"जानें चातुर्मास का गहरा रहस्य! क्यों सोते हैं भगवान विष्णु शेषनाग पर? क्या है योग निद्रा? शेषनाग के अवतार और विष्णु-नारायण में अंतर। पढ़ें पूरी जानकारी, प्रश्नोत्तर और अनसुलझे पहलू"
रंजीत के ब्लॉक पर पड़े विस्तार से इन विषयों के संबंध में। चतुर्मास, भगवान विष्णु, शेषनाग, योग निद्रा *चातुर्मास का रहस्य, विष्णु क्यों सोते हैं, देवशयनी एकादशी, देवोत्थान एकादशी, शेषनाग के अवतार, विष्णु और नारायण में अंतर। चार महीने का निद्रा काल, शेषनाग पर विष्णु, पौराणिक कथा, चातुर्मास में क्या नहीं करना चाहिए, बलराम शेषनाग अवतार, लक्ष्मण शेषनाग अंश
"भगवान विष्णु, चातुर्मास और शेषनाग: एक गहन विवेचना"
*सनातन धर्म ग्रंथ एवं लोक मान्यताओं में भगवान विष्णु के चार महीने (चातुर्मास) के शयन की अवधारणा एक गूढ़ रहस्य है, जो केवल एक पौराणिक कथा न होकर ब्रह्मांडीय चक्र, प्रकृति के नियम और आध्यात्मिक जीवन का प्रतीक है। इसे समझने के लिए हमें इससे जुड़े विभिन्न पहलुओं जैसे चातुर्मास का रहस्य, शेषनाग पर शयन और शेषनाग के स्वरूप पर गहन दृष्टि डालनी होगी। साथ ही, विष्णु एवं नारायण के अंतर को समझना भी प्रासंगिक होगा।
*इस ब्लॉग में, हम उस पौराणिक रहस्य के सूत्र खोलेंगे, जो चातुर्मास के नाम से जाना जाता है। हम जानेंगे भगवान विष्णु के शयन के खगोलीय और दार्शनिक रहस्य, समझेंगे शेषनाग के फनों पर टिके इस ब्रह्मांडीय विश्राम का अर्थ, और खोजेंगे वो अनसुलझे प्रश्न जो आज भी शोधकर्ताओं को उलझाए रखते हैं। यह यात्रा है, सिर्फ एक कथा से आगे बढ़कर, उस गहन आध्यात्मिक सत्य तक पहुंचने की, जो प्रकृति के चक्र और हमारे आंतरिक जीवन से गहराई से जुड़ा है।
"चातुर्मास का रहस्य"
*चातुर्मास, जिसका शाब्दिक अर्थ है "चार महीने", सनातन पंचांग के अनुसार आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी (देव प्रबोधिनी एकादशी) तक की अवधि है। यह समय आमतौर पर जुलाई-अगस्त से नवंबर तक पड़ता है। मान्यता है कि इस दौरान भगवान विष्णु योग निद्रा (सृजनात्मक विश्राम की अवस्था) में लीन हो जाते हैं। यह कोई साधारण नींद नहीं, बल्कि एक सृष्टि-पालनकर्ता का विश्राम-काल है, जिसके पीछे गहन दार्शनिक एवं व्यावहारिक आधार हैं।
*01. खगोलीय एवं प्राकृतिक आधार: चातुर्मास वर्षा ऋतु और शरद ऋतु के आरंभ का काल है। प्राचीन भारत एक कृषि प्रधान समाज था। इस अवधि में खेतों में फसलें पक रही होती हैं, नदियां उफान पर होती हैं और यात्रा तथा युद्ध कठिन हो जाते हैं। प्रकृति स्वयं एक सृजनात्मक विश्राम में होती है – बीज अंकुरित हो चुके होते हैं और फसल के पकने की प्रतीक्षा होती है। इसलिए, यह समय बाहरी गतिविधियों को सीमित कर आंतरिक साधना, स्वाध्याय और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए समर्पित था। भगवान विष्णु का शयन इस ब्रह्मांडीय विराम का प्रतीकात्मक निरूपण है।
*02. पौराणिक कथा एवं दार्शनिक अर्थ: पुराणों के अनुसार, दैत्यों ने देवताओं पर अत्याचार बढ़ा दिए। देवताओं की प्रार्थना पर, माता लक्ष्मी ने उन्हें आश्वासन दिया कि वह भगवान विष्णु को चार महीने के लिए सुला देंगी, ताकि दैत्य समझें कि विष्णु के जागरण पर ही उनकी शक्ति निर्भर है। इस अवधि में दैत्य उन्मत्त हो उठे, किंतु जब विष्णु जागे तो उन्होंने दैत्यों का वध किया। इस कथा का दार्शनिक अर्थ यह है कि जब तक जगत का पालनहार (विष्णु-तत्त्व या दैवीय नियम) सक्रिय है, तब तक अधर्म पर नियंत्रण रहता है। उनके विश्राम काल में अधर्म का उदय होता है, जिसे अंततः नष्ट किया जाता है। यह सृष्टि में धर्म एवं अधर्म के चक्रीय संतुलन को दर्शाता है।
*03. आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व: चातुर्मास साधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। चूंकि विष्णु शयन में हैं, माना जाता है कि इस अवधि में पृथ्वी पर दैवीय ऊर्जा का प्रवाह विशेष रूप से उपलब्ध है।
*व्रत एवं उपवास: कई लोग चातुर्मास में विशेष व्रत रखते हैं, जैसे सोमवार, शुक्रवार व्रत, एकादशी व्रत या संपूर्ण चातुर्मास में मसालों आदि का त्याग।
*तीर्थाटन एवं वनवास: प्राचीन काल में साधु-संत यात्रा रोककर एक स्थान पर रहकर (चातुर्मास) ज्ञानचर्चा करते थे।
*पर्वों का आगमन: इसी अवधि में श्रावण मास, कृष्ण जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, नवरात्रि और दीपावली जैसे महत्वपूर्ण त्योहार आते हैं। यह सभी आंतरिक शुद्धि, भक्ति और नवीन आरंभ के प्रतीक हैं।
*प्रकृति संरक्षण: यात्रा एवं विवाह आदि शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं, जिसका एक कारण प्रकृति के इस संवेदनशील चरण (वर्षा, कीटों का प्रकोप) में मानवीय हस्तक्षेप को कम करना भी था।
*अतः, चातुर्मास का रहस्य केवल एक देवता के सोने की कहानी नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव जीवन के बीच सामंजस्य, आंतरिक साधना का महत्व और ब्रह्मांडीय नियमों की गहरी समझ में निहित है। यह समय बाहर से भीतर की ओर मुड़ने, तपस्या करने और नए सृजन के लिए स्वयं को तैयार करने का है।
*भगवान विष्णु शेषनाग पर क्यों सोते हैं?
*भगवान विष्णु जिस शय्या पर विश्राम करते हैं, वह कोई साधारण शैय्या नहीं, बल्कि सृष्टि के आधार, शेषनाग का स्वरूप है। यह दृश्य केवल एक विश्राम मुद्रा नहीं, बल्कि एक गहन प्रतीकात्मक दर्शन है।
*01. शेषनाग: सृष्टि का आधार एवं संहारक: 'शेष' का अर्थ है 'शेष रहने वाला'। पुराणों के अनुसार, जब ब्रह्मांड का प्रलय होता है, तब भी शेषनाग बचे रहते हैं और अगली सृष्टि के लिए आधार बनते हैं। वे समस्त सृष्टि को अपने फणों पर धारण करते हैं। विष्णु का उन पर शयन यह दर्शाता है कि परमात्मा (विष्णु) सृष्टि के मूल आधार (शेष) पर ही विराजमान है। वह आधार ही उसका शयनकक्ष है।
*02. विश्राम एवं सजगता का प्रतीक: शेषनाग के हजार फण हैं, जो एक छत्र की तरह विष्णु को ढके रहते हैं। यह दर्शाता है कि भगवान विष्णु का विश्राम भी पूर्णतः सजग और रक्षक है। शेषनाग का नाम अनंत भी है, जो भगवान की अनंतता का प्रतीक है। अतः, विष्णु अनंत (शेष) पर शयन करके यह संकेत देते हैं कि वह स्वयं अनंत हैं और अनंत आधार पर विश्राम कर रहे हैं।
*03. सत्व गुण एवं समन्वय का प्रतीक: शेषनाग नागों के राजा हैं, जो प्रायः रजो गुण (सक्रियता, कभी-कभी विनाशकारी ऊर्जा) से जुड़े माने जाते हैं। किंतु शेषनाग पूर्णतः सात्विक हैं। विष्णु, जो सत्व गुण के अधिष्ठाता हैं, का उन पर शयन यह दिखलाता है कि दैवीय शक्ति रजो एवं तमो गुणों को नियंत्रित कर उन पर आधारित होकर भी उनसे ऊपर है। यह विरोधी प्रतीत होने वाली शक्तियों (जैसे सृजन और संहार, विश्राम और सजगता) के बीच पूर्ण समन्वय एवं संतुलन को दर्शाता है।
*04. भक्ति भाव का प्रतीक: शेषनाग भगवान विष्णु के परम भक्त हैं। उनका एक रूप लक्ष्मण के रूप में भी अवतरित हुआ, जो राम के अनुज एवं सेवक थे। विष्णु का अपने परम भक्त पर शयन करना भक्त और भगवान के बीच के अद्वैत संबंध को दर्शाता है। भक्त ही भगवान का आधार बन जाता है।
*संक्षेप में, विष्णु का शेषनाग पर शयन एक शक्तिशाली प्रतीक है जो यह बताता है कि परम सत्ता सृष्टि के मूल आधार पर विराजमान है, वह हर समय सजग रक्षक है, वह विरोधी शक्तियों में संतुलन स्थापित करती है और वह अपने भक्तों पर पूर्णतः निर्भर (प्रेम के अर्थ में) है।
"शेषनाग के कितने अवतार हो चुके हैं"?
*सनातन धर्मग्रंथों में शेषनाग के कई अवतारों का उल्लेख मिलता है, जो मुख्यतः भगवान विष्णु के अवतारों की सहायता या उनके साथ अवतरित होने के लिए हुए हैं। एक प्रमुख मान्यता के अनुसार, शेषनाग के सात अवतार हुए हैं:
*01. सनत्कुमार: ब्रह्मा के मानस पुत्र, ज्ञान के प्रतीक।
*02. नारद: देवर्षि नारद, भगवान के परम भक्त और त्रिलोक संचारी।
*03. वराह कल्प में श्वेतवराह: भगवान विष्णु के वराह अवतार के सहयोगी।
*04. सप्तऋषियों में एक: विभिन्न मंत्रों के द्रष्टा ऋषि।
*05. शंखासुर के भाई लंबोदर: एक असुर जिसने बाद में भक्ति की राह अपनाई।
*06. बलराम: श्रीकृष्ण के अग्रज। इन्हें शेषनाग का साक्षात अवतार माना जाता है। जब उनका देहावसान हुआ, तो उनके मुख से एक विशाल सर्प (शेषनाग) निकला था।
*07. लक्ष्मण: रामायण में भगवान राम के अनुज। इन्हें शेषनाग का अंशावतार माना जाता है। कहा जाता है कि लक्ष्मण ने अपने शरीर का त्याग करने के बाद शेषनाग के रूप में वापस प्रकट हुए।
*इन अवतारों के अतिरिक्त, एक आठवां अवतार पतंजलि ऋषि का भी माना जाता है, जो योग सूत्र के प्रणेता हैं और शेषनाग के अंश से प्रकट हुए थे।
*ये सभी अवतार धर्म की स्थापना, ज्ञान के प्रसार और भगवान विष्णु के अवतारों की सेवा एवं सहायता के लिए हुए। यह श्रृंखला शेषनाग की भूमिका को सिर्फ एक शय्या के रूप में नहीं, बल्कि एक सक्रिय सहयोगी, ज्ञानदाता और स्वयं एक शक्तिशाली देवत्व के रूप में प्रस्तुत करती है।
"विष्णु और नारायण में क्या अंतर है"?
*विष्णु और नारायण अक्सर पर्यायवाची शब्दों की तरह प्रयुक्त होते हैं, किंतु सूक्ष्म दार्शनिक स्तर पर एक अंतर है:
*विष्णु मुख्यतः पालनकर्ता के रूप में जाने जाते हैं। वह त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) के एक सदस्य हैं, जिनका कार्य सृष्टि का पालन-पोषण एवं संरक्षण करना है। 'विष्णु' शब्द का अर्थ है 'व्याप्त होने वाला'। यह उनके सर्वव्यापक स्वरूप को दर्शाता है।
*नारायण एक विस्तृत एवं अधिक मूलभूत अवधारणा है। इसका अर्थ है "जल में निवास करने वाला" ('नार' = जल, 'अयन' = निवास)। यहां 'जल' प्रलय के बाद की आद्य स्थिति (प्रकृति) का प्रतीक है। नारायण वह परम पुरुष हैं जो प्रलय के बाद भी, सृष्टि से पहले, क्षीरसागर (दुग्ध सागर) में शेषनाग पर शयन करते हैं। वह समस्त सृष्टि के मूल कारण एवं आधार हैं।
*सरल शब्दों में: सभी नारायण, विष्णु हैं; लेकिन सभी विष्णु, नारायण नहीं कहे जा सकते (यह एक दार्शनिक विभेद है)। विष्णु नारायण के ही पालनकर्ता रूप हैं। नारायण की अवधारणा अधिक मौलिक एवं समष्टिगत है, जबकि विष्णु का स्वरूप विशिष्ट कार्य (पालन) के साथ जुड़ा है। व्यवहार में, दोनों नाम एक ही परम सत्ता को संदर्भित करते हैं।
"विष्णु का चातुर्मास: जब भगवान सोते हैं, तब धरती जागती है"!
*कल्पना कीजिए, ब्रह्मांड के पालनहार, जिनकी एक पलक झपकने से सृष्टि अस्त-व्यस्त हो जाती है, वे स्वयं चार लंबे महीनों के लिए गहरी नींद में सो जाएं! यह कोई साधारण निद्रा नहीं, बल्कि "योग निद्रा" है। आषाढ़ से कार्तिक तक का यह पावन काल "चातुर्मास" कहलाता है, जब भगवान विष्णु शेषनाग के फनों से बने विश्राम सिंहासन पर सो जाते हैं।
*लेकिन क्या यह सचमुच नींद है? या कोई गूढ़ रहस्य छुपा है इस परंपरा के पीछे? क्यों पड़ता है यह विश्राम? और सबसे बड़ा सवाल – जब स्वयं प्रभु विश्राम में हों, तो कौन संभालता है ब्रह्मांड की बागडोर? क्या यह समय अराजकता का है या आत्म साधना का स्वर्णिम अवसर?
"ब्लॉग से संबंधित प्रश्नोत्तर"
*01. चातुर्मास में कौन-कौन से कार्य वर्जित माने जाते हैं और क्यों?
चातुर्मास में शुभ कार्यों को वर्जित मानने के पीछे प्रमुख कारण प्रकृति चक्र और आध्यात्मिक ध्यान है। इस दौरान वर्षा ऋतु होती है, जिसमें यात्रा कठिन होती है, कीटाणु तेजी से फैलते हैं। इसलिए विवाह, मुंडन, शुभ कार्य, गृहप्रवेश, लंबी यात्रा आदि टाल दिए जाते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से, यह समय बाहरी गतिविधियों को कम कर आंतरिक साधना (जप, तप, स्वाध्याय) में लगाने का है। यह मान्यता है कि इस अवधि में पृथ्वी पर नकारात्मक ऊर्जाएं सक्रिय रहती हैं, इसलिए सावधानी बरतना आवश्यक है।
*02. क्या चातुर्मास में सभी देवता सो जाते हैं?
नहीं,केवल भगवान विष्णु को योग निद्रा में लीन माना जाता है। अन्य देवता सक्रिय रहते हैं। वास्तव में, चातुर्मास में शिव, गणेश और देवी के कई महत्वपूर्ण पर्व (जैसे श्रावण सोमवार, गणेश चतुर्थी, नवरात्रि) आते हैं। इसका संकेत यह है कि जब पालनकर्ता (विष्णु) विश्राम में होते हैं, तब सृष्टि और संहार की शक्तियां (शिव और शक्ति) सक्रिय भूमिका निभाती हैं, जिससे ब्रह्मांडीय संतुलन बना रहता है।
*03. भगवान विष्णु के सोने पर दुनिया का पालन कौन करता है?
यह एक गहन दार्शनिक प्रश्न है। माना जाता है कि विष्णु का "सोना" एक प्रतीक है। वे योग निद्रा में होते हैं, यानी शरीर से विश्राम में, किंतु चेतना से पूर्णतः सजग। उनकी शक्तियां (जैसे लक्ष्मी, देवी) और उनके अंश (जैसे ब्रह्मा, अन्य देवता) सृष्टि का संचालन करते हैं। एक अन्य मत यह है कि यह समय जीवों को अपने कर्म के अनुसार फल भोगने और आत्मनिर्भर बनने का अवसर देता है।
*04. शेषनाग के बिना क्या विष्णु सो नहीं सकते?
शेषनाग केवल एक शैय्या नहीं हैं, बल्कि सृष्टि के आधार और विष्णु के भक्त का प्रतीक हैं। विष्णु का उन पर शयन यह दर्शाता है कि परमात्मा अपने भक्तों पर आधारित है और सृष्टि के मूल तत्व (जिसका प्रतीक शेषनाग है) पर ही विराजमान है। यह एक अद्वैत संबंध है। प्रतीकात्मक रूप से, शेषनाग के बिना विष्णु का यह विश्राम-दृश्य पूरा नहीं होता, क्योंकि यह समग्र दार्शनिक विचार का एक अनिवार्य हिस्सा है।
*05. चातुर्मास के बाद देवउठनी एकादशी का क्या महत्व है?
कार्तिक शुक्ल एकादशी को "देवोत्थान एकादशी" या "देव प्रबोधिनी एकादशी" कहते हैं। इस दिन भगवान विष्णु अपनी चार महीने की योग निद्रा से जागते हैं। यह दिन बहुत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन से सभी मांगलिक कार्य फिर से शुरू हो जाते हैं। यह जागरण नई ऊर्जा, नई आशा और धर्म की पुनर्स्थापना का प्रतीक है। इसी दिन से सनातनी शादियों का सीज़न भी शुरू हो जाता है।
*06. क्या आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से चातुर्मास की अवधारणा को समझा जा सकता है?
हां,एक स्तर पर इसे प्रकृति के चक्र के रूप में देखा जा सकता है। चातुर्मास वर्षा और शरद ऋतु को कवर करता है, जब प्रकृति में नमी अधिक होती है, दिन छोटे होते हैं। यह समय कृषि चक्र में विश्राम और नई फसल की प्रतीक्षा का भी है। मनोवैज्ञानिक रूप से, यह अवधि बाहरी गतिविधियों को कम कर आत्ममंथन के लिए अनुकूल है। इस प्रकार, यह परंपरा प्राचीन भारतीय जीवनशैली में प्रकृति और मानव जीवन के बीच सामंजस्य का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
"ब्लॉग के अनसुलझे पहलू"
*चातुर्मास और विष्णु के शयन की अवधारणा, हालांकि गहन दार्शनिक आधार रखती है, कई ऐसे प्रश्न छोड़ जाती है जिन पर विद्वानों में मतभेद हैं और जो अनुसंधान के लिए खुले क्षेत्र हैं।
*01. खगोलीय सटीकता का प्रश्न: चातुर्मास की अवधि भारतीय पंचांग के अनुसार निश्चित है, लेकिन क्या इसका कोई विशिष्ट खगोलीय संरेखण या नक्षत्रों की स्थिति से सीधा संबंध है? जैसे शीत ऋतु में भी तो दिन छोटे होते हैं, फिर केवल वर्षा काल को ही विशेष महत्व क्यों? क्या यह केवल भारतीय मानसून पर आधारित एक स्थानीय परंपरा का विस्तार था, जिसे बाद में ब्रह्मांडीय महत्व दे दिया गया?
*02. विभिन्न सम्प्रदायों की भिन्न मान्यताएं: सभी सनातनी सम्प्रदाय चातुर्मास को एक जैसी तीव्रता से नहीं मानते। कुछ शैव परंपराओं में इसकी उतनी प्रमुखता नहीं है। दक्षिण भारत की कुछ परंपराओं में इसे "दक्षिणायन" से जोड़कर देवताओं के निद्रा काल के रूप में देखा जाता है, जबकि उत्तर भारत में यह सीधे विष्णु से जुड़ा है। इन मतभेदों के मूल में क्या कारण हैं?
*03. ऐतिहासिक विकास का अनिश्चित कालखंड: चातुर्मास की अवधारणा कब और कैसे विकसित हुई, इसका स्पष्ट ऐतिहासिक विवरण उपलब्ध नहीं है। क्या यह वैदिक काल से है या पौराणिक काल में इसका स्वरूप निखरा? साधु-संतों के "चातुर्मास व्रत" (एक स्थान पर रहकर साधना) का विष्णु के शयन की कथा से क्या पहले संबंध स्थापित हुआ? कौन सा कारण प्राथमिक था?
*04. 'योग निद्रा' की वैज्ञानिक/चेतनात्मक व्याख्या: "योग निद्रा" को आधुनिक संदर्भ में कैसे परिभाषित किया जा सकता है? क्या इसे ब्रह्मांडीय चेतना की एक विशिष्ट अवस्था माना जा सकता है? क्या यह कोई प्रतीकात्मक तरीका है उस सिद्धांत को समझाने का, जिसमें सृष्टि का नियामक समय-समय पर स्वयं को 'रिसेट' या नई ऊर्जा से भरता है? इसकी कोई वैज्ञानिक अनुरूपता खोजना चुनौतीपूर्ण है।
*05. शेषनाग की प्रकृति पर प्रश्न: शेषनाग को अनंत और सृष्टि का आधार माना जाता है। लेकिन क्या वे स्वयं एक स्वतंत्र देवता हैं या विष्णु की ही एक शक्ति का रूप हैं? कुछ पुराणों में उन्हें विष्णु के अंश से उत्पन्न बताया गया है तो कुछ में स्वतंत्र सत्ता। यह द्वैत और अद्वैत के दार्शनिक प्रश्न को खोलता है।
*इन अनसुलझे पहलुओं का अस्तित्व इस परंपरा की समृद्धि और गहराई को ही दर्शाता है। ये प्रश्न आज के जिज्ञासु पाठकों और शोधकर्ताओं के लिए एक आमंत्रण हैं कि वे केवल मान्यताओं को स्वीकार करने के बजाय, उनके मूल में छिपे तर्क और रहस्य को खोजने का प्रयास करें।
"डिस्क्लेमर"
*यह ब्लॉग पोस्ट हिंदू धर्म ग्रंथों, पौराणिक कथाओं, विभिन्न विद्वानों की व्याख्याओं और लोक मान्यताओं पर आधारित सामग्री का एक संकलन है। इसे सूचनात्मक और शैक्षणिक उद्देश्य से तैयार किया गया है।
*01. धार्मिक मान्यताएं: इस ब्लॉग में वर्णित सभी कथाएं, प्रतीक और व्याख्याएं विभिन्न हिंदू परंपराओं और दार्शनिक दृष्टिकोणों से ली गई हैं। इनकी व्याख्या अलग-अलग संप्रदायों में भिन्न हो सकती है। पाठकों से अनुरोध है कि अपनी निजी आस्था और विश्वास के अनुसार विवेक का प्रयोग करें।
*02. ऐतिहासिक व वैज्ञानिक दावे: यह लेख किसी भी प्रकार के ऐतिहासिक या वैज्ञानिक तथ्य का दावा नहीं करता। पौराणिक आख्यानों की व्याख्या प्रतीकात्मक और दार्शनिक स्तर पर की गई है। खगोलीय या प्राकृतिक कारणों के संदर्भ केवल समझाने के लिए दिए गए संभावित दृष्टिकोण हैं।
*03. विशेषज्ञ परामर्श: धर्म, दर्शन या इतिहास के गहन अध्ययन के लिए, मूल ग्रंथों और प्रमाणिक विद्वानों के कार्यों का अध्ययन करने की सलाह दी जाती है। यह ब्लॉग किसी भी प्रकार के विशेषज्ञ परामर्श का विकल्प नहीं है।
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