**मनुस्मृति में 'श्रुति' और 'वेद': ज्ञान-विज्ञान का सर्वोच्च स्रोत

📜  "मनुस्मृति के अनुसार 'वेद ही श्रुति' क्यों है? वैदिक और तांत्रिक श्रुति, मन्त्र-ब्राह्मण विभाग, 5 मुख्य ब्राह्मण ग्रन्थ और 12 प्रमुख उपनिषदों का विस्तृत ज्ञान प्राप्त करें"

Picture of a Vedic sage imparting knowledge of the Shruti, Vedas and Upanishads to his disciples

"वैदिक ऋषि द्वारा शिष्यों को श्रुति, वेद और उपनिषद के ज्ञान का उपदेश देते हुए तस्वीर" 

"मनुस्मृति, श्रुति के विभाग, वैदिक श्रुति, तांत्रिक श्रुति, तीन मुख्य तंत्र, वेद के विभाग, ब्राह्मण ग्रन्थ, 12 उपनिषद, सनातन धर्म ज्ञान, आरण्यक"

💡 "वैदिक ज्ञान का शिखर: मनुस्मृति में 'श्रुति' और 'वेद' का महत्व"

*भारतीय सनातन परंपरा में, 'श्रुति' शब्द केवल एक शब्द नहीं, बल्कि परम ज्ञान का उद्घोष है। यह वह दिव्य ध्वनि है जिसे सृष्टि के आदिकाल से ब्रह्मादी ऋषियों ने समाधि की गहन अवस्था में सुना (श्रवण किया)। इसी 'श्रवण' से इसका नाम 'श्रुति' पड़ा।

*जिस ज्ञान को ऋषियों ने आत्मसात किया और जगत के कल्याण के लिए प्रकट किया, वही हमारा वेद है। इस सत्य को मनुस्मृति में अत्यंत स्पष्टता से उद्घोषित किया गया है: 'श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयः' (श्रुति को वेद ही समझना चाहिए)। यह कथन वेद की सर्वोच्चता और अनादीता को स्थापित करता है। यह ब्लॉग आपको श्रुति के इन गूढ़ विभागों, वेदों की संरचना, और 12 मुख्य उपनिषदों के गहन दर्शन से परिचित कराएगा।

1. "मनुस्मृति में वेद की स्तुति क्यों"?

मनुस्मृति, जिसे मानव धर्मशास्त्र भी कहा जाता है, समाज, आचार-विचार और धर्म के नियमों का एक प्राचीन संग्रह है। इसमें वेद की स्तुति या सर्वोच्चता स्थापित करने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

अनादि और अपौरुषेयता: सनातन दर्शन में, वेद को किसी मनुष्य द्वारा रचित (पौरुषेय) नहीं माना जाता है, बल्कि यह ईश्वरीय (अपौरुषेय) ज्ञान है जो सृष्टि के आरंभ से है ('आदिसृष्टिमारभ्याद्यपर्यन्तं...')। मनुस्मृति इस शाश्वत सत्य को धर्म का मूल मानती है।

ज्ञान का अंतिम प्रामाणिक स्रोत: मनुस्मृति के लिए, धर्म (नैतिक कर्तव्य) की परिभाषा और ज्ञान का अंतिम प्रमाण वेद (श्रुति) ही है। अन्य सभी शास्त्र (स्मृति, पुराण, इतिहास) इसी पर आधारित हैं।

समाधीज ज्ञान: वेदकालीन महातपा सत्पुरुषों ने जिस ज्ञान को समाधि में प्राप्त किया, वह लौकिक बुद्धि से परे है। मनुस्मृति इस अतीन्द्रिय (Transcendental) ज्ञान को स्वीकार कर, इसे जगत के आध्यात्मिक अभ्युदय का एकमात्र साधन मानती है।

2. "श्रुति के दोनों विभागों का विस्तार से परिचय"

*यद्यपि वेद ही मुख्य श्रुति हैं, फिर भी व्यवहारिक रूप से श्रुति को दो व्यापक धाराओं में विभाजित किया गया है:

2.1. "वैदिक श्रुति" (मुख्य और प्राचीन)

*परिचय: यह चार वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद) और उनके मंत्र, ब्राह्मण, आरण्यक, और उपनिषद भागों को समाहित करता है।

*महत्व: यह यज्ञ, कर्मकांड, धर्म, दर्शन, और ब्रह्मज्ञान का आधार है। इसे निगम (Nigama) भी कहते हैं। स्वरूप: यह अनादि और परम प्रमाण माना जाता है।

2.2. "तान्त्रिक श्रुति" (आगम और उपासना प्रधान)

*परिचय: यह तन्त्र शास्त्रों की परंपरा है, जिसे आगम (Āgama) भी कहा जाता है। यह शिव-शक्ति (पुरुष-प्रकृति) संवाद के रूप में होता है।

*महत्व: इसका मुख्य फोकस उपासना, योग, कर्मकांड (पूजा-विधि), षट्कर्म (शांति, वशीकरण आदि), और मोक्ष के व्यावहारिक मार्गों पर है। यह मुख्य रूप से शाक्त, शैव, और वैष्णव परंपराओं में प्रचलित है।

*स्वरूप: तान्त्रिक श्रुति का ज्ञान भी गुरु-शिष्य परंपरा से श्रवण किया जाता है, इसलिए इसे गौण रूप से श्रुति कहा जाता है।

3. "तीन मुख्य तंत्रों का विस्तार से परिचय"

*तांत्रिक श्रुति में असंख्य तन्त्र हैं, लेकिन तीन को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना गया है।

3.1. महानिर्वाण-तन्त्र (Mahānirvāṇa-Tantra)

केन्द्र बिंदु: यह शक्ति उपासना और कलियुग के लिए आचार-व्यवहार पर केंद्रित है।

मुख्य दर्शन: इसमें ब्रह्म का स्वरूप (निष्फल ब्रह्म और सगुण ब्रह्म), धर्म, समाज सुधार, और गृहस्थ जीवन में मोक्ष प्राप्त करने के नियमों का विस्तृत वर्णन है। यह तन्त्र कौला चार के सिद्धांतों की भी व्याख्या करता है।

3.2. "नारदपाञ्चरात्र-तंत्र" (Nāradapañcarātra-Tantra)

*केन्द्र बिंदु: यह वैष्णव (भगवान विष्णु) परंपरा का आधारभूत तन्त्र है। इसे आगम साहित्य का एक प्रमुख भाग माना जाता है। मुख्य दर्शन: इसमें मूर्ति पूजा (अर्चाना), मंदिर निर्माण, अभिषेक की विधि, वैष्णव दीक्षा और पञ्चरात्र सिद्धांत (परम, व्यूह, विभव, अंतर्यामी, अर्चाना) का वर्णन है। यह भक्ति और सेवा के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करने पर जोर देता है।

3.3. "कुलार्णव-तन्त्र" (Kulārṇava-Tantra)

*केन्द्र बिंदु: यह कौल (कुल) मार्ग का एक महत्वपूर्ण और गूढ़ तन्त्र है, जो शक्ति पूजा से जुड़ा है।

*मुख्य दर्शन: इसमें गुरु-शिष्य परंपरा का महत्व, योग, चक्रों का ज्ञान, कुंडलिनी शक्ति, और पांच 'म' कार (मध्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा, मैथुन – जिन्हें प्रतीकात्मक और वास्तविक दोनों रूप से समझाया गया है) के रहस्यमय अनुष्ठानों का वर्णन है। यह तन्त्र आत्मा और ब्रह्म के एकत्व की ओर ले जाने वाले कठोर आध्यात्मिक अभ्यास पर बल देता है।

4. "वेद के दोनों विभागों का विस्तार से परिचय"

,*भारतीय परंपरा के अनुसार, 'वेदो हि मन्त्र ब्राह्मण भेदेन द्विविधः' अर्थात् वेद के मुख्य रूप से दो विभाग हैं:

4.1. "मन्त्र विभाग" (संहिता)

*परिचय: यह वेदों का मूल भाग है, जिसे संहिता भी कहते हैं। यह मुख्य रूप से स्तुति, प्रार्थना, आह्वान, और संकल्प से संबंधित पद्यात्मक रचनाओं का संग्रह है।

*महत्व:

*ऋग्वेद संहिता: देवताओं की स्तुति के मन्त्रों (ऋचाओं) का संग्रह।

*यजुर्वेद संहिता: यज्ञ कर्मकांड में प्रयुक्त होने वाले गद्यात्मक और पद्यात्मक मंत्र।

*सामवेद संहिता: संगीतबद्ध (गायन) मन्त्र, जो उद्गाता द्वारा यज्ञों में गाए जाते हैं।

*अथर्ववेद संहिता: रोग निवारण, आयुर्वेद, तंत्र-मंत्र, और लौकिक कल्याण से संबंधित मन्त्र।

4.2. "ब्राह्मण विभाग" (व्याख्या और दर्शन)

*परिचय: यह गद्यात्मक भाग है जो मन्त्र विभाग की व्याख्या, विनियोग (उपयोग) और यज्ञों की विधि का वर्णन करता है। इसमें आरण्यक और उपनिषद भी समाविष्ट हैं।

*तीन उप-विभाग:

*ब्राह्मण ग्रन्थ: मुख्य रूप से यज्ञों की विधि, इतिहास (इतिवृत्त), और मन्त्रों के अर्थ की विस्तृत व्याख्या। (जैसे ऐतरेय ब्राह्मण)

*आरण्यक: ये ब्राह्मण ग्रन्थ के वे भाग हैं जो वन (अरण्य) में रहकर रहस्यमय साधनाओं और दार्शनिक विचारों पर चिंतन करने के लिए थे। ये कर्मकांड (यज्ञ) से ज्ञानकांड (उपनिषद) की ओर संक्रमण का पुल हैं।

*उपनिषद: ये वेद के अंतिम भाग हैं, जिन्हें वेदान्त भी कहते हैं। ये ब्रह्म, आत्मा, मोक्ष, और सृष्टि के परम सत्य का गूढ़ दार्शनिक विवेचन करते हैं।

5. "पांच मुख्य ब्राह्मण ग्रन्थों का विस्तार से परिचय"

*ब्राह्मण ग्रन्थ वैदिक साहित्य के कर्मकांडीय हिस्से की व्याख्या करते हैं। 13 ज्ञात ब्राह्मणों में से पाँच सबसे अधिक प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण हैं:

5.1. "ऐतरेय ब्राह्मण" (Aitareya Brāhmaṇa)

*किस वेद से संबंधित: ऋग्वेद

*विषय-वस्तु: यह मुख्य रूप से सोम यज्ञ और अग्निष्टोम यज्ञ जैसे महत्वपूर्ण यज्ञों की विस्तृत प्रक्रियाओं का वर्णन करता है। इसमें राज्याभिषेक से संबंधित महत्वपूर्ण विवरण भी मिलते हैं, विशेष रूप से ऐतरेय आरण्यक के साथ जुड़ा हुआ है।

5.2. "तैत्तिरीय ब्राह्मण" (Taittirīya Brāhmaṇa)

*किस वेद से संबंधित: कृष्ण यजुर्वेद

*विषय-वस्तु: यह कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा का ब्राह्मण है। इसमें अश्वमेध यज्ञ, राजसूय यज्ञ और अन्य इष्टियों (विशेष अनुष्ठान) के विस्तृत विवरण शामिल हैं। इसमें प्रजापति और सृष्टि से संबंधित कई महत्वपूर्ण बख्यान भी हैं।

5.3. "तलवकार ब्राह्मण" (Talavakāra Brāhmaṇa)

*किस वेद से संबंधित: सामवेद

*विषय-वस्तु: इसे जैमिनीय ब्राह्मण के नाम से भी जाना जाता है। इसमें साम-गायन से संबंधित अनुष्ठानों का वर्णन है। इसका सबसे प्रसिद्ध भाग केन उपनिषद है, जो इसी ब्राह्मण का एक अंश है।

5.4. "शतपथ ब्राह्मण" (Śatapatha Brāhmaṇa)

*किस वेद से संबंधित: शुक्ल यजुर्वेद

*विषय-वस्तु: यह सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण ब्राह्मण ग्रन्थ माना जाता है, जिसमें सौ (100) अध्याय (पथ) हैं। यह सभी यज्ञों का सबसे विस्तृत वर्णन देता है, जिसमें दर्श पौर्णमास (अमावस्या और पूर्णिमा यज्ञ), अग्निहोत्र, सोम यज्ञ, और पुरुषमेध शामिल हैं। बृहदारण्यक उपनिषद इसी का अंतिम भाग है।

5.5. "ताण्डय ब्राह्मण" (Tāṇḍya Brāhmaṇa)

"किस वेद से संबंधित: सामवेद"

*विषय-वस्तु: इसे पञ्चविंश ब्राह्मण भी कहते हैं, क्योंकि इसमें पच्चीस (25) अध्याय हैं। यह सामवेद के उद्गाता द्वारा गाए जाने वाले गीतों के विनियोग और यज्ञों की विधि बताता है। इसमें व्रात्य स्तोम का विस्तृत वर्णन है, जो उन लोगों को वैदिक समाज में वापस लाने की विधि थी जो वैदिक अनुष्ठानों से दूर हो गए थे।

6. "उपनिषदों का महासागर" (108 में से 12 मुख्य)

*उपनिषद भारतीय दर्शन के शिखर हैं। 108 उपनिषदों में से, 12 उपनिषद सबसे प्राचीन और प्रामाणिक माने जाते हैं, जिन पर आदि शंकराचार्य ने भाष्य (कमेंटरी) लिखा था। इन्हें दशो पनिषद (प्रथम दस) और दो अन्य (श्वेताश्वतर, कौषीतकि) के रूप में देखा जाता है।

"क्रमांक उपनिषद का नाम संक्षिप्त सार" (मुख्य विषय)

*01 ईश (Īśa) कर्म करते हुए त्याग और ज्ञान से जीवन जीने का दर्शन। कर्मयोग का मूल मंत्र।

*02 केन (Kena) इन्द्रियों और मन को प्रेरित करने वाली परम शक्ति (ब्रह्म) का स्वरूप।

*03 कठ (Kaṭha) नचिकेता और यम का संवाद। आत्मा की अमरता, श्रेय और प्रेय का भेद।

*04 प्रश्न (Praśna) पिप्पलाद ऋषि और छह शिष्यों के छह मौलिक प्रश्नों का उत्तर: सृष्टि, प्राण, मन आदि।

*05 मुण्डक (Muṇḍaka) परा विद्या (ब्रह्मज्ञान) और अपरा विद्या (लौकिक ज्ञान) का भेद। सत्यमेव जयते का मूल।

*06 माण्डूक्य (Māṇḍūkya) सबसे छोटा उपनिषद। ओ३म् (AUM) की व्याख्या और चेतना की चार अवस्थाएँ (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय)।

*07 तैत्तिरीय (Taittirīya) शिक्षा, आनंद की मीमांसा, और पञ्चकोश (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनंदमय) सिद्धांत।

*08 ऐतरेय (Aitareya) सृष्टि की उत्पत्ति, ब्रह्माण्ड और जाग्रत आत्मा (प्रज्ञानं ब्रह्म) का वर्णन।

*09 छान्दोग्य (Chāndogya) ओ३म् का महत्व, उद्दालक और श्वेतकेतु का संवाद: 'तत् त्वम् असि' (वह तुम हो) का महावाक्य।

*10 बृहदारण्यक (Bṛhadāraṇyaka) सबसे बड़ा उपनिषद। याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी का संवाद। ब्रह्म की परिभाषा और आत्मज्ञान ही सबका सार।

*11 कौषीतकि (Kauṣītaki) प्राण और चेतना का संबंध, आत्मज्ञान का मार्ग, और जन्म-मृत्यु के चक्र का दार्शनिक विवेचन।

*12 श्वेताश्वतर (Śvetāśvatara) ईश्वर (एक सगुण परमात्मा) का महत्व, भक्ति, और योग के माध्यम से मोक्ष का मार्ग।

"12 मुख्य उपनिषदों का विस्तृत दार्शनिक विवेचन" (वेदान्त का सार)

*उपनिषद वैदिक ज्ञान का मुकुट मणि हैं, जिन्हें वेदान्त (वेद का अन्त या अंतिम ज्ञान) कहा जाता है। ये गहन दार्शनिक ग्रंथ हैं जो कर्मकांड से हटकर परम सत्य (ब्रह्म) और आत्मा (आत्मन) के स्वरूप पर चिंतन करते हैं। आदि शंकराचार्य ने जिन पर भाष्य लिखा, वे 12 उपनिषद निम्न प्रकार हैं:

7.1. "ईशोपनिषद" (Īśopaniṣad) – त्याग और कर्मयोग का समन्वय

*वेद: शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता।

*अध्याय/खण्ड: इसमें केवल 18 मन्त्र हैं, जो इसे सबसे छोटा (माण्डूक्य को छोड़कर) और सबसे महत्वपूर्ण उपनिषद बनाते हैं।

*केन्द्रीय दर्शन: यह उपनिषद दो विपरीत प्रतीत होने वाले मार्गों का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है: ज्ञान (त्याग) और कर्म (क्रिया)।

*ईशावास्यमिदं सर्वम्...: इसका पहला मन्त्र ही पूरे उपनिषद का सार है, जिसका अर्थ है "यह सब कुछ, जो इस गतिशील संसार में है, ईश्वर (ईश) से व्याप्त है।"

*त्यागपूर्वक भोग: यह सिखाता है कि जीवन में कर्म करते हुए भी, आसक्ति (Attachment) का त्याग करना चाहिए। संसार का उपभोग त्याग (Tyaga) की भावना से करना चाहिए।

*ज्ञान और अज्ञान: यह ज्ञान के दो रूप बताता है—जो अविद्या (कर्मकांड) और विद्या (परम ज्ञान) को जानता है, वह मृत्यु को पार कर अमरता प्राप्त करता है।

*प्रसिद्ध महावाक्य/सूक्ति: 'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा:' (उस त्यागपूर्वक [प्राप्त वस्तु] का उपभोग करो)।

7.2. "केनोपनिषद" (Kenopaniṣad) – जानने वाले को कौन जानता है

*वेद: सामवेद के तलवकार ब्राह्मण का भाग।

*केन्द्रीय दर्शन: इसका नाम इसके पहले शब्द 'केन' (किसके द्वारा) से पड़ा है। यह जानने वाले की शक्ति के स्रोत पर प्रश्न करता है।

*इन्द्रियों के पीछे की शक्ति: यह पूछता है कि आंख को कौन देखता है, मन को कौन प्रेरित करता है, और प्राणों को कौन चलाता है?

*ब्रह्म की अलौकिकता: उपनिषद उत्तर देता है कि इन सभी शक्तियों का प्रेरक ब्रह्म है। "वहां न आंखें पहुंचती हैं, न वाणी, और न मन।" 

*देवताओं की कथा: इसमें देवताओं (अग्नि, वायु) की कहानी है, जिन्हें अपने बल का अहंकार हो गया था। ब्रह्म ने यक्ष का रूप धारण करके उनका अहंकार भंग किया। यह दर्शाता है कि देवताओं की शक्ति भी ब्रह्म से ही उत्पन्न होती है।

7.3. "कठोपनिषद" (Kaṭhopaniṣad) – यम और नचिकेता का संवाद

*वेद: कृष्ण यजुर्वेद।

*केन्द्रीय दर्शन: यह अत्यंत प्रसिद्ध उपनिषद बालक नचिकेता और मृत्यु के देवता यमराज के बीच हुए संवाद के रूप में है।

*तीन वरदान: नचिकेता यमराज से तीन वरदान मांगता है, जिनमें तीसरा वरदान मृत्यु के रहस्य (आत्मा की अमरता) को जानने का होता है।

*श्रेय और प्रेय: यमराज श्रेय (कल्याणकारी/आध्यात्मिक मार्ग) और प्रेय (सुखदायी/सांसारिक मार्ग) के बीच का अंतर समझाते हैं, और विवेकशील व्यक्ति को श्रेय का मार्ग चुनने की सलाह देते हैं।

*आत्मा का स्वरूप: आत्मा अविनाशी, अजन्मा और अनादि है। इसे न मारा जा सकता है और न ही इसका जन्म होता है।

*रथ रूपक: यह शरीर को रथ, बुद्धि को सारथी, मन को लगाम, इन्द्रियों को घोड़े, और आत्मा को रथ का स्वामी मानकर योग और ध्यान के महत्व को समझाता है।

7.4. "प्रश्नोपनिषद" (Praśnopaniṣad) – छह ऋषियों के छह मौलिक प्रश्न

*वेद: अथर्ववेद।

*केन्द्रीय दर्शन: यह उपनिषद पिप्पलाद ऋषि और उनके छह शिष्यों (कबन्धिन, भार्गव, कौसल्य, सौर्यायणि, सत्यकाम, सुकेश) के बीच हुए प्रश्नोत्तर पर आधारित है।

*पहला प्रश्न (कबन्धिन): सृष्टि कैसे उत्पन्न हुई? उत्तर: प्रजापति ने राई (पदार्थ) और प्राण (ऊर्जा) के जोड़े से उत्पन्न किया।

*दूसरा प्रश्न (भार्गव): जगत का भरण-पोषण कौन करता है? उत्तर: प्राण ही मुख्य देवता है, जिसके आश्रय में सभी देवता और इंद्रियां रहती हैं।

*तीसरा प्रश्न (कौसल्य): प्राण की उत्पत्ति, शरीर में प्रवेश और बाहर निकलने का तरीका। उत्तर: प्राण आत्मा से उत्पन्न होता है और शरीर में प्रवेश करता है।

*चौथा प्रश्न (सौर्यायणि): स्वप्न, निद्रा और जाग्रत अवस्था में कौन सोता है और कौन जागता है? उत्तर: जब मन सोता है, तब प्राण ही जागता रहता है।

*पांचवां प्रश्न (सत्यकाम): ओ३म् की उपासना का क्या फल है? उत्तर: ओ३म् के विभिन्न अंगों (अ, उ, म) की उपासना ब्रह्म के विभिन्न लोकों तक ले जाती है।

*छठा प्रश्न (सुकेश): सोलह कलाओं वाला पुरुष कौन है? उत्तर: वह पुरुष आत्मा में ही निवास करता है।

*महत्व: यह सृष्टि विज्ञान और प्राण विद्या पर केंद्रित है।

7.5. "मुण्डकोपनिषद" (Muṇḍakopaniṣad) – परा और अपरा विद्या

*वेद: अथर्ववेद।

*केन्द्रीय दर्शन: यह उपनिषद शौनक और अंगिरा ऋषि के बीच हुए संवाद के रूप में है।

*विद्या के दो भेद: यह दो प्रकार की विद्याओं में अंतर करता है:

*अपरा विद्या: वेद, व्याकरण, ज्योतिष, कर्मकांड आदि लौकिक ज्ञान।

*परा विद्या: वह ज्ञान जिससे अविनाशी ब्रह्म को जाना जाता है।

*कर्मकांड की निंदा: यह स्पष्ट करता है कि अस्थायी यज्ञ (कर्मकांड) ही मोक्ष नहीं दिला सकते। ये केवल श्रेयस तक ले जाते हैं, मुक्ति तक नहीं।

*ब्रह्म की उपमा: ब्रह्म को स्वर्ण पुरुष (हिरण्मय पुरुष) और ज्ञान की प्राप्ति को धनुष-बाण के रूपक से समझाया गया है: ओ३म् धनुष है, आत्मा बाण है, और ब्रह्म लक्ष्य है।

*प्रसिद्ध महावाक्य/सूक्ति: 'सत्यमेव जयते' (सत्य की ही विजय होती है)।

7.6. "माण्डूक्योपनिषद" (Māṇḍūkyopaniṣad) – चेतना की चार अवस्थाएं 

*वेद: अथर्ववेद।

*अध्याय/खण्ड: केवल 12 गद्य मन्त्रों वाला यह सबसे छोटा उपनिषद है, लेकिन दार्शनिक रूप से सबसे गहरा माना जाता है।

*केन्द्रीय दर्शन: यह मुख्य रूप से ओ३म् (AUM) और चेतना की चार अवस्थाओं की व्याख्या करता है।

*ओ३म् की व्याख्या: यह बताता है कि ओ३म् ही आत्मा है और ब्रह्म भी है।

'अ' (A): जाग्रत अवस्था (विश्व) का प्रतीक।

'उ' (U): स्वप्न अवस्था (तैजस) का प्रतीक।

'म' (M): सुषुप्ति (गहरी नींद) अवस्था (प्राज्ञ) का प्रतीक।

*अमात्र: तुरीय अवस्था का प्रतीक।

*तुरीय अवस्था: यह चेतना की चौथी अवस्था है, जो तीनों अवस्थाओं से परे है। यह अशब्द, अचिंतनीय, और परम शांति की अवस्था है, जहां आत्मा (आत्मन) और परम ब्रह्म एक हो जाते हैं।

7.7. "तैत्तिरीयोपनिषद" (Taittirīya Upaniṣad) – आनंद की मीमांसा और पंचकोश

*वेद: कृष्ण यजुर्वेद।

"केन्द्रीय दर्शन: यह उपनिषद तीन भागों (वल्लियों) में विभाजित है: शिक्षा बल्ली, ब्रह्मानंद बल्ली, और भृगु बल्ली"।

*शिक्षा बल्ली: यह वैदिक अध्ययन की विधि, उच्चारण, और सत्य बोलने, धर्म पर चलने जैसे नैतिक मूल्यों का उपदेश देती है।

*ब्रह्मानंद बल्ली (आनंद मीमांसा): यह बताता है कि मनुष्य का आनंद ब्रह्म के आनंद का एक छोटा सा अंश है। ब्रह्म का आनंद अनंत है। यह पञ्च कोश सिद्धांत का वर्णन करता है:

*अन्नमय कोश (भौतिक शरीर)

*प्राणमय कोश (जीवन ऊर्जा)

*मनोमय कोश (मन)

*विज्ञानमय कोश (बुद्धि/ज्ञान)

"आनंदमय कोश" (परम आनंद) – यह ब्रह्म का निकटतम रूप है।

*भृगु वल्ली: वरुण और भृगु के संवाद में, भृगु अपने पिता वरुण से ब्रह्म को जानने का मार्ग पूछते हैं। वरुण उन्हें तप से अन्न से लेकर आनंद तक ब्रह्म को जानने के लिए कहते हैं।

7.8. "ऐतरेयोपनिषद" (Aitareya Upaniṣad) – सृष्टि और प्रज्ञानं ब्रह्म

*वेद: ऋग्वेद के ऐतरेय आरण्यक का भाग।

*केन्द्रीय दर्शन: यह उपनिषद मुख्य रूप से सृष्टि की उत्पत्ति और आत्मज्ञान पर केंद्रित है।

*सृष्टि उत्पत्ति: इसमें वर्णन है कि आत्मा (आत्मन) ही अकेला था, और उसने लोक (संसार) की रचना का संकल्प किया। उसने जल (आप), तेज (मर), पृथ्वी (मरीचि), और लोकपालों (देवताओं) की सृष्टि की।

*पुरुष का निर्माण: ईश्वर ने विभिन्न लोकों और देवताओं की रचना के बाद, उनके निवास के लिए पुरुष (मानव शरीर) का निर्माण किया।

*आत्मा का प्रवेश: जब सभी देवों को उनके कार्य सौंप दिए गए, तब परम आत्मा शरीर के सिर के द्वार (विदारण) से शरीर में प्रवेश करता है।

*प्रसिद्ध महा वाक्य/सूक्ति: 'प्रज्ञानं ब्रह्म' (चेतना ही ब्रह्म है)। यह चेतना (Consciousness) को परम सत्य के रूप में स्थापित करता है।

7.9. छान्दोग्योपनिषद" (Chāndogya Upaniṣad) – तत् त्वम् असि का महावाक्य

*वेद: सामवेद।

*केन्द्रीय दर्शन: यह अत्यंत विशाल और महत्वपूर्ण उपनिषद है, जो उपासना (ध्यान) और ज्ञान दोनों पर केंद्रित है।

*ओ३म् की उपासना: यह ओ३म् (उद्गीथ) की उपासना पर विस्तार से बात करता है।

*दहर विद्या: यह बताता है कि मनुष्य के हृदय के भीतर एक छोटा आकाश (दहर) है, जिसमें परम ब्रह्म निवास करता है।

*श्वेतकेतु संवाद: यह सबसे प्रसिद्ध भाग है, जहां उद्दालक ऋषि अपने पुत्र श्वेतकेतु को नौ दृष्टान्तों (जैसे, नमक का जल में घुलना, वट वृक्ष के बीज) से समझाते हैं कि तुम स्वयं ब्रह्म हो।

*प्रसिद्ध महावाक्य/सूक्ति: 'तत् त्वम् असि' (वह तुम हो)। यह अद्वैत (Non-duality) दर्शन का मूल स्तंभ है।

7.10. "बृहदारण्यक उपनिषद" (Bṛhadāraṇyaka Upaniṣad) – आत्मज्ञान ही सबका सार

*वेद: शुक्ल यजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण का भाग।

*केन्द्रीय दर्शन: यह सबसे बड़ा उपनिषद है (बृहद अर्थात् बड़ा)। यह याज्ञवल्क्य ऋषि के संवादों से भरा हुआ है।

*याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी संवाद: ऋषि याज्ञवल्क्य अपनी पत्नी मैत्रेयी को समझाते हैं कि संसार की सभी चीजें आत्मन के लिए प्रिय हैं, न कि स्वयं के लिए। पति, धन, और यहाँ तक कि देवता भी आत्म-ज्ञान के लिए प्रिय होते हैं। आत्मन को जानना ही सबका सार है।

*अश्वमेध की व्याख्या: इसमें अश्वमेध यज्ञ को दार्शनिक रूप से सृष्टि के रूप में समझाया गया है।

*नेति नेति: ब्रह्म को शब्दों द्वारा पूरी तरह से वर्णित नहीं किया जा सकता है। यह सभी सीमित विशेषणों से परे है। इसे 'नेति नेति' (यह नहीं, यह नहीं) के सूत्र से जाना जाता है।

7.11. "कौषीतकि उपनिषद" (Kauṣītaki Upaniṣad) – प्राण और चेतना

*वेद: ऋग्वेद।

*केन्द्रीय दर्शन: यह उपनिषद प्राण (जीवन शक्ति) और चेतना के संबंध पर केंद्रित है।

*पुनर्जन्म और देवयान/पितृयान: इसमें पुनर्जन्म के सिद्धांत और मृत्यु के बाद देवयान (मोक्ष का मार्ग) तथा पितृयान (पितृलोक का मार्ग) का विस्तृत वर्णन है।

*प्राण ही ब्रह्म: यह बताता है कि प्राण ही चेतन आत्मा और ब्रह्म है। जब तक शरीर में प्राण रहता है, तब तक चेतना (प्रज्ञा) रहती है।

*इन्द्र और प्रतर्दन संवाद: इसमें देवताओं के राजा इंद्र और प्रतर्दन के बीच संवाद है, जहां इंद्र आत्मज्ञान का उपदेश देते हुए कहते हैं कि प्राण ही सबसे बड़ा है और उसी की उपासना करनी चाहिए।

7.12. "श्वेताश्वतरोपनिषद" (Śvetāśvatara Upaniṣad) – ईश्वर, भक्ति और योग

*वेद: कृष्ण यजुर्वेद।

*केन्द्रीय दर्शन: यह उपनिषद अन्य उपनिषदों की तुलना में ईश्वर (एक सगुण परमात्मा), भक्ति, और योग के तत्वों पर अधिक जोर देता है, जिसके कारण यह शैव और विशिष्टाद्वैत परंपराओं में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

*ईश्वर की संकल्पना: यह रुद्र (शिव) को परमेश्वर के रूप में प्रस्तुत करता है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड का नियंत्रक और स्वामी है।

*योग का महत्व: यह तप और योग के अभ्यास द्वारा ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने की विधि का वर्णन करता है। यह योग के आसन, प्राणायाम, और ध्यान जैसे अंगों का उल्लेख करता है।

*माया और प्रकृति: इसमें वर्णन है कि प्रकृति (माया) ही जगत की मूल कारण है, लेकिन परमेश्वर (ईश्वर) ही इस माया का नियंत्रक है।

➡️ "निष्कर्ष": वेदान्त का शाश्वत संदेश

*ये 12 उपनिषद मिलकर भारतीय दर्शन की आत्मा का निर्माण करते हैं। वे एक स्वर में यह उद्घोष करते हैं कि परम सत्य (ब्रह्म) और व्यक्ति की आत्मा (आत्मन) अभिन्न हैं। यह ज्ञान न केवल धार्मिक है, बल्कि मनुष्य की चेतना और ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने के लिए सार्वभौमिक दर्शन भी है।

❓ "ब्लॉग के संबंध में प्रश्न और उत्तर" (Q&A)

*Q1. श्रुति और स्मृति में मुख्य अंतर क्या है?

*A1. श्रुति का अर्थ है 'सुना हुआ' (परम ज्ञान)। यह वेद को संदर्भित करता है, जिसे अपौरुषेय (मनुष्य द्वारा न रचित, शाश्वत) माना जाता है। स्मृति का अर्थ है 'याद किया हुआ'। यह मनुस्मृति, रामायण, महाभारत, पुराण जैसे ग्रंथों को संदर्भित करता है, जो ऋषियों द्वारा श्रुति के ज्ञान को याद करके मानव भाषा में लिखे गए हैं। श्रुति सर्वोच्च प्रमाण है, जबकि स्मृति श्रुति पर आधारित है।

*Q2. वेद के मन्त्र विभाग को संहिता क्यों कहते हैं?

*A2. 'संहिता' का शाब्दिक अर्थ है 'एकत्रित करना' या 'संग्रह'। वेद के मन्त्र विभाग को संहिता कहते हैं क्योंकि यह विभिन्न ऋचाओं, यजुषों, और सामों का एक व्यवस्थित, क्रमबद्ध संग्रह है जिसका उद्देश्य यज्ञों और अनुष्ठानों में उपयोग करना है।

*Q3. उपनिषदों को 'वेदान्त' क्यों कहा जाता है?

A3. 'वेदान्त' का अर्थ है 'वेद + अन्त' या 'वेद का अंतिम भाग'।कालक्रम: उपनिषद ब्राह्मणों और आरण्यकों के बाद, वेदों के अंत में आते हैं।

विषय-वस्तु: ये वेदों के ज्ञान-काण्ड को प्रस्तुत करते हैं और कर्मकांड (यज्ञ) की बजाय आत्मज्ञान (ब्रह्मविद्या) पर केंद्रित हैं, जो वैदिक ज्ञान का अंतिम लक्ष्य माना जाता है।

*Q4. तान्त्रिक श्रुति (आगम) वैदिक श्रुति (निगम) से किस प्रकार भिन्न है?

*A4. निगम (वैदिक श्रुति) मुख्य रूप से देवताओं की स्तुति और यज्ञ के माध्यम से ज्ञान पर जोर देता है, जबकि आगम (तान्त्रिक श्रुति) मुख्य रूप से शिव-शक्ति के संवाद पर आधारित है और उपासना, योग, मुद्रा, और व्यावहारिक अनुष्ठानों के माध्यम से सिद्धि और मुक्ति पर जोर देता है। दोनों का लक्ष्य मोक्ष है, पर मार्ग और विधि भिन्न हैं।

*Q5. 'तत् त्वम् असि' किस उपनिषद का महावाक्य है और इसका क्या अर्थ है?

*A5. 'तत् त्वम् असि' (वह तुम हो) छान्दोग्य उपनिषद का एक प्रमुख महा वाक्य है। यह उद्दालक ऋषि अपने पुत्र श्वेतकेतु को बताते हैं। इसका अर्थ है कि व्यक्ति की आत्मा (त्वम्) और परम सत्ता या ब्रह्म (तत्) एक ही हैं। यह अद्वैत दर्शन का मूल सिद्धांत है।

🛡️ "डिस्क्लेमर"

*यह ब्लॉग 'श्रुति' और 'वैदिक साहित्य' पर उपलब्ध प्राचीन भारतीय ग्रंथों, विशेषकर मनुस्मृति, वेदों, और उपनिषदों पर आधारित ज्ञान को एकत्र कर प्रस्तुत करता है। इस सामग्री का उद्देश्य केवल शैक्षिक और सूचनात्मक है, ताकि पाठक सनातन धर्म के मूल दार्शनिक सिद्धांतों को समझ सकें।

*प्रामाणिकता और व्याख्या: वैदिक साहित्य और तन्त्रों की व्याख्याएं भारतीय दर्शन की विभिन्न शाखाओं (जैसे अद्वैत, विशिष्टा द्वैत, द्वैत) में भिन्न-भिन्न हो सकती हैं। यहाँ प्रस्तुत जानकारी एक सामान्य और व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करती है। पाठकों को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले मूल ग्रंथों और विभिन्न आचार्यों के भाष्यों का अध्ययन करें।

*तान्त्रिक विषय: ब्लॉग में तान्त्रिक श्रुति और कुछ ब्राह्मण ग्रन्थों का उल्लेख है। तन्त्रों में वर्णित गूढ़ अनुष्ठान और विधियां अत्यंत संवेदनशील होती हैं और उन्हें केवल योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही समझना और करना चाहिए। इस ब्लॉग में वर्णित तन्त्रों के नाम और विषय-वस्तु केवल शैक्षिक परिचय के लिए हैं। किसी भी अनुष्ठान को बिना उचित मार्गदर्शन के करने की सलाह नहीं दी जाती।

*मनुस्मृति: मनुस्मृति एक ऐतिहासिक और विवादास्पद पाठ रहा है। यहां इसका उपयोग केवल 'श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयः' के संदर्भ में वेद की सर्वोच्चता को स्थापित करने के लिए किया गया है, न कि इसके अन्य सामाजिक या कानूनी प्रावधानों को मान्य करने के लिए।

*दोष-निवारण: इस ब्लॉग को तैयार करने में पूर्ण सावधानी बरती गई है। तथापि, यदि कोई तथ्यात्मक त्रुटि या अस्पष्टता पाई जाती है, तो लेखक या प्रकाशक उसके लिए जिम्मेदार नहीं होंगे। ज्ञान की खोज में, हमेशा संदेह और आलोचनात्मक चिंतन का स्वागत है।

*व्यक्तिगत विश्वास: यह ब्लॉग किसी भी पाठक को कोई विशेष धार्मिक या दार्शनिक मत अपनाने के लिए बाध्य नहीं करता है। धार्मिक और आध्यात्मिक विषय पूर्ण रूप से व्यक्तिगत आस्था और विवेक पर आधारित हैं।



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