Utpana Ekadashi 2026 उत्पन्ना एकादशी: तिथि, शुभ मुहूर्त, व्रत विधि और वह पौराणिक कथा जो आपको मोक्ष दिलाता

"उत्पन्ना एकादशी 2026, एकादशी व्रत विधि, मुर राक्षस की कथा, उत्पन्ना एकादशी कब है, एकादशी पूजा मुहूर्त, व्रत पारण समय"।

“भगवान विष्णु के चतुरभुज दिव्य स्वरूप की आराधना का पावन दिवस — उत्पन्ना एकादशी 2026। जानिए पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, क्या करें और क्या न करें, तथा पौराणिक कथा।”

मार्गशीर्ष मास (अगहन) के कृष्ण पक्ष की एकादशी को उत्पन्ना एकादशी के नाम से जाना जाता है। यह वह पावन तिथि है जब स्वयं एकादशी माता भगवान विष्णु के शरीर से उत्पन्न हुई थीं। इसी कारण इस एकादशी का महत्व बाकी सभी एकादशियों में सर्वाधिक माना जाता है, क्योंकि यह व्रत की उत्पत्ति का दिन है।  उत्पन्ना एकादशी का महापर्व 04 दिसंबर 2026, दिन शुक्रवार को मनाया जाएगा

मार्गशीर्ष मास (अगहन) के कृष्ण पक्ष की एकादशी को उत्पन्ना एकादशी के नाम से जाना जाता है। यह वह पावन तिथि है जब स्वयं एकादशी माता भगवान विष्णु के शरीर से उत्पन्न हुई थीं। इसी कारण इस एकादशी का महत्व बाकी सभी एकादशियों में सर्वाधिक माना जाता है, क्योंकि यह व्रत की उत्पत्ति का दिन है। 

*एकादशी तिथि का प्रारंभ 03 दिसंबर 2026, रात 11:03 बजे से

*एकादशी तिथि का समापन 04 दिसंबर 2026, रात 11:44 बजे तक

*पारण (व्रत खोलने) का समय 05 दिसंबर 2026, सुबह 06:59 बजे से 09:04 बजे तक

*पंचांग के अनुसार कैसा रहेगा 04 दिसंबर 2026 का दिन

उत्पन्ना एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है। यह दिन व्रत, दान और धर्म-कर्म के लिए अत्यंत शुभ होता है। किसी भी शुभ कार्य या भगवान विष्णु की पूजा के लिए मुहूर्त का ज्ञान होना आवश्यक है।

"मुहूर्त समय और महत्व"

*सूर्योदय (सुबह 06:11 बजे पर)

*सूर्यास्त की स्थिति (शाम 05:00 बजे)

*ब्रह्म मुहूर्त (अहले सुबह 04:25 बजे से लेकर 05:18 बजे तक) ध्यान, स्नान और व्रत का संकल्प लेने के लिए सर्वोत्तम।

*अभिजीत मुहूर्त (दोपहर 11:14 बजे से लेकर 11:57 बजे तक) दिन का सबसे शुभ समय; किसी भी महत्वपूर्ण कार्य की शुरुआत के लिए उत्तम।

*विजय मुहूर्त (दोपहर 01:24 बजे से लेकर 02:07 बजे तक) दुश्मनों पर विजय और कार्य सिद्धि के लिए शुभ।

"मुहूर्त समय और महत्व"

*राहुकाल (सुबह 10:04 बजे से लेकर 11:35 बजे तक) इस दौरान कोई भी नया या शुभ कार्य शुरू करने से बचना चाहिए।

*यमगण्ड काल (02:18 बजे से लेकर 03:49 बजे तक) यात्रा या महत्वपूर्ण निर्णय लेने से बचें।

*दुर्मुहुर्त (11:57 बजे से लेकर 12:40 बजे तक) दो बार आने वाला यह काल अशुभ माना जाता है।

*चौघड़िया पंचांग: दिन और रात का शुभ-अशुभ मुहूर्त

चौघड़िया मुहूर्त विशेष रूप से यात्रा और कार्य की शुरुआत के लिए उपयोगी होता है।

*मुहूर्त और समय (लगभग)

*चर मुहूर्त (सुबह 06:11 बजे से लेकर 07:32 बजे तक)

*लाभ मुहूर्त (07:32 बजे से लेकर 08:30 बजे तक)

*अमृत मुहूर्त (08:53 बजे से लेकर 10:14 बजे तक)

*शुभ मुहूर्त (11:35 बजे से लेकर 12:57 बजे मिनट तक)

"रात का चौघड़िया"

मुहूर्त और समय (लगभग)

*लाभ मुहूर्त (08:18 बजे से लेकर 09:57 बजे तक)

*शुभ मुहूर्त (11:36 बजे से लेकर 01:15 बजे तक)

*अमृत मुहूर्त (01:15 बजे से लेकर 02:54 बजे तक)

🙏 "चार पहर में कब करें भगवान विष्णु की पूजा?"

एकादशी व्रत में चारों पहर भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा और कीर्तन का विशेष विधान है।

*प्रथम पहर (प्रातः): सूर्योदय से लेकर दोपहर तक के शुभ मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत) में आप पहले पहर की पूजा कर सकते हैं।

*द्वितीय पहर (संध्या): सूर्यास्त के समय गोधूलि मुहूर्त या सायाह्य संध्या मुहूर्त के दौरान संध्या की पूजा करें। इसके बाद रात के लाभ मुहूर्त में भी पूजा की जा सकती है।

*तृतीय पहर (रात्रि): रात में निशिता मुहूर्त (11:43 PM से 12:37 AM) सबसे उत्तम माना जाता है। इस दौरान जागरण, भजन-कीर्तन और भगवान विष्णु के सहस्त्रनाम का जाप करें।

*चतुर्थ पहर (प्रातःकाल): अगले दिन ब्रह्म मुहूर्त (5:08 AM से 6:02 AM) में अंतिम पहर की पूजा समाप्त कर प्रातः सांध्य मुहूर्त में व्रत का समापन करें।

📜 उत्पन्ना एकादशी व्रत करने का सम्पूर्ण विधान"

उत्पन्ना एकादशी व्रत का पालन तीन चरणों में किया जाता है: दशमी (एक दिन पहले), एकादशी (व्रत का दिन) और द्वादशी (पारण का दिन)।

*दशमी के दिन (3 दिसंबर 2026)

*आहार शुद्धि: दशमी के दिन केवल एक बार शाकाहारी भोजन करें। भोजन में उड़द की दाल, चना, शहद और चावल का प्रयोग बिल्कुल न करें।

*शरीर शुद्धि: शाम को भोजन के बाद दातुन से मुँह अच्छी तरह साफ कर लें, ताकि अन्न का एक भी कण मुँह में न रह जाए।

*व्यवहार शुद्धि: रात को किसी की निंदा, असत्य भाषण और अधिक बातचीत से बचें। ब्रह्मचर्य का पालन करें।

*एकादशी के दिन (4 दिसंबर 2026)

*01.ब्रह्म मुहूर्त में जागरण: सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में उठें।

*02.स्नान और संकल्प: शौच आदि से निवृत्त होकर शुद्ध जल में गंगा जल मिलाकर स्नान करें। स्वच्छ वस्त्र पहनें।

*03.संकल्प विधि: दाहिने हाथ में जल, फूल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें। कहें: "हे श्रीहरि विष्णु! मैं आज उत्पन्ना एकादशी का व्रत कर रहा/रही हूँ। आप मेरी यह व्रत निष्ठा पूर्वक पूरा करने की शक्ति प्रदान करें और मेरे सभी पापों को हर लें।"

"भगवान विष्णु की पूजा विधि":

*01.पूजा स्थान पर भगवान विष्णु या श्री कृष्ण की प्रतिमा स्थापित करें।

*04.पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और गंगा जल) से स्नान कराएं।

*03.वस्त्र, आभूषण, तुलसी दल, कुमकुम, तिल, जनेऊ, धूप और दीप अर्पित करें।

*04.नैवेद्य (भोग) में मौसमी फल, मिठाई, खीर, सूखे मेवे और गेहूं के आटे की पंजीरी (बिना अन्न का भोग) चढ़ाएं।

*01.व्रत और जागरण: दिन भर निर्जल (बिना पानी) या फलाहार (फल और पानी के साथ) उपवास करें। रात्रि में सोना वर्जित है। सारी रात जागरण करें, 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करें, और भगवान विष्णु के सहस्रनाम का पाठ करें। 

*02.दीप दान: रात में दीप दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

*द्वादशी के दिन (5 दिसंबर 2026)

*01.पारण (व्रत खोलना): द्वादशी के दिन पारण समय (06:59 AM से 09:04 AM) के अंदर ही व्रत खोलना चाहिए।

*02.पूजा और दान: भगवान विष्णु की पूजा कर उन्हें भोग लगाएं।

*03.ब्राह्मण भोजन: किसी जरूरतमंद व्यक्ति या ब्राह्मण को भोजन कराएं और अपनी क्षमतानुसार दान-दक्षिणा दें।

*04.व्रत समापन: दान के बाद ही स्वयं अन्न ग्रहण करके व्रत का समापन करें और बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लें।

🎁 *जानें पूजा सामग्रियों की सूची

*उत्पन्ना एकादशी के पूजन के लिए ये सामग्री आवश्यक है:

*01.पात्र: तांबे या पीतल का लोटा, कलश, और पूजन पात्र।

*02.स्नान सामग्री: दूध, दही, घी, शहद, गंगा जल।

*03.वस्त्र और आभूषण: भगवान विष्णु के लिए नए वस्त्र, जनेऊ और आभूषण।

*04.पुष्प: मौसमी फूल, माला और तुलसी दल (तुलसी एकादशी के दिन नहीं तोड़नी चाहिए)।

*05.तिलक: कुमकुम (रोली), चंदन, अष्टगंध।

*06.दीपक और धूप: शुद्ध घी का दीपक, धूप, अगरबत्ती।

*07.भोग: मौसमी फल, सूखे मेवे, गुड़, नारियल, मिठाई, गेहूं के आटे की पंजीरी (ध्यान दें कि व्रत में अन्न वर्जित है)।

*08.अन्य: पान के पत्ते, सुपारी, अक्षत (पूजा में उपयोग हेतु), दक्षिणा के लिए पैसे।

📚 "उत्पन्ना एकादशी के संबंध में पौराणिक कथा" (विस्तार से)

उत्पन्ना एकादशी के जन्म की कथा स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाई थी, जो पद्म पुराण में वर्णित है। यह कथा लगभग 2500 से 3000 शब्दों में विस्तार से यहाँ प्रस्तुत है।

*युधिष्ठिर का प्रश्न और भगवान श्रीकृष्ण का उत्तर

महाराज युधिष्ठिर ने एक बार भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, "हे वासुदेव! मैं जानना चाहता हूँ कि एकादशी व्रत कैसे आरंभ हुआ और इसे करने का क्या विधान तथा क्या फल है? कृपा करके मुझे विस्तार से बताएं।"

श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया, "हे युधिष्ठिर! हेमंत ऋतु के मार्गशीर्ष मास (अगहन) के कृष्ण पक्ष की एकादशी को उत्पन्ना एकादशी कहा जाता है। इस व्रत का माहात्म्य सुनिए, जो समस्त पापों को हरने वाला है।"

*मुर राक्षस का भय और देवताओं की दुर्दशा"

सतयुग में मुर नाम का एक अत्यंत बलवान, प्रचंड और भयानक दैत्य उत्पन्न हुआ। यह दैत्य इतना शक्तिशाली था कि उसने इंद्र, सूर्य, वसु, वायु, अग्नि, जल, चंद्र और यमराज सहित सभी देवताओं को पराजित कर दिया। देवताओं के स्थान, यज्ञों में मिलने वाला उनका भाग और यहाँ तक कि स्वर्ग का राज्य भी मुर ने छीन लिया।

मुर के अत्याचारों से भयभीत होकर सभी देवता पृथ्वी लोक में छिपकर मारे-मारे फिरने लगे। अपनी दुर्दशा से दुखी होकर इंद्र देव, सभी देवताओं के साथ, पहले भगवान शिव के पास कैलाश पर्वत पर पहुंचे।

इंद्र ने शिवजी से कहा, "हे कैलाशपति! मुर नामक दैत्य ने हम सबका जीना दूभर कर दिया है। वह इतना बलवान है कि हमने उसे पराजित करने के लिए हर संभव प्रयास किया, लेकिन वह प्रचंड राक्षस हमें पराजित कर देता है। कृपया हमें इस संकट से बाहर निकालिए।"

भगवान शिव ने देवताओं की व्यथा सुनी और बोले, "हे देवताओं! आप तीनों लोकों के प्रभु, भक्तों के दुःखों को हरने वाले भगवान श्रीहरि विष्णु की शरण में जाइए। वे ही आपके दुःखों को दूर कर सकते हैं।"

"क्षीरसागर में देवताओं की स्तुति"

शिवजी के परामर्श पर इंद्र सहित सभी देवता क्षीरसागर पहुँचे। वहाँ भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर शयन कर रहे थे। इंद्र ने हाथ जोड़कर भगवान विष्णु की स्तुति करना शुरू किया।

इंद्र ने कहा, "हे भगवन! आप इस ब्रह्मांड के कर्ताधर्ता हैं। आप ही हमारे माता-पिता हैं, आप ही उत्पत्ति, पालन और संहार करने वाले हैं। आप ही सर्वव्यापक, सर्वश्रेष्ठ और सबको शांति प्रदान करने वाले हैं। दैत्यों ने हम देवताओं को पराजित कर स्वर्ग से निकाल दिया है और यज्ञों का भाग स्वयं ग्रहण कर रहे हैं। हे दीनबंधु! हम सब भयभीत होकर आपकी शरण में आए हैं। कृपा करके उस दैत्य राजा से हमारी रक्षा करें।"

*भगवान विष्णु और मुर राक्षस का युद्ध

देवताओं की बातें सुनकर भगवान विष्णु ने पूछा, "हे इंद्र! वह कौन मायावी दैत्य है जिसने तुम सब पर विजय प्राप्त कर ली? उसका नाम क्या है, उसका बल कितना है और वह कहाँ रहता है? सारी जानकारी मुझे बताओ।"

इंद्र ने कहा, "प्रभु! प्राचीन काल में नाड़ीजंघ नामक एक राक्षस था। उसी का महापराक्रमी और अत्याचारी पुत्र मुर है। वह चंद्रावती नगरी में रहकर राज्य करता है और उसने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया है।"

यह सुनकर भगवान विष्णु ने देवताओं को आश्वासन दिया और कहा, "अब उस दुष्ट राक्षस का नाश अवश्य होगा। तुम सब मेरे साथ चंद्रावती नगर चलो।"

भगवान विष्णु, देवताओं के साथ चंद्रावती नगर पहुंचे। वहां पहुंचते ही दानवों और देवताओं के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। दानवों ने भगवान विष्णु पर तीरों की वर्षा शुरू कर दी। भगवान विष्णु ने भी मुर राक्षस को मारने के लिए बाण चलाए, लेकिन मुर राक्षस के तेज के सामने विष्णु के बाण भी पुष्प बनकर बरसने लगे। यह युद्ध हजारों वर्षों तक चलता रहा, लेकिन भगवान विष्णु मुर को मार नहीं सके।

"एकादशी देवी का जन्म"

अथक युद्ध से थककर भगवान श्रीहरि विष्णु, युद्ध भूमि से कुछ दूर बद्रीनाथ में स्थित हेमवती नामक एक मनमोहक गुफा में विश्राम करने के लिए चले गए। वहाँ वे योगनिद्रा में सो गए।

क्रूर राक्षस मुर उनका पीछा करते हुए गुफा में पहुँचा। उसने भगवान विष्णु को सोया हुआ देखकर, उन्हें मारने की तैयारी की। जैसे ही मुर ने श्रीहरि पर प्रहार करने के लिए शस्त्र उठाया, उसी क्षण भगवान विष्णु के शरीर से एक अत्यंत तेजस्वी, कांतिमान और दिव्य रूप वाली विशाल देवी प्रकट हुईं।

उस देवी के तेज के सामने मुर राक्षस ठहर न सका। देवी ने उस दैत्य को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों के बीच घमासान युद्ध हुआ और अंत में उस देवी ने अपनी शक्ति और बल से मुर राक्षस का वध कर दिया।

"वरदान और उत्पत्ति का नामकरण"

जब भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागे, तो उन्होंने मुर को मृत देखा और सामने खड़ी उस दिव्य देवी से पूछा, "हे देवी! यह पराक्रमी दैत्य किसके द्वारा मारा गया?"

देवी ने उत्तर दिया, "हे प्रभु! मेरे द्वारा ही इस दुष्ट दैत्य का वध हुआ है। मैं आपके ही शरीर से उत्पन्न हुई हूँ, ताकि आपकी रक्षा कर सकूं।"

भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले, "तुमने मेरा हित किया है, इसलिए तुम अपनी इच्छा के अनुसार कोई भी वर मांगो।"

देवी ने कहा, "हे भगवन! मैं आपके अंश से उत्पन्न हुई हूँ। मैं चाहती हूं कि मेरे नाम पर कोई तिथि हो, जो परम पुण्य देने वाली हो। मैं चाहती हूँ कि जो मनुष्य मेरे दिन व्रत करे, उसके सभी पाप नष्ट हो जाएं और वह मोक्ष प्राप्त करे।"

तब श्रीहरि विष्णु ने वरदान देते हुए कहा, "हे देवी! चूंकि तुम मेरे ही अंश से मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन उत्पन्न हुई हो, इसलिए इसे उत्पन्ना एकादशी माना जाएगा। जो मनुष्य तुम्हारे दिन श्रद्धापूर्वक व्रत, उपवास और पूजन करेगा, उसे सभी तीर्थों के स्नान, बड़े-बड़े यज्ञों और दान से भी कई गुना अधिक फल प्राप्त होगा और वह अंत में विष्णु लोक को प्राप्त करेगा।"

यह कथा सुनाकर भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा, "हे युधिष्ठिर! जो मनुष्य उत्पन्ना एकादशी के व्रत का माहात्म्य पढ़ता है या सुनता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और वह विष्णु लोक में स्थान प्राप्त करता है।"

✅ "क्या करें और क्या न करें (Do's and Don'ts)"

उत्पन्ना एकादशी व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इन नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है:

"क्या करें (Do's)"

*01.अनुष्ठान विवरण

*02.तीन दिन का पालन दशमी (एक बार भोजन), एकादशी (व्रत) और द्वादशी (पारण)।

*03.पवित्रता ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर व्रत का संकल्प लें।

*04.पूजन दिन भर भगवान विष्णु का पूजन, भजन और कीर्तन करें। तुलसी दल अवश्य अर्पित करें (दशमी को तोड़कर रखें)।

*05.जागरण रात्रि में सोना नहीं चाहिए। भगवान विष्णु के सहस्रनाम और भगवत कथा का पाठ करें। दीप दान करें।

*06.दान व्रत खोलने से पहले द्वादशी को ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को भोजन कराएं और दान-दक्षिणा दें।

*07.आहार केवल फल, दूध, सूखे मेवे या व्रत में अनुमत अन्य सात्विक भोजन (जैसे साबूदाना) का सेवन करें।

"क्या न करें (Don'ts

"वर्जित कर्म विवरण"

*01.अन्न और चावल एकादशी के दिन चावल, दाल सहित सभी प्रकार के अन्न का सेवन पूरी तरह वर्जित है।

*02.दशमी को भोजन दशमी की रात को भोजन न करें।

*04.पाप कर्म झूठ बोलना, निंदा करना, पराई स्त्री पर दृष्टि डालना, चोरी करना, या किसी भी जीव को कष्ट देना महापाप है।

*05.तामसिक भोजन मांस, मदिरा, प्याज और लहसुन का प्रयोग दशमी और एकादशी दोनों दिन न करें।

*06.क्रोध क्रोध, लोभ, मोह और मोह-माया से दूर रहें।

*07.पारण का उल्लंघन द्वादशी के दिन पारण समय के अंदर ही व्रत खोलें। देर करना या समय से पहले खोलना अशुभ होता है।

"❓ उत्पन्ना एकादशी से संबंधित कुछ सुलझे पहलू"

उत्पन्ना एकादशी के व्रत को लेकर कई धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताएं हैं, जिन पर विचार करना आवश्यक है:

*01. एकादशी: अश्वमेध यज्ञ से दो सौ गुना फल!

पुराणों में कहा गया है कि उत्पन्ना एकादशी का व्रत अश्वमेध यज्ञ करने से दो सौ गुना अधिक फल देता है। इसका कारण यह है कि यज्ञ में बाहरी कर्मकांड की प्रधानता होती है, जबकि एकादशी व्रत आत्म-शुद्धि, मन के नियंत्रण और समर्पण पर आधारित है। यह व्रत मनुष्य को सीधे भगवान विष्णु की भक्ति से जोड़ता है।

*तपस्या: एक लाख से अधिक तपस्वियों को साठ वर्ष तक भोजन कराने से ग्यारह गुना अधिक पुण्य इस व्रत में है।

*दान से श्रेष्ठ: भूमिदान, कन्यादान और विद्या और दान से भी कई गुना अधिक पुण्य अन्नदान में माना गया है, लेकिन एकादशी व्रत का पुण्य इन सभी तरह के धार्मिक अनुष्ठानों से भी बढ़कर है, क्योंकि यह व्रत व्यक्ति को मोह-माया से परे ले जाता है।

*02. निर्जला व्रत ही सर्वश्रेष्ठ क्यों?

व्रत तीन प्रकार के होते हैं: निर्जल (बिना पानी), फलाहार (फल और पानी), और एक समय भोजन (शाम को)।

निर्जला व्रत: शास्त्रों में निर्जल व्रत को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। जो व्रतधारी अन्न और जल दोनों का त्याग कर व्रत करते हैं, उनकी तुलना देवता भी नहीं कर सकते। यह तपस्या का उच्चतम रूप है।

आंशिक व्रत: रात और दिन में एक बार भोजन करने वाले को व्रत का आधा ही फल प्राप्त होता है। हालांकि, शारीरिक क्षमता के अनुसार, फलाहार या केवल पानी के साथ व्रत करना भी पूर्ण फलदायक माना जाता है, बशर्ते मन में भक्ति और निष्ठा हो।

*03. एकादशी तिथि की श्रेष्ठता का रहस्य

युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा था कि एकादशी सभी तिथियों में श्रेष्ठ क्यों है? इसका उत्तर यह है कि एकादशी तिथि का जन्म भगवान विष्णु के तेज से हुआ है। जब देवता भयभीत थे और श्रीहरि योगनिद्रा में थे, तब एकादशी देवी ने अपनी उत्पत्ति से मुर राक्षस का नाश किया।

उत्पत्ति का महत्व: यह तिथि सीधे भगवान विष्णु की शक्ति का प्रतीक है। इसका संबंध किसी दान या यज्ञ से नहीं, बल्कि साक्षात मोक्षदायिनी देवी की उत्पत्ति से है।

पाप-नाश: एकादशी देवी को वरदान मिला है कि जो मनुष्य उनका व्रत करेगा, उसके ब्रह्महत्या, अकाल मृत्यु सहित सभी पाप नष्ट हो जाएंगे। यह तिथि सभी पापों को दूर करने और विष्णु लोक की प्राप्ति का सीधा मार्ग है।

❓ उत्पन्ना एकादशी से संबंधित सामान्य प्रश्न (FAQ)

Q. उत्पन्ना एकादशी 2026 में कब है?

A. उत्पन्ना एकादशी का व्रत 04 दिसंबर 2026, दिन शुक्रवार को रखा जाएगा।

Q. उत्पन्ना एकादशी पर क्या खाना चाहिए?

A. एकादशी पर केवल फल, दूध, दही, साबूदाना, मूंगफली, आलू, सूखे मेवे और कंद-मूल खा सकते हैं। किसी भी प्रकार का अनाज, दाल, चावल और नमक का सेवन वर्जित है।

Q. एकादशी का व्रत कितने दिन का होता है?

A. एकादशी का उपवास मुख्य रूप से एक दिन (एकादशी तिथि) का होता है, लेकिन नियमों का पालन तीन दिनों (दशमी, एकादशी और द्वादशी) तक किया जाता है।

Q. व्रत पारण का समय क्या है?

A. 5 दिसंबर 2026 को पारण का समय सुबह 06:59 बजे से 09:04 बजे तक है। पारण के समय में ही व्रत खोलना चाहिए।

Q. व्रत में चावल क्यों नहीं खाते?

A. पौराणिक मान्यता है कि मुर राक्षस के वध के बाद, उसका अंश चावल में समा गया था। इसलिए एकादशी के दिन चावल खाने से व्रत का पुण्य नष्ट हो जाता है।

Q. उत्पन्ना एकादशी की कथा का मुख्य संदेश क्या है?

A. इस कथा का मुख्य संदेश यह है कि सच्ची निष्ठा और भक्ति से किया गया व्रत मनुष्य को सभी पापों से मुक्ति दिलाकर मोक्ष का मार्ग दिखाता है, क्योंकि एकादशी साक्षात भगवान विष्णु की शक्ति का रूप है।

📢 डिस्क्लेमर (Disclaimer)

यह ब्लॉग पोस्ट विशुद्ध रूप से धार्मिक आस्था और हिन्दू पंचांग पर आधारित जानकारी प्रदान करता है। यहां दी गई तिथियां, शुभ-अशुभ मुहूर्त और पूजा विधियां विभिन्न धार्मिक ग्रंथों, पंचांगों और ज्योतिषीय गणनाओं पर आधारित हैं। इन जानकारियों का उद्देश्य केवल आपकी धार्मिक जिज्ञासा को शांत करना और व्रत-त्योहारों के उचित पालन में सहायता करना है।

ज्योतिषीय गणनाओं और पंचांगों में क्षेत्र (स्थान) के अनुसार थोड़ा-बहुत अंतर संभव है। इसलिए, व्रत का संकल्प लेने और किसी भी अनुष्ठान को शुरू करने से पहले, आपको अपने स्थानीय पुजारी या मान्य ज्योतिष विशेषज्ञ से पुष्टि अवश्य कर लेनी चाहिए। लेखक या प्रकाशक का उद्देश्य किसी भी प्रकार की अंधविश्वास या रूढ़िवादिता को बढ़ावा देना नहीं है। धार्मिक आस्था का पालन करना पूर्णतः आपकी व्यक्तिगत इच्छा और विवेक पर निर्भर करता है। इस व्रत का मुख्य उद्देश्य आत्म-शुद्धि, भगवान विष्णु के प्रति समर्पण और धार्मिक मूल्यों की स्थापना है। स्वास्थ्य की स्थिति के अनुसार ही उपवास के नियमों का पालन करें, और यदि आप किसी स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे हैं, तो निर्जला या कठोर व्रत करने से पहले चिकित्सक से परामर्श लेना अनिवार्य है। हम किसी भी क्षति या दुष्प्रभाव के लिए कोई जिम्मेदारी नहीं लेते हैं जो इस जानकारी के आधार पर किए गए कार्यों से हो सकता है।







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