Saphala Ekadashi सफला एकादशी 2027: संपूर्ण गाइड - हर कार्य में सफलता और सौभाग्य का महाव्रत

Safala Ekadashi 2027: 3 जनवरी को! जानें सफलता और सौभाग्य लाने वाले इस महाव्रत की सटीक तिथि, स्टेप-बाय-स्टेप पूजा विधि, तीन दिवसीय नियम, व्रत कथा और शुभ मुहूर्त। हर काम में मिलेगी निश्चित सफलता।

Saphala Ekadashi 2027 picture of Lord Vishnu

✨ भगवान विष्णु के नारायण स्वरूप में श्रद्धा अर्पित करें — सफला एकादशी 2027 पर जानें व्रत कथा, पूजा विधि, महत्व और लाभ। इस पावन दिन पर विष्णु भक्ति से पाएं जीवन में सफलता और सौभाग्य। 🙏

सफला एकादशी के संबंध में सभी तरह के विषय वस्तु नीचे दए गए हैं। इन विषयों के संबंध में विस्तार से पढ़ें मेरे ब्लॉग पर

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*02.सफला एकादशी 2027

*03.सफला एकादशी व्रत कथा

*04.सफला एकादशी पूजा विधि

*05.सफला एकादशी कब है

06.Safala Ekadashi 2027 date and time

*07.सफला एकादशी के दिन क्या करें क्या न करें

*08.सफला एकादशी का महत्व और लाभ

*09.भगवान विष्णु की पूजा का सरल तरीका

*10.लुम्भक की कहानी और सफला एकादशी

विवरण तिथि समय

*सफला एकादशी व्रत रविवार, 3 जनवरी 2027 दिन भर

*एकादशी तिथि आरंभ 2 जनवरी 2027 (शनिवार) शाम 05:43 बजे से

*एकादशी तिथि समाप्त 3 जनवरी 2027 (रविवार) शाम 06:40 बजे तक

*पारण (व्रत तोड़ने) का समय 04 जनवरी 2027 (सोमवार) प्रातः 04:47 बजे से प्रातः 07:48 बजे तक। शुभ मुहूर्त और अमृत मुहूर्त रहेगा।

*द्वादशी तिथि समाप्ति 4 जनवरी 2027 (सोमवार) शाम 07:18 बजे

शुभ मुहूर्त का सटीक विवरण:

*ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 04:41 बजे से प्रातः 05:33 बजे तक (पूजा का सर्वश्रेष्ठ समय)

*अभिजीत मुहूर्त: दिन में 11:28 बजे से 12:11 बजे तक (किसी भी कार्य की शुरुआत के लिए उत्तम)

चर मुहूर्त सुबह 07:45 बजे से 09:08 बजे तक, अमृत मुहूर्त सुबह 10:29 बजे से 1150 बजे तक, शुभ मुहूर्त शाम 05:13 बजे से 06:52 बजे तक, अमृत महोत्सव 06:52 बजे से 08:31 बजे तक रहेगा। 

(भूलकर भी ना करें इस समय पूजा: राहुकाल 03:52 बजे से लेकर शाम 05:13 बजे तक,  यमगंड दिन के 11:50 बजे से लेकर दोपहर 01:11 बजे तक और गुलिक काल 02:31 बजे से लेकर 03:52 बजे तक रहेगा। समय पर ध्यान दें)

पूजा विधि: चरण-दर-चरण मार्गदर्शन ( Puja Vidhi: Step-by-Step Guide) - 

पूजा सामग्री: 

सफला एकादशी के दिन भगवान विष्णु की मूर्ति, तांबा तथा पीतल का लोटा में जल पंचामृत रोली मोली चंदन पुष्प तुलसी के पत्ते आम और पान के पत्ते फल मिठाई नारियल लोंग इलाइची घी का दीपक अमन और आम के लकड़ी के टुकड़े होने चाहिए।

स्टेप 1: दशमी की संध्या (सात्विक भोजन, इंद्रियों पर नियंत्रण)।

स्टेप 2: एकादशी की प्रातः (जल्दी उठना, स्नान, संकल्प)।

स्टेप 3: भगवान विष्णु का आवाहन (कलश स्थापना, पंचामृत स्नान)।

स्टेप 4: षोडशोपचार पूजा (रोली, चंदन, फूल, तुलसी, दीपक)।

स्टेप 5: कथा और आरती (व्रत कथा सुनना और आरती गाना)।

स्टेप 6: दान (वस्त्र, अन्न, फल का दान)।

स्टेप 7: पारण (अगले दिन व्रत खोलना)।

IV. तीन दिवसीय पूजा विधान (Three-Day Puja Ritual) - 

दिन 1: दशमी तिथि (2 जनवरी 2027)

नियम: 

एक समय सात्विक भोजन, रात को भूमि पर शयन, ब्रह्मचर्य का पालन, तामसी भोजन का त्याग।

दिन 2: एकादशी तिथि (3 जनवरी 2027)

नियम: 

पूर्ण उपवास (जल रहित/फलाहार), रात्रि जागरण, विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ।

दिन 3: द्वादशी तिथि (4 जनवरी 2027)

नियम: 

पारण मुहूर्त में व्रत खोलना, ब्राह्मणों को भोजन कराना, दान देना, फिर स्वयं भोजन करना।

सफला एकादशी के दिन भगवान विष्णु के जिस रूप की पूजा का विशेष महत्व है

सफला एकादशी की कथाएं और धार्मिक ग्रंथ बताते हैं कि इस दिन जगत के पालनहार श्री हरि विष्णु के नारायण (Lord Narayana) स्वरूप की उपासना की जाती है।

पूजा में मुख्य रूप से इन स्वरूपों का ध्यान किया जाता है:

श्री नारायण स्वरूप: सफला एकादशी व्रत कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने मूर दैत्य का वध करने के बाद एकादशी देवी को वरदान देते हुए इस व्रत की महिमा स्थापित की थी। इसलिए उन्हें श्री नारायण के रूप में पूजना अत्यंत शुभ माना जाता है।

श्री हरि: चूंकि एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित है, इसलिए उन्हें सामान्यतः श्री हरि या वासुदेव नाम से भी पूजा जाता है।

लक्ष्मी-नारायण: कई भक्त इस दिन भगवान विष्णु के साथ धन की देवी माता लक्ष्मी की भी पूजा करते हैं, क्योंकि उनकी संयुक्त पूजा से जीवन में आध्यात्मिक और भौतिक, दोनों तरह की सफलता (सफला) प्राप्त होती है।

संक्षेप में: सफला एकादशी पर भगवान विष्णु के श्री नारायण स्वरूप की पूजा करना सबसे उत्तम और फलदायी माना जाता है। पूजा में उन्हें आंवला, नारियल, सुपारी और तुलसी दल अवश्य अर्पित किए जाते हैं।

सफला एकादशी व्रत कथा का विस्तार  (Expanded Safala Ekadashi Vrat Katha) - 

खंड A: मूर दैत्य वध और एकादशी माता की उत्पत्ति

देवताओं का संकट: मूर दैत्य का परिचय, उसका अत्याचार, देवताओं का विस्थापन।

श्रीहरि का आवाहन: महादेव का सुझाव, देवताओं का क्षीरसागर पहुंचना, विष्णु स्तुति। (आवाहन और स्तुति के दृश्यों का भावनात्मक वर्णन करें)

भीषण युद्ध का विवरण: चंद्रावती पर चढ़ाई, 1000 वर्षों का भयंकर युद्ध, देवताओं की हार, श्रीहरि का थककर गुफा में विश्राम। (युद्ध के दृश्यों में उत्साह और निराशा का मिश्रण करें)

एकादशी देवी का प्राकट्य: श्रीहरि के तेज से नारी शक्ति का प्राकट्य (उनकी ओजस्विता का वर्णन), मूर दैत्य का देवी से युद्ध, मूर का वध। (देवी के पराक्रम का भव्य वर्णन करें)

वरदान: श्रीहरि का जागरण, देवी का परिचय, वरदान की मांग: "जो भी एकादशी का व्रत करे, उसे सफलता, मोक्ष और आपका धाम मिले।" श्रीहरि द्वारा 'एकादशी' नाम और वरदान की स्वीकृति।

कथा को विस्तार से पढ़ें 

सफला एकादशी व्रत कथा का विस्तार: मूर दैत्य वध और एकादशी देवी का प्राकट्य।

देवताओं का अभूतपूर्व संकट और मूर दैत्य का अत्याचार

सत्ययुग की बात है। ब्रह्मांड के लोकपाल—इंद्र, अग्नि, यम, वरुण, वायु और चंद्रमा—अपने-अपने लोकों में सुख-शांति से प्रतिष्ठित थे। 

लेकिन यह शांति तब भंग हुई जब नाड़ी जंग नामक दैत्य के कुल में एक भयंकर और अत्यंत बलशाली असुर ने जन्म लिया, जिसका नाम था मूर। मूर ने बचपन से ही घोर तपस्या करके ब्रह्माजी से ऐसे वरदान प्राप्त कर लिए थे, जिसने उसे लगभग अजेय बना दिया।

शक्ति के मद में चूर होकर मूर ने सर्वप्रथम देवलोक पर चढ़ाई की। उसके पराक्रम के आगे देवता टिक न सके। मूर ने एक-एक करके सभी देव राज्यों पर अधिकार कर लिया। देवराज इंद्र को उनके सिंहासन से हटाकर मूर स्वयं 'इंद्र' बन बैठा। 

वह स्वयं सूर्य बनकर संसार को तापने लगा, स्वयं वरुण बनकर वर्षा करने लगा, और स्वयं यम बनकर प्राणियों का संहार करने लगा। देवताओं की दुर्दशा इतनी हो गई कि उन्हें अपने-अपने लोकों से विस्थापित होकर, मृत्युलोक (पृथ्वी) के गुप्त स्थानों पर साधारण जीवन जीने के लिए विवश होना पड़ा। 

पृथ्वी पर सर्वत्र अधर्म का बोलबाला हो गया, यज्ञ-हवन बंद हो गए, और सतयुग होते हुए भी त्रेता के समान कष्टमय वातावरण छा गया।

महादेव की शरण और क्षीरसागर का महायात्रा

मूर के अत्याचारों से त्रस्त देवतागण अपनी व्यथा लेकर सर्वप्रथम कैलाश पर्वत पर देवाधिदेव महादेव के पास पहुंचे। स्वर्ग से निष्कासित, उदास और भयभीत देवताओं के मुखमंडल पर घोर निराशा छाई थी।

इंद्र ने हाथ जोड़कर कहा: "हे त्रिलोकीनाथ! हम अपने स्थानों से च्युत हो गए हैं। मूर नामक दैत्य ने हमारे समस्त अधिकार छीन लिए हैं। अब हम किससे सहायता मांगें? इस दुख से मुक्ति का उपाय केवल आप ही बता सकते हैं।"

महादेव, जो करुणा के सागर हैं, उन्होंने देवताओं की यह दयनीय स्थिति देखी। वे जानते थे कि मूर का वध करना उनके या किसी अन्य देवता के बूते की बात नहीं। महादेव ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए कहा: "हे देवगण! आप जानते हैं कि ऐसे विकट संकट का समाधान केवल श्रीहरि विष्णु ही कर सकते हैं। सृष्टि के पालनहार वही हैं। विलंब न करें, आप सब तत्काल 

क्षीरसागर जाएं। अपनी स्तुति से उन्हें निद्रा से जगाएं और उनसे समाधान मांगें।"

महादेव के वचनों ने देवताओं में नई आशा का संचार किया। वे सब महादेव को नमन कर तुरंत क्षीरसागर की ओर चल पड़े।

श्रीहरि का आवाहन और दिव्य योगनिद्रा क्षीरसागर पहुंचकर देवताओं ने देखा कि भगवान विष्णु शेषनाग की विशाल और अनंत शैय्या पर योगनिद्रा में लीन हैं। उनके मुखमंडल पर एक अद्भुत शांति और तेज व्याप्त था। इंद्र, अग्नि, वायु और अन्य सभी देवताओं ने एक साथ मिलकर 'विष्णु स्तुति' का गान आरंभ किया।

उनकी स्तुति में भक्ति की पराकाष्ठा थी, उनके शब्दों में संपूर्ण सृष्टि की पीड़ा थी:

"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः! हे अनंत! हे पालनहार! आप ही सृष्टि के आदि और अंत हैं। आपके तेज से ही संसार का संचालन होता है। आज मूर दैत्य के कारण धर्म नष्ट हो रहा है, पृथ्वीवासी त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। हे नाथ! अपनी योगनिद्रा त्यागिए और हमें इस महा संकट से मुक्ति प्रदान कीजिए।"

स्तुति की ध्वनि जब भगवान विष्णु के कानों तक पहुंची, तब वे धीरे-धीरे निद्रा से जागे। उनकी आंखें खुलीं और उन्होंने देवताओं के समूह को सामने देखा।

भगवान विष्णु ने अत्यंत शांत स्वर में पूछा: "हे देवगण! आप सब इतने चिंतित क्यों हैं? किस कारणवश आप मेरी शरण में आए हैं? आप अपनी समस्या विस्तार से बताइए।"

इंद्र ने कांपते हुए स्वर में मूर दैत्य की उत्पत्ति से लेकर उसके चंद्रावती नगरी को राजधानी बनाने, देवताओं को भगाने और स्वयं लोकपाल बनने तक की पूरी कहानी कह सुनाई।

यह सुनकर भगवान विष्णु की भौंहें तन गईं। उनके शांत मुखमंडल पर अब प्रचंड क्रोध की आभा दिखने लगी। उन्होंने गर्जना करते हुए कहा: "हम शीघ्र ही तुम्हारे शत्रुओं का विनाश करेंगे! तुम सब मेरे साथ चंद्रावती पर चढ़ाई की तैयारी करो।"

1000 वर्षों का महायुद्ध

भगवान विष्णु के आदेश पर, देवताओं और असुरों के बीच चंद्रावती नगरी के विशाल युद्ध मैदान में भयंकर युद्ध छिड़ गया। भगवान श्रीहरि स्वयं अपने विराट रूप में प्रकट हुए। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित थे।

यह युद्ध सामान्य युद्ध नहीं था। यह धर्म और अधर्म के बीच का महासंग्राम था, जो एक हजार वर्षों तक चलता रहा। श्रीहरि ने अपनी समस्त शक्ति से दैत्यों का संहार किया। लेकिन मूर दैत्य को परास्त करना आसान नहीं था। उसकी सेना भी बलशाली थी और उसे वरदानों का सुरक्षा कवच प्राप्त था।

हजार वर्षों के अनवरत युद्ध और घमासान मल्लयुद्ध के बाद, सृष्टि के पालनहार को भी थकान महसूस होने लगी। युद्ध की यह थकान शारीरिक से अधिक, मायावी थी। भगवान विष्णु ने सोचा: “यह दैत्य किसी साधारण युद्ध से नहीं मरेगा। मुझे कोई नई रणनीति अपनानी होगी।”

यह विचार कर, भगवान विष्णु रणभूमि छोड़कर हिमालय की ओर चले गए और वहां बद्रीकाश्रम के पास स्थित एक अत्यंत सुंदर और रहस्यमय सिंहावती नामक गुफा में प्रवेश कर गए। वे उस गुफा के भीतर गहन योगनिद्रा में लेट गए।

एकादशी देवी का महाप्राकट्य

मूर दैत्य ने देखा कि उसका सबसे बड़ा शत्रु, भगवान विष्णु, युद्धभूमि से भागकर गुफा में सोया हुआ है। मूर के मन में अहंकार भर गया। वह अपने बचे हुए सैनिकों के साथ गुफा में घुसा और भगवान विष्णु को सोया देख उनकी हत्या करने का घिनौना षड्यंत्र रचने लगा।

जैसे ही मूर दैत्य ने भगवान विष्णु पर प्रहार करने के लिए अपना खड्ग उठाया, तभी एक अद्भुत घटना घटी।

भगवान विष्णु के तेज, उनके भीतर की शुद्ध शक्ति, और उनकी एकाग्र योगनिद्रा से एक अलौकिक, तेजस्वी, और ओजस्वी नारी शक्ति का प्राकट्य हुआ। इस कन्या का रूप ऐसा था कि दैत्यों की आंखें चौंधिया गईं। उनके शस्त्रों में बिजली की सी चमक थी, और उनका स्वर सिंह गर्जना के समान था।

इस दिव्य कन्या ने आते ही मूर दैत्य के मार्ग को अवरुद्ध कर दिया। मूर ने कन्या को तुच्छ समझकर उस पर आक्रमण किया, लेकिन वह नहीं जानता था कि वह साक्षात् भगवान विष्णु की 'योगमाया' है।

कन्या और मूर दैत्य के बीच भीषण संग्राम हुआ। यह नारी शक्ति युद्ध कला में इतनी पारंगत थी कि मूर के सभी प्रहार विफल हो गए। अंत में, कन्या ने क्रोध में भरकर मूर दैत्य के सभी प्रमुख अस्त्र-शस्त्रों को खंड-खंड कर दिया। 

फिर, एक ही प्रचंड प्रहार में उसने मूर दैत्य का सिर धड़ से अलग कर दिया!

मूर दैत्य के मरते ही, बचे हुए सभी दैत्य घबराकर पाताल लोक की ओर भाग खड़े हुए।

वरदान और 'एकादशी' नाम का रहस्य

जब मूर दैत्य का वध हो गया, तब भगवान विष्णु अपनी योगनिद्रा से जागे। उन्होंने देखा कि एक अत्यंत सुंदर और पराक्रमी कन्या उनके सामने हाथ जोड़े खड़ी है, और मूर दैत्य का सिर कटा हुआ पड़ा है।

श्रीहरि आश्चर्यचकित होकर बोले: "देवी! तुम कौन हो? तुमने अपने तेज और पराक्रम से उस भयंकर दैत्य का वध कर दिया, जिसे मैं भी इतने समय में परास्त नहीं कर सका। तुम किसकी शक्ति हो?"

कन्या ने नम्रता से उत्तर दिया: "हे प्रभु! मैं आपकी ही अंश हूँ, आपकी ही शक्ति हूं। जब मूर दैत्य आपको मारने का प्रयास कर रहा था, तब आपकी देह से ही मेरा जन्म हुआ। मेरा जन्म आपके प्राणों की रक्षा के लिए हुआ है।"

भगवान विष्णु उस कन्या के पराक्रम और भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने अत्यंत प्रेम से उस कन्या को गले लगाया और कहा: "हे कल्याणी! तुमने मेरे प्राणों की रक्षा की है। आज से मैं तुम्हें एक अमूल्य वरदान देता हूं। चूंकि तुम एकादशी तिथि को प्रकट हुई हो, इसलिए तुम्हारा नाम एकादशी होगा। मांगो! तुम जो भी वरदान चाहती हो, वह तुम्हें अवश्य मिलेगा।"

देवी एकादशी ने हाथ जोड़कर कहा: "हे श्रीहरि! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और मुझे वरदान देना चाहते हैं, तो मुझे यह वरदान दीजिए कि: जो कोई भी मनुष्य मेरी तिथि यानी एकादशी के दिन उपवास करे, आपका स्मरण करे और आपकी पूजा करे, उसके सारे पाप नष्ट हो जाएं और उसे अंत में आपके परमधाम की प्राप्ति हो।"

भगवान विष्णु ने यह वरदान तुरंत स्वीकार कर लिया। उन्होंने कहा: "एकादशी! तुम मेरे लिए अष्टमी और चतुर्दशी से भी अधिक प्रिय हो। आज से जो भी तुम्हारी तिथि का व्रत करेगा, उसे 'सफलता' (हर काम में सिद्धि) मिलेगी, और वह अनंत काल तक मेरे लोक में सुख पाएगा। यह व्रत सभी व्रतों में सर्वश्रेष्ठ माना जाएगा।"

यही वह महान तिथि है, जो स्वयं श्रीहरि की शक्ति है, और जो भक्तों को सफलता, मोक्ष और परमधाम का आशीर्वाद देती है।

खंड B: राजा लुम्भक की कहानी का विस्तार

पापी राजकुमार: चंपावती नगरी, राजा महिष्मति, राजकुमार लुम्भक का पतन (विस्तार से उसके बुरे कर्मों का विवरण)। पिता द्वारा त्याग और वनवास।

दशमी की रात्रि: वन में लुम्भक का कष्ट, चोरी का असफल प्रयास, सिपाहियों से पहचान। ठंड से काँपते हुए पीपल के नीचे रात बिताना। (दशमी की रात के कष्ट का विवरण बढ़ाएँ)

अनजाने में एकादशी व्रत: दशमी को फल खाने के बाद, एकादशी के दिन ठंड से बेहोशी, दोपहर में चेतना। भूख-प्यास और ठंड में फल चुनकर लाना।

अनायास पूजा: संध्या के समय, फलों को पीपल की जड़ में रखकर भावुक निवेदन: "हे लक्ष्मीपति, इन फलों से आप संतुष्ट हों।" (यह भावुक क्षण है।)

आकाशवाणी और परिवर्तन: आकाशवाणी: "तुम सफला एकादशी के प्रभाव से राज्य और पुत्र प्राप्त करोगे।" लुम्भक का दिव्य रूप, उसके मन का परिवर्तन, विष्णु भक्ति में लीन होना।

परिणाम: 15 वर्षों तक धर्मपूर्वक राज्य, पुत्र मनोज्ञ को सौंपकर मोक्ष की प्राप्ति। (निष्कर्ष में लुम्भक के उदाहरण से व्रत की शक्ति पर जोर दें)

सफला एकादशी द्वितीय व्रत कथा का : राजा लुम्भक और सफलता का रहस्य

चंपावती नगरी और राजा महिष्मति का दुर्भाग्य

प्राचीन काल में, चंपावती नाम से विख्यात एक अत्यंत समृद्ध और वैभवशाली नगरी थी। यह नगरी इतनी सुंदर थी कि इसकी तुलना इंद्रलोक के नंदनवन से की जाती थी। इस नगरी पर राजा महिष्मति का शासन था। राजा महिष्मति अत्यंत धर्मात्मा, न्यायप्रिय और प्रजा पालक थे।

राजा को पांच पुत्रों का सौभाग्य प्राप्त था, लेकिन उनका ज्येष्ठ पुत्र राजा की चिंता का कारण था। इस पुत्र का नाम, जिसे राजा ने कालांतर में बदलकर लुम्भक रख दिया था, उसके कर्मों के कारण रखा गया था। यह राजकुमार बचपन से ही कुसंगति में पड़ गया था। वह जुआरी, व्यसनी, परस्त्रीगामी और वेश्याओं पर आसक्त था। वह दिन-रात पाप कर्मों में ही लगा रहता था और राजकोष के धन को भी अपने बुरे व्यसनों में बर्बाद करता था।

लुम्भक के इस पापा चारी आचरण से दुखी होकर, राजा महिष्मति ने उसे बार-बार समझाया, दंडित भी किया, पर लुम्भक पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। राजधर्म और वंश की प्रतिष्ठा को दाँव पर लगा देख, एक दिन राजा ने भारी मन से यह कठोर निर्णय लिया।

राजा ने दरबार में घोषणा की: "आज से मेरा ज्येष्ठ पुत्र लुम्भक इस राज्य का उत्तराधिकारी नहीं रहेगा। उसके पाप कर्मों के कारण उसे राजसी सुख-सुविधाओं से वंचित किया जाता है और उसे तत्काल राज्य की सीमा से निष्कासित किया जाता है!"अपमान और ग्लानि से भरकर लुम्भक राज्य से बाहर निकल गया।

वनवास और पापी का पतन

राज्य से निकाले जाने के बाद, लुम्भक ने घोर जंगल का रास्ता अपनाया। वहां रहते हुए भी उसके पाप कर्मों की आदत नहीं छूटी। भूख और गरीबी से बचने के लिए, वह चोरों और लुटेरों के एक गिरोह में शामिल हो गया। वह रात के अंधेरे में चंपावती नगरी में घुसता और राजा की प्रजा का धन चुराता।

एक बार जब वह चोरी करने नगर में आया, तो सिपाहियों ने उसे पहचान लिया। सिपाहियों ने लुम्भक को घेर लिया, लेकिन जैसे ही उसने क्रोध में अपनी पहचान बताई कि वह राजा महिष्मति का पुत्र है, तो सिपाहियों ने राजपुत्र होने के कारण उसे छोड़ दिया। वे यह जोखिम नहीं लेना चाहते थे कि राजा का पुत्र उन पर झूठा आरोप लगाए।

इस घटना के बाद, लुम्भक शर्मिंदा होने के बजाय और भी दुखी और हताश हो गया। वह जानता था कि अब उसे कभी भी नगर में प्रवेश नहीं मिलेगा। वह घने जंगल में लौट आया और वहीं पर एक विशाल, प्राचीन पीपल वृक्ष के नीचे अपना डेरा जमा लिया। उसका जीवन अब मांस खाने, वृक्षों के फल खाने और जंगली जानवरों की तरह जीवन निर्वाह करने तक सिमट गया था। उसका शरीर वस्त्रहीन था, मन पापों से भरा था, और भविष्य अंधकारमय था।

अनजाने में सफला एकादशी व्रत का प्रारंभ

समय बीतता गया। एक दिन, पौष मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि आई। लुम्भक उस दिन बहुत भूखा था। उसने जंगल में भटककर कुछ वन्य फल और कंदमूल एकत्र किए और उन्हें खाकर अपनी भूख शांत की। 

उसका यह भोजन सात्विक नहीं था, पर उस दिन दशमी तिथि होने के कारण, वह एक समय भोजन करने के नियम का पालन अनजाने में ही कर रहा था।

जब रात हुई, तो पौष के महीने की भयंकर ठंड पड़ने लगी। चूंकि लुम्भक वस्त्रहीन था और पीपल के वृक्ष के नीचे खुले में सो रहा था, इसलिए जाड़े की वजह से उसका शरीर कांपने लगा। 

ठंड इतनी तीव्र थी कि वह पूरी रात एक क्षण के लिए भी सो नहीं पाया। वह कराहता रहा, हाथ-पैर मलता रहा, लेकिन उसे न तो नींद आई और न ही आराम मिला। इस प्रकार, अनजाने में ही उसने दशमी की रात का जागरण कर लिया।

अगले दिन, सूर्योदय हुआ, लेकिन ठंड के कारण लुम्भक का शरीर इतना शिथिल और जकड़ा हुआ था कि वह होश में नहीं आ सका। वह लगभग बेहोशी की हालत में पड़ा रहा। यह दिन सफला एकादशी का था।

दोपहर होने पर, जैसे-तैसे लुम्भक को थोड़ी चेतना प्राप्त हुई। भूख और प्यास से उसका बुरा हाल था। वह कंपकंपाते शरीर के साथ जंगल में गया और वहां से वह जितने फल, फूल और कंदमूल ला सकता था, वह सब एकत्र करके अपने विश्राम स्थल, यानी उसी पीपल वृक्ष के पास लौटा। जब वह लौटा, तब तक सूर्यदेव अस्त हो चुके थे।

लुम्भक की अनायास पूजा और भक्ति का उदय

फल एकत्र करने के बाद, लुम्भक ने उन्हें अपने सामने रखा। यद्यपि वह एक पापी था, पर राजा का पुत्र होने के नाते उसके मन में कहीं-न-कहीं पूर्वजन्म के कुछ पुण्य संस्कार अभी भी बाकी थे।

उसने अपने सामने पड़े फलों को देखा। भूख से व्याकुल होने के बावजूद, उसने पहले भगवान को भोग लगाने का विचार किया। यह विचार कहाँ से आया, वह खुद नहीं जानता था, शायद यह सफला एकादशी तिथि का ही प्रभाव था।

लुम्भक ने पीपल के वृक्ष की जड़ में उन सभी फलों को अत्यंत श्रद्धा और भावना से अर्पित किया। उसके नेत्रों में पश्चात्ताप के आंसू थे। उसने हाथ जोड़कर कांपते स्वर में कहा:

"हे लक्ष्मीपति भगवान विष्णु! मेरे जीवन में मैंने केवल पाप ही किए हैं। आज इन फलों के सिवा मेरे पास आपको अर्पित करने के लिए और कुछ नहीं है। मैं इन फलों को आपको निवेदन करता हूं। यदि मेरे अनजाने में किए गए इस कार्य में कोई त्रुटि हो, तो कृपया मुझे क्षमा करें और संतुष्ट हों।"

यह कहकर, लुम्भक ने अपने व्रत का संकल्प किया: "मैं आज रात भी कुछ नहीं खाऊंगा और रात भर आपकी स्तुति करने का प्रयास करूंगा।" इस प्रकार, उसने रात भर नींद नहीं ली और अनजाने में ही सफला एकादशी के व्रत का उपवास और रात्रि जागरण दोनों पूरे कर लिए।

आकाशवाणी और सफलता का वरदान

लुम्भक की यह अनायास की गई पूजा, जिसमें केवल शुद्ध भावना थी, भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय लगी। उसके पिछले सभी पाप इस एकादशी व्रत के प्रभाव से जलकर भस्म हो गए।

रात के अंतिम प्रहर में, जब लुम्भक उसी पीपल वृक्ष के नीचे बैठा था, तो अचानक एक अलौकिक, मधुर आकाशवाणी हुई।

आकाशवाणी में कहा गया: "हे राजकुमार लुम्भक! तुम सफला एकादशी के व्रत के प्रसाद से अब सभी पापों से मुक्त हो गए हो। यह व्रत तुम्हारे जीवन में सफलता, सौभाग्य और पुण्य का उदय करेगा। तुम अब अपने राज्य पर वापस जाओगे, तुम्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी और तुम धर्मपूर्वक राज्य करोगे।"

लुम्भक ने यह दिव्य वरदान स्वीकार किया। अगले ही पल, उसका जीर्ण-शीर्ण और गंदा शरीर दिव्य रूप में परिवर्तित हो गया। उसका मन शांत और निर्मल हो गया, और उसकी बुद्धि पूर्ण रूप से भगवान विष्णु के भजन और धर्म-कर्म में लग गई।

लुम्भक का पुनरुत्थान और मोक्ष

वरदान पाकर लुम्भक ने तुरंत चंपावती नगरी की ओर प्रस्थान किया। वहां पहुंचकर उसने अपने पिता, राजा महिष्मति से भेंट की। राजा ने अपने पुत्र को दिव्य रूप में देखकर, उसके नेत्रों में पवित्रता देखकर और उसकी वाणी में पश्चात्ताप सुनकर उसे क्षमा कर दिया। राजा महिष्मति ने उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।

लुम्भक ने इसके बाद पंद्रह वर्षों तक धर्म, न्याय और निष्ठा के साथ राज्य किया। वह भगवान विष्णु का परम भक्त बन गया। उसे मनोज्ञ नामक एक धर्मपरायण पुत्र उत्पन्न हुआ।

जब उसका पुत्र बड़ा हुआ और राज्यभार संभालने योग्य हुआ, तब लुम्भक ने संसार की मोह-माया को छोड़कर, अपने पुत्र को राज-पाट सौंप दिया। वह स्वयं पूर्ण रूप से भगवान श्रीहरि की भक्ति में लीन हो गया। अंत में, लुम्भक ने अपने जीवन की अंतिम यात्रा भगवान श्रीकृष्ण के परमधाम की ओर की, जहां जाकर मनुष्य कभी शोक या दुःख में नहीं पड़ता।

यही है सफला एकादशी का महात्म्य! यह कथा सिद्ध करती है कि यह व्रत केवल उपवास नहीं, बल्कि जीवन में सफलता (सफला), पापों से मुक्ति और अंततः मोक्ष प्रदान करने वाला महाव्रत है।

VI. एकादशी के अनसुलझे पहलू  (Unanswered Aspects of Ekadashi) - 

एकादशी और विज्ञान: चंद्रमा का मन पर प्रभाव, व्रत से पाचन तंत्र का शुद्धिकरण (वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी महत्व)।

साल में 24/26 एकादशी का रहस्य: अधिक मास की पद्मिनी और परमा एकादशी की व्याख्या।

माता एकादशी का स्वरूप: वह केवल तिथि नहीं, बल्कि भगवान विष्णु की शक्ति हैं।

VII. एकादशी पर क्या करें और क्या ना करें (Do's and Don'ts) - 

क्या करें (Do's) क्या ना करें (Don'ts)

विष्णु पूजा: 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप। पारण में भूल: द्वादशी के शुभ मुहूर्त से पहले या बाद में व्रत न तोड़ें।

तुलसी पूजा: तुलसी के पौधे में जल दें, पर पत्ते न तोड़ें (दशमी को तोड़ लें)। अन्न का सेवन: चावल, दाल, अनाज, प्याज, लहसुन, बैंगन का सेवन बिल्कुल न करें।

जागरण: रात्रि में भजन-कीर्तन और विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ। निंदा/क्रोध: किसी की निंदा न करें, क्रोध न करें और असत्य न बोलें।

दान: वस्त्र, फल, अन्न, कंबल और गोदान करें। शारीरिक संबंध: ब्रह्मचर्य का पालन करें।

फलाहार: यदि पूर्ण निर्जला संभव न हो तो सात्विक फलाहार लें। बाल/नाखून काटना: इस दिन बाल, नाखून या दाढ़ी न करवाएं।

VIII. सफला एकादशी के संबंध में पूछे जाने वाले प्रश्न (H2: FAQs about Safala Ekadashi) - 

सफला एकादशी का महत्व क्या है? 

(सफलता और मोक्ष)

पारण का मतलब क्या होता है? 

व्रत खोलना

क्या गर्भवती महिलाएं एकादशी का व्रत कर सकती हैं? 

केवल फलाहार के साथ

अगर एकादशी का व्रत टूट जाए तो क्या करें? 

भगवान से क्षमा मांगकर द्वादशी के दिन पूजा करें

IX. निष्कर्ष (Conclusion) - 

सफला एकादशी के व्रत का महत्व दोहराएं और पाठकों को व्रत रखने के लिए प्रेरित करें।

दान: वस्त्र, फल, अन्न, कंबल और गोदान करें। शारीरिक संबंध: ब्रह्मचर्य का पालन करें।

फलाहार: यदि पूर्ण निर्जला संभव न हो तो सात्विक फलाहार लें। बाल/नाखून काटना: इस दिन बाल, नाखून या दाढ़ी न कटवाएँ।

रोचक और सुंदर डिस्क्लेमर (Interesting and Beautiful Disclaimer) - 

|| श्रद्धा और आस्था की दिव्य उद्घोषणा ||

यह लेख 'सफला एकादशी' के पावन पर्व और भगवान विष्णु की महिमा को सनातन धर्म की प्राचीन परंपराओं, पौराणिक ग्रंथों के सार और आचार्य गणों के ज्ञान के आधार पर प्रस्तुत करता है। हमारा उद्देश्य केवल ज्ञान का प्रकाश फैलाना और आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले जिज्ञासुओं को प्रेरित करना है।

इस आलेख में प्रस्तुत पूजा विधि, मुहूर्त और कथाएं पूर्णतः धार्मिक मान्यताओं, ज्योतिषीय गणनाओं और लोक-प्रचलन पर आधारित हैं। हम यह स्पष्ट करते हैं कि ज्योतिष और कर्मकांड पूर्णतः आपकी व्यक्तिगत आस्था और विश्वास पर निर्भर करते हैं। इन्हें किसी वैज्ञानिक प्रमाण या कानूनी बाध्यता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

हम किसी भी व्रतधारी को किसी भी प्रकार की धार्मिक क्रियाओं या कठिन निर्जला व्रत का पालन करने के लिए बाध्य नहीं करते हैं। हमारा विनम्र निवेदन है कि उपवास या अनुष्ठान करने से पहले, विशेष रूप से यदि आप गर्भवती हैं, बीमार हैं, या किसी गंभीर स्वास्थ्य स्थिति से गुजर रही हैं, तो अपने कुल पुरोहित और डॉक्टर से आवश्यक परामर्श अवश्य लें।

आपकी भक्ति ही सबसे बड़ी शक्ति है। हमें आशा है कि यह जानकारी आपके जीवन में सफलता, सुख और अपार सौभाग्य लाएगी। सफला एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएं!


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