा हुआ फल: मान्यता है कि मौन रहकर किए गए स्नान, दान, तर्पण आदि कर्मों का पुण्य फल कई गुना बढ़ जाता है क्योंकि पूरी शक्ति उसी एक कर्म में केंद्रित रहती है।
*इस प्रकार, मौन व्रत केवल एक नियम नहीं बल्कि आत्म-अवलोकन, आत्म-शुद्धि और ईश्वर से गहरे जुड़ाव का एक सशक्त माध्यम है।
⚠️ "मौनी अमावस्या के दिन क्या करें और क्या न करें"?
*क्या करें (Do's):
*01. ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र नदी या घर पर स्नान करें।
*02. पितरों का तर्पण व पिंडदान अवश्य करें।
*03. गरीबों एवं जरूरतमंदों को दान दें।
*04. पूरे दिन यथासंभव मौन व्रत का पालन करें।
*05. केवल सात्विक (शुद्ध शाकाहारी) भोजन ग्रहण करें।
*06. भगवान विष्णु, शिव या अपने इष्ट देवता की पूजा करें और मंत्र जाप करें।
*07. आत्मचिंतन एवं ध्यान में समय बिताएं।
"क्या न करें" (Don'ts):
*01. तामसिक आहार वर्जित: मांस, मछली, अंडा, प्याज, लहसुन और मदिरा (शराब) आदि का सेवन कतई न करें।
*02. कुछ कार्य वर्जित: इस दिन नाखून या बाल न काटें, मुंडन न करवाएं, नया कार्य आरंभ न करें और गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य न करें।
*03. विवाद से बचें: किसी से झगड़ा या कटु वचन न बोलें। घर में शांति बनाए रखें।
*04. भौतिक सुखों में न खोएं: यह दिन आध्यात्मिक साधना के लिए है, अतः टीवी, गाने आदि मनोरंजन के साधनों से दूर रहें।
*05. नकारात्मक विचार न लाएं: मन में क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष जैसे नकारात्मक विचार न आने दें।
🍽️ "मौनी अमावस्या के दिन क्या खाएं और क्या न खाएं"?
*क्या खाएं (सात्विक आहार):
*मौनी अमावस्या व्रत एवं साधना का दिन है, अतः भोजन हल्का, सुपाच्य और सात्विक होना चाहिए।
*फलाहार: विभिन्न प्रकार के ताजे फल, मेवे।
*दुग्ध उत्पाद: दूध, दही, घी, मक्खन।
*अनाज: सादा भात (चावल), दालें।
*मिठाई: घर पर बनी हलवे जैसी सादी मिठाई (बिना प्याज-लहसुन के)।
*सब्जियां: हरी पत्तेदार सब्जियां (लौकी, पालक आदि), कुछ लोग कंद-मूल (आलू, शकरकंद) भी ग्रहण करते हैं। मूल रूप से भोजन ताजा, घर का बना और सादगीपूर्ण हो।
"क्या न खाएं" (वर्जित आहार):
*मांसाहार: सभी प्रकार का मांस, मछली, अंडा आदि वर्जित हैं।
*मदिरा: शराब सहित किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थ का सेवन न करें।
*तामसिक सब्जियां: प्याज, लहसुन का प्रयोग न करें।
*बासी या अशुद्ध भोजन: बासी भोजन या बाजार का बना हुआ भोजन न खाएं।
*अधिक मसालेदार भोजन: अधिक तेल-मसाले वाला, भारी भोजन न करें।
🔮 "पितृ दोष खत्म करने के उपाय"
*पितृ दोष से मुक्ति पाने के लिए मौनी अमावस्या एक श्रेष्ठ अवसर है। सबसे पहले पवित्र नदी में स्नान कर काले तिल, जल और कुशा से पितरों का तर्पण करें। पिंडदान करना अति फलदायी है।
*पीपल के वृक्ष की पूजा करें क्योंकि इसमें पितरों का वास माना जाता है। सूर्यास्त के बाद पीपल को जल चढ़ाएं और उसके नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं। गाय, कुत्ते, कौए और चींटियों को भोजन कराएं, क्योंकि इन्हें पितरों का प्रतीक माना जाता है।
*चावल के आटे से बने पांच पिंडों को लाल कपड़े में लपेटकर नदी में प्रवाहित करें। काले तिल और गेहूं/चावल को कपड़े में बांधकर किसी गरीब को दान दें। नियमित रूप से गीता का पाठ करना और ब्राह्मण भोज कराना भी पितृ दोष शांति में सहायक होता है। इन सभी उपायों को श्रद्धा और विश्वास के साथ करने से पितृ प्रसन्न होते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।
✨ "अमावस्या दोष के घरेलू उपाय एवं टोटके"
*अमावस्या के दिन कुछ सरल घरेलू उपाय करके नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सकता है:
*पीपल वृक्ष का टोटका: अमावस्या की रात को पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं और 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप करें। दीपक जलाने के बाद बिना पीछे मुड़े घर लौट आएं।
*दान का महत्व: किसी भी अमावस्या पर काले तिल, लोहा, नमक, गुड़ या अनाज का दान करने से दोषों में कमी आती है।
*गाय की सेवा: गाय को हरा चारा खिलाने और जल पिलाने से पितर प्रसन्न होते हैं।
*जलपात्र उपाय: रात्रि में चांदी या तांबे के पात्र में जल भरकर पूजा स्थल पर रखें। अगले दिन इस जल को घर में छिड़कने से सुख-शांति आती है।
*शिव अभिषेक: जल में काले तिल मिलाकर शिवलिंग का अभिषेक करें।
*मछलियों को भोजन: आटे में हल्दी मिलाकर बनी गोलियां नदी में मछलियों को खिलाने से राहु-केतु व शनि के अशुभ प्रभाव कम होते हैं।
🙏 "पितरों को खुश कैसे करें"?
*पितरों को प्रसन्न करने का सबसे सरल उपाय है सच्ची श्रद्धा एवं भक्ति के साथ उनका स्मरण करना। उनके नाम से दान-पुण्य करें, पवित्र नदी में तिलांजलि दें और गरीबों की सहायता करें। शाम के समय दक्षिण दिशा में दीपक जलाकर पितरों की विदाई करें, इससे वे प्रसन्न होते हैं। अपने जीवन में सत्य और धर्म के मार्ग पर चलकर भी आप उन्हें गौरवान्वित कर सकते हैं।
*नोट: यह सारी जानकारी धार्मिक ग्रंथों, पंचांग और मान्यताओं पर आधारित है। इन उपायों को अपनाने से पहले अपनी श्रद्धा एवं विवेक का प्रयोग करें। विशेष परिस्थितियों में किसी ज्ञानी ब्राह्मण या ज्योतिषाचार्य से परामर्श लेना उचित रहता है।
*मुझे आशा है कि यह संपूर्ण और विस्तृत ब्लॉग लेख अब आपकी अपेक्षाओं के अनुरूप है। यदि आपको किसी विशेष बिंदु पर और अधिक जानकारी चाहिए, तो मुझे अवश्य बताएं।
"मौनी अमावस्या और कल्पवास में क्या है संबंध"
*मौनी अमावस्या के दौरान गंगा किनारे कल्पवास करने का बहुत गहरा विधान और महत्व है। वास्तव में, मौनी अमावस्या पूरे 'माघ मास' (Magh Month) के दौरान चलने वाले कल्पवास का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव मानी जाती है।
"कल्पवास विधान और परंपराओं के संबंध में विस्तार से जानकारी दी गई है"
*81. कल्पवास की अवधि और मौनी अमावस्या
*कल्पवास मुख्य रूप से पौष पूर्णिमा से शुरू होकर माघ पूर्णिमा तक (पूरे एक महीने) चलता है। मौनी अमावस्या इस एक महीने की साधना के ठीक बीच में आती है।
*अमृत स्नान: माना जाता है कि मौनी अमावस्या पर गंगा का जल अमृत के समान हो जाता है। कल्पवासियों के लिए यह दिन अपनी साधना को शिखर पर ले जाने का होता है।
*02. मौनी अमावस्या पर विशेष 'मौन' का नियम
*यद्यपि कल्पवासी पूरे महीने सात्विक जीवन जीते हैं, लेकिन मौनी अमावस्या के दिन 'मौन व्रत' का विशेष विधान है:
*इस दिन कल्पवासी सुबह के स्नान से लेकर पूरे दिन बिना बोले ईश्वर का ध्यान करते हैं।
*यह अभ्यास मन को नियंत्रित करने और वाणी की ऊर्जा को बचाने के लिए किया जाता है।
*03. कल्पवास के मुख्य नियम (विधान)
*अगर कोई गंगा किनारे कल्पवास करता है, तो उसे इन कठोर नियमों का पालन करना होता है:
*एक समय भोजन: पूरे दिन में केवल एक बार सात्विक भोजन (फलाहार या सादा अन्न) करना।
त्रिकाल स्नान: दिन में तीन बार गंगा स्नान का विधान है (मुख्य रूप से ब्रह्म मुहूर्त में)।
*भूमि शयन: विलासिता का त्याग कर ज़मीन पर सोना (पुआल या चटाई पर)।
*हवन और दान: प्रतिदिन जप-तप करना और मौनी अमावस्या जैसे विशेष दिनों पर तिल, गुड़ और ऊनी कपड़ों का दान करना।
*04. प्रयागराज का महत्व
*वैसे तो कल्पवास किसी भी पवित्र नदी के किनारे किया जा सकता है, लेकिन प्रयागराज (संगम तट) पर कल्पवास करने का सबसे बड़ा महत्व बताया गया है। यहां माघ मेले के दौरान लाखों श्रद्धालु तंबू (tent) गाड़कर पूरे महीने कल्पवास करते हैं।
*औनिष्कर्ष: मौनी अमावस्या कल्पवास का अभिन्न हिस्सा है। जो लोग पूरा महीना नहीं रुक पाते, वे कम से कम मौनी अमावस्या पर एक दिन का 'सांकेतिक कल्पवास' और मौन व्रत रखकर पुण्य लाभ लेते हैं।
❓ "मौनी अमावस्या से संबंधित प्रश्न और उत्तर" (FAQ)
*01. मौनी अमावस्या 2026 में कब है और क्यों महत्वपूर्ण है?
*मौनी अमावस्या 2026 में 18 जनवरी, रविवार को मनाई जाएगी। इस दिन मकर राशि में सूर्य और चंद्रमा की स्थिति इसे विशेष बनाती है। यह दिन पितरों को समर्पित है और माना जाता है कि इस दिन पवित्र नदी में स्नान व दान से पापों से मुक्ति मिलती है तथा पितृ दोष शांत होते हैं।
*02. मौनी अमावस्या पर 'मौन' रहने का क्या महत्व है?
*'मौनी'शब्द मौन से बना है। इस दिन मौन रहना एक आध्यात्मिक साधना मानी गई है जो मन की चंचलता को शांत कर आत्मिक शांति व एकाग्रता प्रदान करती है। मान्यता है कि मौन रहकर किए गए कर्मों का पुण्य फल कई गुना बढ़ जाता है।
*03. इस दिन कौन-से मुख्य कर्म करने चाहिए?
*पवित्र स्नान: ब्रह्म मुहूर्त (सुबह लगभग 05:27 से 06:21 बजे) में गंगा आदि पवित्र नदियों में स्नान करें। संभव न हो तो स्नान के जल में गंगाजल मिलाएं।
*तर्पण व पिंडदान: काले तिल व जल से पितरों का तर्पण करना चाहिए। पिंडदान को भी अति फलदायी माना गया है।
*दान: तिल, अनाज, गुड़, गर्म वस्त्र आदि का दान अत्यंत शुभ है।
*पूजा: भगवान विष्णु और शिव की पूजा का विधान है। पीपल के वृक्ष को जल चढ़ाना भी फलदायी है।
*04. क्या कोई विशेष योग बन रहा है?
*जी हां, वर्ष 2026 की मौनी अमावस्या पर शिववास योग और सर्वार्थ सिद्धि योग जैसे दुर्लभ मंगलकारी योग बन रहे हैं, जो इस दिन को और भी विशेष बना रहे हैं।
*05. महाकुंभ में मौनी अमावस्या का क्या महत्व है?
*महाकुंभ केदौरान मौनी अमावस्या का दिन "शाही स्नान" के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन प्रयाग (इलाहाबाद) के संगम तट पर अन्य कोटि तीर्थों का समागम होता है, जिससे यहां स्नान का फल अतुलनीय हो जाता है। मान्यता है कि इस एक स्नान का पुण्य हजारों अश्वमेध यज्ञ के बराबर होता है।
*क्या न करें: मांस-मदिरा का सेवन न करें, झगड़े-विवाद से बचें, नाखून या बाल न काटें, तामसिक भोजन वर्जित है।
🔬 "मौनी अमावस्या के वैज्ञानिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक पहलू"
*आध्यात्मिक पहलू: मौनी अमावस्या आत्मशुद्धि और ईश्वर के प्रति समर्पण का पर्व है। यह मनुष्य को बाहरी कोलाहल से हटाकर आत्ममंथन और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्ति की ओर प्रेरित करता है। मौन रहने को मन का मनका फेरकर ईश्वर का स्मरण करने जैसी उच्च साधना माना गया है।
*सामाजिक पहलू: यह पर्व सामाजिक एकता और परोपकार की भावना को मजबूत करता है। दान की परंपरा समाज के जरूरतमंद वर्ग तक संसाधन पहुंचाने का एक सामूहिक माध्यम बनती है। महाकुंभ जैसे आयोजनों में यह भावना विशाल स्तर पर दिखाई देती है, जहां करोड़ों लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ आते हैं।
*वैज्ञानिक दृष्टिकोण: मौन रहने (मौन व्रत) की प्रथा का मनोवैज्ञानिक लाभ है। यह मानसिक तनाव को कम करके चिंतनशक्ति व एकाग्रता को बढ़ाता है। पवित्र नदियों में सामूहिक स्नान की परंपरा, ऐतिहासिक रूप से, विभिन्न ऋतुओं में शारीरिक शुद्धि व स्वास्थ्य से भी जुड़ी रही है। इस प्रकार, यह परंपरा आध्यात्मिक लाभ के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी सार्थक है।
⚠️ "मौनी अमावस्या से संबंधित डिस्क्लेमर" (अस्वीकरण)
*सामान्य सूचना: इस ब्लॉग में मौनी अमावस्या के बारे में दी गई सभी जानकारी पारंपरिक मान्यताओं, धार्मिक ग्रंथों, पंचांग गणना और लोक विश्वासों पर आधारित है। यह जानकारी केवल शैक्षिक और सांस्कृतिक जागरूकता के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है।
*कोई अंतिम सत्य नहीं: इस लेख में उल्लिखित तिथियां, मुहूर्त, कर्मकांड, उपाय एवं फलित ज्योतिष संबंधी बातें सामान्य जानकारी का हिस्सा हैं। इन्हें किसी भी रूप में अंतिम सत्य, वैज्ञानिक तथ्य या निश्चित दावा नहीं माना जाना चाहिए।
*विवेक का प्रयोग करें: पाठकों से विनम्र अनुरोध है कि किसी भी आध्यात्मिक या धार्मिक कर्म को अपनाने से पहले स्वयं का विवेक, समझ और व्यक्तिगत श्रद्धा का प्रयोग अवश्य करें। विशेष परिस्थितियों में किसी योग्य विद्वान या अपने पारिवारिक परंपरानुसार जानकार व्यक्ति से परामर्श लेना उचित रहेगा।
*अंधविश्वास के विरुद्ध: यह लेख किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा देने का समर्थन नहीं करता। आध्यात्मिक प्रथाएं व्यक्तिगत आस्था का विषय हैं, इन्हें सामाजिक कल्याण, आत्म-अनुशासन और आंतरिक शांति की दृष्टि से देखना उचित है।