"Garuda Purana गरुड़ पुराण के अनुसार दाह संस्कार: एक पूर्ण मार्गदर्शिका | Antim Sanskar Vidhi"
byRanjeet Singh-
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"गरुड़ पुराण के अनुसार दाह संस्कार की सम्पूर्ण विधि, महत्व और रहस्य जानें। पिंड दान, अस्थि संचयन, पंचक और अकस्मात मृत्यु से जुड़े सभी नियम इस ब्लॉग में विस्तार से समझाए गए हैं"
"गरुड़ पुराण, दाह संस्कार, अंतिम संस्कार, पिंड दान, अस्थि विसर्जन, श्राद्ध, पितृ कर्म, हिंदू धर्म, मृत्यु के बाद, पंचक, शमशान घाट, Antim Sanskar, Garud Puran">यह पाठक को क्लिक करने के लिए प्रेरित करता है और मुख्य विषयवस्तु को कवर करता है"
"गरुड़ पुराण के अनुसार दाह संस्कार: मृत्यु के बाद की यात्रा का पवित्र विधान"
*मृत्यु जीवन का अटल सत्य है, और हिंदू धर्मशास्त्रों में इसे एक द्वार माना गया है – एक लोक से दूसरे लोक में प्रवेश का। इस यात्रा को शांतिपूर्ण और सार्थक बनाने के लिए हमारे ऋषि-मुनियों ने दाह संस्कार की एक सुविचारित और अत्यंत वैज्ञानिक विधि का प्रतिपादन किया है।
*गरुड़ पुराण इस विषय पर प्रमुख और प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है, जो मृत्यु के बाद की गतिविधियों, आत्मा की यात्रा और जीवित परिजनों के कर्तव्यों का सूक्ष्मता से वर्णन करता है। यह ब्लॉग गरुड़ पुराण में वर्णित दाह संस्कार की उसी गूढ़ विधि को सरल और रोचक ढंग से आपके सामने प्रस्तुत करेगा।
"दाह संस्कार का महत्व: क्यों है यह अनिवार्य"?<
गरुड़ पुराण स्पष्ट करता है कि विधि-विधान से किया गया दाह संस्कार न सिर्फ़ मृतक की आत्मा को मुक्ति दिलाता है, बल्कि पीछे छूटे परिजनों को पुश्तैनी कर्ज़ यानी पितृ ऋण से भी मुक्त करता है। मान्यता है कि पुत्र या पौत्र द्वारा किया गया अंतिम संस्कार मृतक को एक नया शरीर प्रदान करने में सहायक होता है, ताकि वह अपनी अगली यात्रा पर सफलतापूर्वक अग्रसर हो सके।
"दाह संस्कार की विस्तृत विधि: एक चरणबद्ध मार्गदर्शिका"
*01. शमशान यात्रा और अंतिम स्नान<
>शव को शमशान घाट ले जाते समय आधे रास्ते पर एक विश्राम लिया जाता है। यहां मृतक को एक स्वच्छ स्थान पर रखकर उसके शरीर को जल से स्नान कराया जाता है। इसके पश्चात चारों दिशाओं में पूजा की जाती है। शमशान पहुंचने पर मृतक को भूमि पर इस प्रकार लिटाया जाता है कि उसका सिर उत्तर दिशा की ओर रहे। उत्तर दिशा को ध्रुव दिशा माना जाता है जो आत्मा की शांति और दिव्य लोकों में गमन से जुड़ी हुई है।
*02. चिता स्थल की तैयारी और अग्नि की स्थापना
चिता बनाने के लिए उस स्थान का चयन किया जाता है जहां पहले किसी का दाह संस्कार न हुआ हो। उस स्थान को अच्छी तरह साफ़ करके गोबर से लीपा जाता है। गोबर में रोगाणुनाशक गुण होते हैं, यह एक वैज्ञानिक पहलू है। इसके बाद वहां थोड़ी मिट्टी बटोरकर एक छोटी सी मूर्ति बनाई जाती है, उस पर जल छिड़ककर पूजा की जाती है और फिर उसी स्थान पर अग्नि की स्थापना की जाती है।<
>अग्नि की पूजा रंगीन चावलों (अक्षत) से करते हुए एक विशेष मंत्र का उच्चारण किया जाता है: <
>"लोमान, इस संसार से यह प्राणी चला गया है, इस आत्मा को स्वर्ग प्रदान करें।"</strong> यह मंत्र अग्नि देवता से मृतक की आत्मा को स्वर्ग लोक तक पहुंचाने की प्रार्थना है।<
*03. चिता निर्माण और 'लाइ' के दाने
>चिता का निर्माण लकड़ियों की विशेष व्यवस्था से किया जाता है। मृतक को चिता पर शयन कराया जाता है। इसके बाद एक महत्वपूर्ण क्रिया की जाती है – मृतक के हाथों में और चिता पर 'लाइ' (एक प्रकार का अनाज या तिल) के दाने रखे जाते हैं। मान्यता है कि ये पांच दाने मृतक को मिल जाने से उसकी आत्मा की भूख-प्यास शांत हो जाती है और वह जीवित परिवार को परेशान नहीं करती। यह एक प्रकार का मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक सुरक्षा उपाय है।
*04. वर्जित अग्नि और शूद्रों का सहयोग<
>गरुड़ पुराण कुछ विशेष स्रोतों से लाई गई अग्नि के प्रयोग को वर्जित ठहराता है। इनमें चंडाल के घर की अग्नि, किसी पापी के घर की अग्नि या पहले से जल चुकी चिता की अग्नि शामिल है। साथ ही, यह भी कहा गया है कि यदि शमशान में शूद्रों द्वारा पहुंचाई गई वस्तुओं का उपयोग किया जाए तो संपूर्ण कर्म निष्फल हो जाता है। (यहां यह समझना आवश्यक है कि प्राचीन संदर्भ में 'शूद्र' शब्द का प्रयोग समाज के एक विशिष्ट वर्ग के लिए था, आधुनिक संदर्भ में इसकी व्याख्या भिन्न हो सकती है)।<
>छह पिंड दान: आत्मा के लिए पथ्य का निर्माण<
<दाह संस्कार की प्रक्रिया में छह पिंडों का दान सबसे महत्वपूर्ण कर्मों में से एक है। प्रत्येक पिंड आत्मा की यात्रा के एक चरण में उसके लिए एक सूक्ष्म शरीर (लिंग शरीर) के निर्माण में सहायक होता है। यदि किसी कारणवश ये पिंड न दिए जाएं, तो शास्त्र कहते हैं कि शव राक्षसों के भक्षण का योग्य हो जाता है, यानी आत्मा को मुक्ति नहीं मिल पाती।<
*पहला पिंड (मुख स्थान पर): यह पिंड मृतक के मुख की रक्षा करता है और उसे नए जीवन में वाणी की शक्ति प्रदान करता है।<
*दूसरा पिंड (द्वार पर): घर या शमशान के द्वार पर दिया जाने वाला यह पिंड, आत्मा को भौतिक संसार के बंधनों से मुक्त होने और दिव्य लोकों के द्वार में प्रवेश करने में सहायक होता है।
>तीसरा पिंड (चौराहे पर): चौराहा चार दिशाओं का प्रतीक है। यह पिंड आत्मा को मार्ग भ्रम से बचाता है और उसे सही दिशा दिखाता है।
>चौथा पिंड (विश्राम स्थान पर):</strong> यात्रा के दौरान विश्राम के लिए दिया जाने वाला यह पिंड आत्मा को नई शक्ति और ऊर्जा प्रदान करता है।
>पांचवां पिंड (चिता पर):</strong> चिता पर अर्पित यह पिंड शरीर के त्याग के समय होने वाली पीड़ा को कम करने और नए सूक्ष्म शरीर के निर्माण में मदद करता है।<
>छठा पिंड (अस्थि-संचयन के समय):</strong> यह अंतिम पिंड है जो अस्थियां एकत्रित करते समय दिया जाता है। यह आत्मा को पितृ लोक में स्थिर होने और अपने लिए प्राप्त होने वाले श्राद्ध को ग्रहण करने की क्षमता प्रदान करता है।
>चिता दहन और खोपड़ी भंग की महत्वपूर्ण क्रिया<
>जब चिता में मृतक का आधा शरीर जल जाए, तब एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार किया जाता है। पुत्र या कोई निकट संबंधी लकड़ी के डंडे से मृतक की खोपड़ी (शिर) को भंग करता है। इसका कारण यह बताया गया है कि ऐसा करने से मस्तिष्क में संचित प्राण वायु बाहर निकलती है और आत्मा को पितृ लोक में जाने का मार्ग मिलता है। इस समय तिल मिश्रित घी की आहुति दी जाती है। गरुड़ पुराण का एक रोचक निर्देश है कि इस समय पुत्र को 'भावुक' होकर, यानी जोर-जोर से रोना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि यह शोक व्यक्त करने का एक माध्यम है जो पुत्र के मन के भार को हल्का करता है और भविष्य में उसे प्रसन्न रहने का मार्ग प्रशस्त करता है।
>"शमशान से लौटना और प्रथम भोजन"
>चिता के पूर्णतः दहन हो जाने के बाद, सबसे पहले स्त्रियों को और उसके बाद पुरुषों को स्नान करना चाहिए। इसके बाद सभी को नीम के एक-एक पत्ते का सेवन करना चाहिए। नीम में एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं जो शमशान की वातावरणीय अशुद्धियों से बचाव करते हैं। घर लौटते समय स्त्रियों को आगे चलना चाहिए। घर पहुंचकर पुनः स्नान करने के बाद, पुत्र को सबसे पहले एक गाय को भोजन कराना चाहिए। इसके बाद स्वयं पत्ते की प्लेट पर भोजन ग्रहण करना चाहिए। ध्यान रहे, यह भोजन मृत्यु से पहले का बना हुआ नहीं, बल्कि नया बना हुआ होना चाहिए।
>अस्थि संचयन: चौथे दिन की महत्वपूर्ण रस्म<
>दाह संस्कार के बाद आने वाले चौथे दिन अस्थि संचयन की क्रिया की जाती है। यदि कोई अवरोध न हो तो इसे दूसरे या तीसरे दिन भी किया जा सकता है।
>शमशान पहुंचकर स्नान करें और एक गर्म दोशाला (चादर) लें।
>चिता की जगह पर देवी-देवताओं को नमस्कार करें और अनाज का दान करें।<
"यामायात्वा" मंत्र का उच्चारण करते हुए चिता के तीन चक्कर लगाएं।
दूध और फिर पानी के छींटे देकर चिता की राख से अस्थियां एकत्रित करे।
*इन अस्थियों को 'पलाश' के पत्तों पर रखकर दूध और पानी से छिड़काव करें और फिर एक मिट्टी के बर्तन में संग्रहित करें।
*अस्थियों को विसर्जित करने के लिए एक विशेष विधि अपनाई जाती है। एक तिकोने भू-भाग को गोबर से लीपकर, उत्तर दिशा की ओर मुख करके तीनों दिशाओं में 'लाइ' अर्पण की जाती है। अस्थि-कलश को 15 कदम उत्तर दिशा में ले जाकर एक गड्ढे में रखा जाता है। फिर इसे किसी पवित्र जलाशय, विशेष रूप से गंगा नदी के केंद्र में ले जाकर विसर्जित किया जाता है।<
"एक रोचक तथ्य":
*गरुड़ पुराण कहता है कि जिसकी अस्थियां 10 दिन के अंदर जल में डूब जाती हैं, उसकी आत्मा ब्रह्मलोक पहुंच जाती है और फिर लौटकर नहीं आती। जितने अधिक दिन तक अस्थियां तैरती रहती हैं, आत्मा उतने ही लंबे समय तक स्वर्गलोक में निवास करती है।<
"पंचक काल: दाह संस्कार के लिए अशुभ समय"
*गरुड़ पुराण 'पंचक' नामक एक विशेष अवधि में दाह संस्कार करने से मना करता है। यह समय मास के प्रारम्भ में 'धनिष्ठा' नक्षत्र के आधे भाग से लेकर 'रेवती' नक्षत्र तक रहता है। मान्यता है कि इस काल में दाह संस्कार करने से घर में एक और मृत्यु होने का भय रहता है।<
*यदि किसी की मृत्यु पंचक काल में हो जाए, तो कुश के चार पुतले बनाकर उन्हें मंत्रों से अभिमंत्रित किया जाता है। इन पुतलों को शव के साथ रखकर ही दाह संस्कार किया जाता है। इससे पंचक का अशुभ प्रभाव समाप्त हो जाता है। पुत्रों को पंचक शांति का अनुष्ठान भी करवाना चाहिए।
"अकस्मात मृत्यु और शिशु मृत्यु के विशेष नियम"<
*गरुड़ पुराण जीवन के हर संभव पहलू को समेटता है, जिसमें दुखद परिस्थितियां भी शामिल हैं।
"अज्ञात स्थान पर मृत्यु":
यदि किसी की मृत्यु किसी अज्ञात स्थान पर हो और शरीर *न मिले, तो जिस दिन खबर मिले, उस दिन दर्भा घास की एक प्रतिमा बनाकर उसका दाह संस्कार किया जाता है। उसकी राख को गंगा में विसर्जित करके दस दिन की रस्में पूरी की जाती हैं।
"गर्भवती महिला की मृत्यु":
*यदि कोई महिला प्रसव के दौरान मर जाए, तो बच्चे को पेट से निकालकर अलग से भूमि में दफनाया जाता है और केवल महिला का ही दाह संस्कार किया जाता है।
"शिशू की मृत्यु":
*27 महीने तक के बच्चे की मृत्यु होने पर उसे भूमि में दफनाया जाता है, जलाया नहीं जाता। यदि मृत्यु गंगा तट पर हुई हो तो शिशु को गंगा में प्रवाहित किया जा सकता है। इससे बड़े बच्चों का दाह संस्कार किया जाता है और उनकी अस्थियां गंगा में विसर्जित की जाती हैं। शिशु की मृत्यु पर दूध का दान और बच्चे की मृत्यु पर खाने-पीने की वस्तुओं का दान करना चाहिए।<
" निष्कर्ष: एक यात्रा का अंत, दूसरी का आरंभ"
*गरुड़ पुराण में वर्णित दाह संस्कार की यह विस्तृत विधि केवल एक रीति-रिवाज नहीं है; यह मनुष्य को जीवन के सबसे बड़े सत्य – मृत्यु – से सामंजस्य स्थापित करना सिखाती है। यह मृतक की आत्मा की शांति के साथ-साथ जीवित परिजनों को मानसिक शक्ति और आगे बढ़ने का साहस प्रदान करती है। प्रत्येक क्रिया, प्रत्येक मंत्र और प्रत्येक पिंड का एक गहरा दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक आधार है। इन नियमों का पालन करके हम न सिर्फ़ अपने पितृ ऋण से उऋण होते हैं, बल्कि एक सनातन सत्य को स्वीकार करते हैं कि आत्मा अमर है और मृत्यु महज एक पड़ाव है, मंज़िल नहीं।
"डिस्क्लेमर" (Disclaimer)<
*यह ब्लॉग पोस्ट प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथ गरुड़ पुराण में वर्णित सूचनाओं पर आधारित है और इसे केवल शैक्षिक एवं जानकारी पूर्ण उद्देश्यों के लिए तैयार किया गया है। इस लेख में दी गई किसी भी जानकारी को धार्मिक या कानूनी सलाह के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।
*दाह संस्कार और संबंधित रीति-रिवाज समय, स्थान, परिवार की परंपराओं और व्यक्तिगत मान्यताओं के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और स्वच्छता के मानदंडों के अनुरूप कुछ प्रथाओं में परिवर्तन हो सकता है। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान या कर्मकांड को करने से पहले किसी योग्य पंडित, धर्मगुरु या विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें।
*लेखक और प्रकाशक इस जानकारी के उपयोग या दुरुपयोग से उत्पन्न होने वाले किसी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष परिणाम के लिए उत्तरदायी नहीं होंगे। पाठकों से अनुरोध है कि वे अपने विवेक का उपयोग करें और किसी भी नियम का पालन करने से पहले उसकी वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिकता सुनिश्चित कर लें।<